लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
अमेरिकी हास्य कलाकार लिली टॉमलिन का एक मशहूर कथन है “चूहा दौड़ की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अगर आप जीत भी जाएँ, तब भी आप चूहा ही रहते हैं।” यह बात सुनने में भले मज़ाक लगे, लेकिन इसके भीतर हमारे समय की एक गहरी सच्चाई छुपी हुई है। यह कथन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम ज़िंदगी में जिस दौड़ में शामिल हैं, क्या वह सच में हमारी ज़रूरत है या हमें उसमें जबरन धकेल दिया गया है। आज हमारा समाज एक ऐसी अदृश्य दौड़ पर टिका हुआ है, जिसमें लगभग हर इंसान भाग रहा है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि ज़िंदगी में आगे बढ़ना है तो दूसरों से आगे निकलना होगा। अच्छे नंबर लाओ, अच्छी नौकरी पाओ, बड़ा ओहदा हासिल करो। धीरे-धीरे यह सोच इतनी गहरी बैठ जाती है कि हम यह पूछना ही भूल जाते हैं कि हम क्यों दौड़ रहे हैं और आखिर किस दिशा में जा रहे हैं।
मेरे अपने जीवन में भी यह दौड़ हर मोड़ पर मौजूद रही। स्कूल के दिनों में नंबरों का दबाव, कॉलेज में खुद को साबित करने की बेचैनी और फिर नौकरी में तरक्की की चिंता। हर बार लगता था कि बस अब मंज़िल आ गई। लेकिन जैसे ही एक पड़ाव पूरा होता, सामने एक नई दौड़ खड़ी मिलती। इस भाग-दौड़ में मैं यह भूल गया कि तालीम का असली मकसद सिर्फ़ रोज़ी-रोटी कमाना नहीं, बल्कि इंसान के भीतर समझ, संवेदना, संतुष्टि और आत्मविश्वास पैदा करना भी है। इस दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि मैंने अपनी कई पसंदीदा चीज़ों को पीछे छोड़ दिया। जो काम दिल को सुकून देते थे, उन्हें यह कहकर टाल दिया कि “अभी वक़्त नहीं है।” ज़िंदगी धीरे-धीरे सिर्फ़ उपलब्धियों की सूची बन गई। तब समझ आया कि जब इंसान अपनी ज़िंदगी को केवल नतीजों से तौलने लगता है, तो वह खुद से दूर होता चला जाता है।
आज के दौर में व्यस्त रहना ही सफलता की निशानी मान ली गई है। अगर आप हर समय थके हुए नहीं हैं, तो माना जाता है कि आप मेहनत नहीं कर रहे। मैंने भी इस सोच को जिया है। कई बार लगा कि अगर मैं रुक गया, तो लोग मुझे पीछे छूट हुआ समझेंगे लेकिन जब मन की थकान बढ़ने लगी, चिड़चिड़ापन रहने लगा और दिल खाली-खाली सा महसूस हुआ, तब एहसास हुआ कि लगातार भागते रहना कोई कामयाबी नहीं है। असली ज़रूरत संतुलन की है। जिंदगी में बहुत से काम हैं और सारे काम महत्वपूर्ण हैं, आपको बस इन कामों के बीच संतुलन बनाए रखना है।
इस चूहा दौड़ की एक और बड़ी परेशानी है इम्पोस्टर सिंड्रोम। यानी अपनी ही कामयाबी पर शक करना। मुझे भी कई बार ऐसा लगा कि जो कुछ मैंने हासिल किया है, वह मेरी काबिलियत की वजह से नहीं, बल्कि किस्मत से हुआ है। यह भावना अकेले पैदा नहीं होती। जब हर वक़्त दूसरों से तुलना कराई जाती है, जब सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी ज़िंदगी को परफेक्ट दिखाता है, तब इंसान को लगता है कि वह कभी काफ़ी नहीं है। धीरे-धीरे मैंने समझा कि दूसरों से तुलना करना आत्मविश्वास को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। अपनी ताक़त और अपनी कमज़ोरी को स्वीकार करना ही खुद पर भरोसा करने की पहली सीढ़ी है।
यहीं पर आपको रुककर दो शब्दों का फर्क समझने की ज़रूरत है। पहला है ‘स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग’, जो पूरी तरह से पैसे और भौतिक चीज़ों पर आधारित है। यह दिखाता है कि आपके पास क्या-क्या है ? बड़ी गाड़ी, महँगा फोन, बड़ा घर। यह अक्सर बाहर की दुनिया को दिखाने के लिए होता है। दूसरा है ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ (जीवन की गुणवत्ता)। इसका मतलब है कि आप असल में कैसा महसूस करते हैं। यह आपकी अंदर की दुनिया है। पैसा ज़रूरी है, लेकिन सिर्फ बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने तक। असली ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ भौतिक चीज़ों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बातों से बनती है। जैसे, क्या आप रात में तनाव-मुक्त नींद ले पा रहे हैं? क्या आपके पास अपने परिवार, बच्चों और माता-पिता के साथ बैठकर बात करने का समय है? क्या आप वो किताब पढ़ पा रहे हैं जो आप पढ़ना चाहते थे? और क्या आप अपने काम से सच्ची संतुष्टि महसूस करते हैं?
अगर आप इस दौड़ से बाहर निकलना चाहते हैं, तो सिर्फ सोचना काफी नहीं होगा। आपको कुछ सचेत कदम उठाने होंगे। सबसे पहला कदम है, अपनी ‘सफलता’ को खुद परिभाषित करना। दूसरों की डिक्शनरी से ‘सफलता’ शब्द उधार लेना बंद करें। आप खुद तय करें कि आपके लिए ‘सफल’ होने का क्या मतलब है। दूसरा कदम है, ‘तुलना’ को ‘आभार’ (Gratitude) से बदलना। जब भी आप खुद को किसी और से तुलना करते हुए पाएं, तुरंत रुक जाएं। इसके बजाय, उन तीन चीज़ों के बारे में सोचें जो आपके पास अभी हैं और जिनके लिए आप आभारी हैं जैसे आपका स्वास्थ्य या आपका परिवार। तुलना आपको हमेशा गरीब महसूस कराएगी, जबकि आभार आपको अमीर महसूस कराएगा।
आज मैंने यह तय किया है कि ज़िंदगी की दौड़ दूसरों को हराने की नहीं, बल्कि अपने भीतर सुकून खोजने की होनी चाहिए। कामयाबी का मतलब सिर्फ़ पैसा या पहचान नहीं है। दिल की शांति, रिश्तों की अहमियत और छोटे-छोटे लम्हों की खुशी भी कामयाबी का हिस्सा हैं। अब मैं कोशिश करता हूँ कि अपनी छोटी-छोटी उपलब्धियों को भी महत्व दूँ। यह सफ़र आसान नहीं है, क्योंकि समाज बार-बार हमें उसी पुरानी दौड़ में वापस खींच लेता है। लेकिन अब रुककर सांस लेना, ठहरकर सोचना और अपने लिए वक़्त निकालना मुझे गलत नहीं लगता। याद रखें ज़िंदगी सिर्फ़ मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है। अगर रास्ता ही थका देने वाला हो, तो मंज़िल भी खुशी नहीं दे पाती। कभी-कभी दौड़ से बाहर आ जाना हार नहीं होता, बल्कि समझदारी और आत्मसम्मान की निशानी होता है।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।