Tag: muslim

वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार

लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।

Read More

ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल

ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।

Read More

Reclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context

Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.

Read More

बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?

भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।

Read More

मुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्यों है?

इस्लामिक फेमिनिज्म मुस्लिम समाजों में बराबरी और लैंगिक न्याय को पुनर्जीवित करने वाला आंदोलन है, जो कुरान और हदीस की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देकर उनके नैतिक उसूलों—इंसाफ, तौहीद और तक़वा—को केंद्र में रखता है। अस्मा बरलास, अमीना वदूद और फातिमा मेरनिसी जैसी विद्वान दिखाती हैं कि कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक पितृसत्ता की उपज हैं। यह आंदोलन कानूनी व सामाजिक सुधारों, विशेषकर पारिवारिक कानूनों में समानता की मांग करता है। आलोचनाओं के बावजूद, इस्लामिक फेमिनिज्म औरतों के अधिकार, गरिमा और समान भागीदारी को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है।

Read More

डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका

यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।

Read More

मक्का चार्टर: इस्लाम की असली सोच की ओर वापसी

मक्का चार्टर (2019) इस्लाम के मूल पैगाम—शांति, बराबरी और सह-अस्तित्व—की पुनःस्थापना है, न कि कोई नया सुधार। यह पैगंबर मुहम्मद के मदीना संविधान से प्रेरित है, जिसने विभिन्न धर्मों और कबीलों को ‘उम्मा’ के रूप में एकजुट किया। 139 देशों के 1200 से अधिक विद्वानों द्वारा स्वीकृत इस चार्टर ने धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता, अतिवाद का विरोध, महिलाओं और युवाओं के सशक्तीकरण, और पर्यावरण की रक्षा पर ज़ोर दिया। यह कुरान व इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक नैतिक संविधान है जो मुस्लिम दुनिया को एकजुट कर मानवाधिकार, न्याय और दया के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रस्तुत करता है।

Read More

The Makkah Charter: A Return to Islam’s Original Vision

The ‘Charter of Makkah (2019’ revives Islam’s original message of peace, equality, and coexistence, inspired by the Prophet Muhammad’s **Constitution of Medina (622 CE)**—the first charter uniting Muslims, Jews, and tribes under shared citizenship and justice. Rooted in these principles, over **1,200 scholars from 139 countries** reaffirmed Islam’s moral foundations against extremism and division. The Charter advocates **religious freedom, equal citizenship, women and youth empowerment, environmental care, and rejection of hate and violence**. It positions Islam as a faith of mercy and unity, promoting **global peace, coexistence, and human dignity** through authentic, compassionate Islamic values.

Read More
Loading