लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
आज की दुनिया में इज़राइल–फिलिस्तीन का मसला हो या ईरान के साथ युद्ध , यह केवल जमीन का विवाद नहीं रह गया है। इसके पीछे कई धार्मिक और राजनीतिक विचारधाराएँ भी सक्रिय हैं। इन्हीं में एक महत्वपूर्ण विचारधारा क्रिश्चियन जायनिज्म है। यह सोच मुख्य रूप से अमेरिका और यूरोप के कुछ ईसाई समूहों में पाई जाती है, खासकर उन इवेंजेलिकल ईसाइयों में जो बाइबल की कुछ विशेष व्याख्याओं पर भरोसा करते हैं। उनके अनुसार यहूदियों का अपनी प्राचीन भूमि में वापस लौटना और वहाँ एक मजबूत राज्य बनाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि ईश्वर की योजना का हिस्सा है। इस सोच में इज़राइल का अस्तित्व और उसका विस्तार बाइबल की भविष्यवाणियों को पूरा करने की दिशा में एक कदम माना जाता है। यही कारण है कि पश्चिमी दुनिया के कुछ धार्मिक और राजनीतिक समूह इज़राइल को केवल एक देश नहीं बल्कि एक धार्मिक मिशन के रूप में देखते हैं।
इस विचारधारा की जड़ें बाइबल की उन आयतों में खोजी जाती हैं जिनमें कहा गया है कि ईश्वर ने हजरत इब्राहीम और उनके वंशजों से वादा किया था कि कनान की भूमि उनके लिए निर्धारित है। क्रिश्चियन जायनिस्ट इस वादे को स्थायी और बिना शर्त मानते हैं। उनका विश्वास है कि जो लोग इज़राइल का समर्थन करेंगे उन्हें ईश्वर का आशीर्वाद मिलेगा और जो उसका विरोध करेंगे उन्हें सज़ा मिलेगी। इसी कारण वे इज़राइल की नीतियों का लगभग बिना शर्त समर्थन करते हैं। उनके लिए यह केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सवाल नहीं बल्कि धार्मिक आस्था का हिस्सा बन जाता है।
क्रिश्चियन जायनिज्म से जुड़ी सबसे चर्चित अवधारणाओं में से एक “ग्रेटर इज़राइल” का विचार है। इस अवधारणा के अनुसार इज़राइल की सीमाएँ केवल आज के नक्शे तक सीमित नहीं हैं बल्कि बाइबल में वर्णित उस बड़े क्षेत्र तक फैली हुई मानी जाती हैं जो मिस्र की नील नदी से लेकर इराक की फरात नदी तक बताया जाता है। जेनेसिस (Genesis 15:18) में इस भूमि का वर्णन “मिस्र की नदी से लेकर महान नदी फरात तक” के रूप में मिलता है। इस व्याख्या के आधार पर कुछ लोग मानते हैं कि इस क्षेत्र में वर्तमान इज़राइल और फिलिस्तीन के अलावा जॉर्डन, लेबनान, सीरिया के हिस्से, इराक का कुछ भाग और मिस्र का भी एक हिस्सा शामिल हो सकता है। हालांकि यह विचार हर इज़राइली या हर यहूदी नहीं मानता, लेकिन धार्मिक राष्ट्रवाद से जुड़े कुछ समूह इसे अपनी अंतिम मंज़िल के रूप में देखते हैं। इसी संदर्भ में कभी-कभी इज़राइल के झंडे की दो नीली धारियों का उल्लेख भी किया जाता है। कुछ लोग इन्हें नील और फरात नदियों का प्रतीक मानते हैं, जबकि बीच में बना दाऊद का सितारा यहूदी पहचान का चिन्ह है। हालांकि इतिहासकारों के बीच इस व्याख्या को लेकर मतभेद भी पाए जाते हैं, लेकिन राजनीतिक बहसों में यह तर्क अक्सर सामने आता है।
क्रिश्चियन जायनिज्म से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण विचार “थर्ड टेंपल” यानी तीसरे मंदिर के निर्माण का है। यहूदी परंपरा के अनुसार यरुशलम में पहले दो पवित्र मंदिर थे। पहला मंदिर हजरत सुलेमान के समय बनाया गया था जिसे बाबुल के राजा ने नष्ट कर दिया। बाद में दूसरा मंदिर बना जिसे रोमन साम्राज्य ने 70 ईस्वी में ध्वस्त कर दिया। कुछ धार्मिक समूह मानते हैं कि तीसरा मंदिर बनने के साथ एक नए मसीहाई युग की शुरुआत होगी। कई क्रिश्चियन जायनिस्ट भी इसी धारणा से प्रभावित हैं। उनका विश्वास है कि जब यहूदी पूरी तरह अपनी भूमि पर इकट्ठा हो जाएंगे, यरुशलम पर उनका पूर्ण नियंत्रण होगा और वहाँ तीसरा मंदिर बन जाएगा, तब ईसा मसीह दोबारा धरती पर आएंगे। इस घटना को वे “सेकंड कमिंग” कहते हैं और इसे दुनिया के अंतिम दौर की शुरुआत मानते हैं।
कुछ क्रिश्चियन जायनिस्ट व्याख्याओं में यह भी कहा जाता है कि ईसा मसीह के दोबारा आने से पहले एक बड़ा वैश्विक संघर्ष होगा जिसे अक्सर आर्मगेडन कहा जाता है। इस धारणा के अनुसार दुनिया की बड़ी ताकतें और कई धार्मिक समुदाय एक अंतिम टकराव में शामिल होंगे। इस सोच में एक दिलचस्प विरोधाभास भी दिखाई देता है। जिन यहूदियों के समर्थन में आज कुछ ईसाई समूह खड़े हैं, उनकी अपनी धार्मिक भविष्यवाणी के अनुसार अंततः वही यहूदी भी उस अंतिम धार्मिक संघर्ष में मारे जाएगें या ईसाई धर्म अपना लेंगे।
अमेरिका की राजनीति में इस सोच का प्रभाव काफी गहरा माना जाता है। वहाँ लाखों इवेंजेलिकल ईसाई ऐसे हैं जो इज़राइल के समर्थन को धार्मिक कर्तव्य समझते हैं। यही लोग चुनावों में एक बड़ा वोट बैंक बनते हैं और अक्सर उन नेताओं को समर्थन देते हैं जो इज़राइल के साथ मजबूत संबंध रखने की बात करते हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि 2018 में अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से यरुशलम स्थानांतरित करने का निर्णय भी इसी धार्मिक और राजनीतिक दबाव का परिणाम था।
इसके साथ एक रणनीतिक पहलू भी जुड़ा हुआ है। अमेरिका और यूरोप के कई नीति-निर्माता इज़राइल को मध्य-पूर्व में अपना सबसे भरोसेमंद सहयोगी मानते हैं। उनके लिए इज़राइल केवल एक मित्र देश नहीं बल्कि उस क्षेत्र में एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक ठिकाना भी है। इस तरह कई बार धार्मिक विश्वास और भू-राजनीतिक हित एक ही दिशा में काम करते दिखाई देते हैं, जिससे धर्म, राजनीति और शक्ति का एक जटिल मेल बन जाता है।
हालाँकि इस विचारधारा की आलोचना भी कम नहीं है। कई विद्वान और मानवाधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि यह सोच फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और उनके दुख को लगभग नजरअंदाज कर देती है। उनका तर्क है कि जब किसी धार्मिक भविष्यवाणी को राजनीतिक नीति का आधार बना दिया जाता है तो उसके परिणाम अक्सर संघर्ष और हिंसा के रूप में सामने आते हैं। इसी कारण कुछ लोग इसे धर्म और सत्ता के खतरनाक मिश्रण के रूप में देखते हैं।
मुस्लिम दुनिया में भी इस पूरी बहस को गहरी चिंता के साथ देखा जाता है। बहुत से मुसलमानों के लिए यरुशलम केवल एक ऐतिहासिक शहर नहीं बल्कि एक पवित्र स्थान है जहाँ मस्जिद-ए-अक्सा स्थित है। इसलिए जब “ग्रेटर इज़राइल” या “थर्ड टेंपल” जैसे विचार सामने आते हैं तो यह आशंका पैदा होती है कि इससे न केवल फिलिस्तीनी जनता के अधिकार प्रभावित होंगे बल्कि इस्लामी पवित्र स्थलों की स्थिति भी बदल सकती है। इस प्रकार क्रिश्चियन जायनिज्म केवल एक धार्मिक विचार नहीं रह गया है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुका है। इसके धार्मिक विश्वास, राजनीतिक दबाव और रणनीतिक हित मिलकर ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जहाँ मध्य-पूर्व का संघर्ष केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं बल्कि वैश्विक बहस का विषय बन जाता है।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।