लेखक: अब्दुल्लाह मंसूर

​क्या आप हिरू ओनोदा को जानते हैं? यह कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसने अपनी ‘ड्यूटी’ और ‘वफादारी’ के नाम पर अपनी जिंदगी के अनमोल तीस साल एक जंगल में बर्बाद कर दिए। लेकिन ठहरिये, यह कहानी सिर्फ जापान के एक सैनिक की नहीं है, गहराई से देखें तो यह कहानी कहीं न कहीं हम सबकी है। बात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है जब 1944 में जापान के 22 साल के एक युवा जासूस, हिरू ओनोदा को फिलीपींस के लुबांग द्वीप पर भेजा गया। उसे विदा करते समय उसके अधिकारी ने एक बहुत सख्त आदेश दिया था— “चाहे कुछ भी हो जाए, तुम्हें आत्मसमर्पण नहीं करना है। डटे रहना, हम तुम्हें लेने वापस आएंगे।” ओनोदा ने इस आदेश को अपने दिल पर पत्थर की लकीर की तरह उकेर लिया और जंगल में मोर्चा संभाल लिया।

​अगले ही साल, यानी 1945 में युद्ध खत्म हो गया और जापान हार गया। आसमान से पर्चे गिराकर जंगल में छिपे सैनिकों को बताया गया कि युद्ध समाप्त हो चुका है। यहाँ तक कि उसके परिवार की तस्वीरें और भाई की आवाज़ वाली रिकॉर्डिंग भी जंगल में गिराई गई। लेकिन ओनोदा का भ्रम इतना गहरा था कि उसने इसे दुश्मन की चाल समझा। वह जंगल में और गहरा छिप गया। साल गुजरते गए, दशक बीत गए, दुनिया पूरी तरह बदल गई, लेकिन ओनोदा वहीं रुका रहा। उसके साथी एक-एक करके या तो मारे गए या उन्होंने सरेंडर कर दिया, लेकिन ओनोदा अकेला डटा रहा। वह 29 सालों तक जी हाँ, पूरे 29 सालों तक कीड़े-मकोड़े खाता रहा, बारिश और तूफानों में सोया, और उन स्थानीय किसानों को दुश्मन समझकर मारता रहा जो दरअसल निर्दोष नागरिक थे। उसे पता ही नहीं था कि जिस ‘साम्राज्य’ के लिए वह लड़ रहा है, वह कब का मिट चुका है।

​साल 1974 में, जब ओनोदा बूढ़ा हो चुका था, तब उसका पुराना कमांडर, जो अब रिटायर होकर एक किताबों की दुकान चलाता था, उसे ढूँढते हुए जंगल में आया। उसने ओनोदा के सामने खड़े होकर कांपती आवाज में अपना आदेश पढ़ा कि “युद्ध 30 साल पहले खत्म हो चुका है, अब हथियार डाल दो।” उस पल ओनोदा सन्न रह गया। जिन हथियारों को उसने अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखा था, वे अचानक उसे भारी लगने लगे। उसे अहसास हुआ कि उसने अपनी जिंदगी का सबसे कीमती समय, अपनी जवानी और अपने सपने, सब कुछ एक ऐसे युद्ध के लिए होम कर दिया जो असल दुनिया में अस्तित्व ही नहीं रखता था। अगर उसने 1945 में उन पर्चों पर विश्वास कर लिया होता, तो वह जापान लौटकर एक खुशहाल जीवन जी सकता था। उसकी वफादारी ने उसे महान नहीं बनाया, बल्कि उसे एक चलती-फिरती त्रासदी बना दिया।

​जब हम ओनोदा के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें लगता है कि कोई इतना जिद्दी कैसे हो सकता है? लेकिन अगर हम ईमानदारी से खुद को देखें, तो हममें से कई लोग अपनी जिंदगी में ‘ओनोदा’ बनकर जी रहे हैं। हिरू ओनोदा का जंगल फिलीपींस में था, लेकिन हमारा जंगल हमारे दिमाग में है। हम भी कई बार उन लड़ाइयों को लड़ते रहते हैं जो कब की खत्म हो चुकी हैं। कभी हम पुरानी रंजिशों को लेकर बैठे रहते हैं, जहाँ सामने वाला शायद बात भूल भी चुका हो, लेकिन हम अपने दिमाग के जंगल में उससे आज भी लड़ रहे हैं। हमारी इस जिद का नुकसान सिर्फ हमें नहीं होता, बल्कि ओनोदा की तरह हम अपने आसपास के लोगों अपने परिवार, अपने बच्चों और दोस्तों—को भी अनजाने में चोट पहुँचाते रहते हैं।

​ओनोदा की कहानी हमें ‘दृढ़ता’ नहीं, बल्कि ‘जागरूकता’ का पाठ पढ़ाती है। हिरू ओनोदा की कहानी हमें एक बहुत कड़वा सच दिखाती है ‘गलत नक्शे के सहारे आप सही मंजिल तक नहीं पहुंच सकते।’ मोटिवेशन की दुनिया में हमें अक्सर सिखाया जाता है कि “कभी हार मत मानो”, लेकिन ओनोदा की जिंदगी हमें सिखाती है कि कभी-कभी हार मान लेना ही सबसे बड़ी जीत होती है। यह जानना बहुत जरूरी है कि आप जिस पहाड़ पर चढ़ रहे हैं, क्या वह सही पहाड़ है? आज खुद से एक सवाल पूछिए  “क्या मेरी जिंदगी में कोई ऐसा युद्ध है जो खत्म हो चुका है, लेकिन मैं अब भी हथियार तानें खड़ा हूँ?” अगर जवाब हाँ है, तो अपने कमांडर खुद बनिए। खुद को आदेश दीजिए हथियार डालने का। अपनी गलतियों, अपने अतीत और अपनी जिद को माफ कर दीजिए। जंगल से बाहर निकलिए, क्योंकि सूरज चमक रहा है और दुनिया आगे बढ़ चुकी है। अपनी पुरानी, जंग लगी बंदूक को नीचे रखिए और उस नई जिंदगी को गले लगाइए जो आपका इंतजार कर रही है।​