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बिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक

**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।

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