लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर

सोशल मीडिया आज के दौर में एक ऐसा विरोधाभासी मंच बन चुका है, जहाँ अक्सर ‘क्रांति’ का शोर तो बहुत होता है, लेकिन बदलाव की ज़मीन पूरी तरह नदारद रहती है। यहाँ ऐसे विवाद खड़े किए जाते हैं जो सतह पर तो आधुनिक, विद्रोही और क्रांतिकारी लगते हैं, लेकिन जब उनकी परतों को उधेड़ा जाता है, तो वे समाज के लिए, और विशेषकर हमारी आने वाली नस्लों के लिए बेहद घातक साबित होते हैं। हाल ही में इन्फ्लुएंसर दिविजा भसीन (जिन्हें ‘ऑक्वर्ड गोट’ के नाम से जाना जाता है) द्वारा शुरू किया गया विवाद इसका एक ज्वलंत और चिंताजनक उदाहरण है। दिविजा ने अपने एक वीडियो में “रंडी” जैसी अपमानजनक, शोषक और महिला-विरोधी गाली को “रिक्लेम” (पुनः प्राप्त) करने का प्रयास किया। उनका तर्क था कि इस शब्द को एक गाली के बजाय गर्व का प्रतीक बना दिया जाए। इसी विकृत सोच ने “Proud Randi” अभियान की नींव रखी। देखते ही देखते यह ट्रेंड #ProudRandi के रूप में इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर जंगल की आग की तरह फैल गया, जहाँ हज़ारों यूज़र्स, बिना इसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी परिणामों को समझे, इसे एक ‘बैज ऑफ ऑनर’ की तरह इस्तेमाल करने लगे।

शुरुआती दौर में यह अभियान एक आधुनिक ‘फेमिनिस्ट मूवमेंट’ जैसा प्रतीत हुआ। दिविजा और उनके समर्थकों ने पश्चिम के “स्लट वॉक” (Slut Walk) जैसे आंदोलनों की तर्ज पर तर्क दिया कि अपशब्दों को अपनाकर महिलाएं अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकती हैं। उनका मानना था कि अगर समाज उन्हें गाली देता है, तो उस गाली को ही अपनी पहचान बना लेना चाहिए ताकि उसका दंश खत्म हो जाए। सैद्धांतिक रूप से यह सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन भारतीय सामाजिक परिवेश में यह तर्क पूरी तरह से विफल, खोखला और खतरनाक है। समस्या तब विकराल हो गई जब युवा लड़कियां, और खास तौर पर 13-14 साल की टीनएजर्स, अपने इंस्टाग्राम बायो में #ProudRandi लिखने लगीं।

सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई जहाँ नाबालिग बच्चियां इस गाली को गर्व से दोहरा रही थीं। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील और सभ्य समाज के लिए चिंताजनक था। माता-पिता और समाज के एक बड़े प्रबुद्ध वर्ग ने इसे अश्लील और आपत्तिजनक माना। भारतीय जनमानस में “रंडी” शब्द का सीधा जुड़ाव वेश्यावृत्ति, देह व्यापार और यौन शोषण से है। जब नाबालिगों के बायो में यह शब्द दिखा, तो सवाल उठना लाज़िमी था कि क्या हम अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बच्चों को ‘सॉफ्ट पोर्नोग्राफी’ या यौनिकरण की दिशा में नहीं धकेल रहे? हालात इतने बिगड़े कि कई जगहों पर एफआईआर (FIR) दर्ज हुईं और पुलिस ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत संज्ञान लिया, क्योंकि यह ट्रेंड नाबालिगों को सीधे तौर पर वयस्क और अश्लील सामग्री से जोड़ रहा था।

विशेषाधिकार का नशा और डिजिटल छलावा

इस पूरे घटनाक्रम का अगर बारीकी से विश्लेषण किया जाए, तो यह समाज सुधार की मुहिम कम और ‘रेज बेटिंग’ (Rage Baiting) का धंधा ज्यादा नज़र आता है। डिजिटल मार्केटिंग और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में ‘रेज बेटिंग’ का मतलब है जानबूझकर ऐसा भड़काऊ, अतार्किक और विवादित कंटेंट बनाना जिससे लोग गुस्से में आएं, कमेंट करें और एल्गोरिदम वीडियो को वायरल कर दे। दिविजा और उन जैसे इन्फ्लुएंसर्स के लिए यह एक सोची-समझी रणनीति थी। जब आलोचना हुई, तो अपनी गलती स्वीकारने या बच्चों पर पड़ने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभाव की जिम्मेदारी लेने के बजाय, उन्होंने कुतर्कों का सहारा लिया। उनका तर्क था कि “अगर मर्द औरतों को गाली देते हैं, तो औरतों को भी वह गाली अपना लेनी चाहिए।” यह तर्क न केवल खोखला है बल्कि बौद्धिक दिवालियेपन की निशानी है। यह वैसा ही है जैसे कोई कहे कि अगर समाज में कोई संक्रामक बीमारी फैली है, तो हमें उसके इलाज की जगह जानबूझकर बीमार हो जाना चाहिए ताकि बीमारी का डर खत्म हो जाए।

आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए ये इन्फ्लुएंसर्स ‘विक्टिम कार्ड’ और ‘लेबलिंग’ का सहारा लेते हैं, जो स्वस्थ बहस की गुंजाइश को खत्म कर देता है। जब कोई पुरुष इस ट्रेंड का तार्किक विरोध करता है, तो उसे तुरंत ‘मिसोजिनिस्ट’ (महिला-विरोधी) घोषित कर दिया जाता है। यदि कोई महिला इसका विरोध करे, तो उसे ‘पिक मी’ (Pick Me – पुरुषों का ध्यान खींचने वाली) कहकर उसकी आवाज़ दबा दी जाती है। इसे ‘चरित्र हनन’ की रणनीति कहते हैं, ताकि असली मुद्दे कि “आप बच्चों को गाली देना क्यों सिखा रहे हैं?” से ध्यान भटकाकर उसे “मर्द हमें क्यों दबा रहे हैं” पर ले जाया जा सके। इनका मकसद समाज सुधार नहीं, बल्कि अपनी सोशल मीडिया की दुकान चलाना है, एंगेजमेंट बढ़ाना है, चाहे उसकी कीमत समाज का नैतिक पतन ही क्यों न हो। वे यह भूल जाते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है, और जब आपके दर्शक नाबालिग हों, तो यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

जमीनी हकीकत और वंचितों का अपमान

इस विवाद का सबसे दुखद और विडंबनापूर्ण पहलू वह है जो ‘फेमिनिज्म’ के मूल सिद्धांतों पर चोट करता है। सोशल मीडिया पर ‘प्राउड’ और ‘स्लैंग’ की इस लड़ाई के बीच उन महिलाओं की सिसकियाँ अनसुनी रह गईं जो वास्तव में वेश्यावृत्ति के दलदल में फँसी हैं। ‘रंडी’ शब्द किसी पॉश इलाके के सुरक्षित एसी कमरे में बैठे इन्फ्लुएंसर के लिए ‘रिबेलियस’ (विद्रोही) होने का एक फैंसी तमगा हो सकता है, लेकिन रेड लाइट इलाकों की तंग और अंधेरी गलियों में बैठी उस औरत के लिए यह शब्द उसकी विवशता, लाचारी और रूह के छलनी होने का प्रमाण है। वहाँ देह व्यापार कोई ‘चॉइस’ या ‘सशक्तिकरण’ का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह पेट की आग, मानव तस्करी या पुश्तैनी गरीबी की मजबूरी है। जब संभ्रांत और कुलीन वर्ग की महिलाएं इस शब्द को ‘ग्लेमराइज’ (Glamourize) करती हैं, तो वे अनजाने में उन शोषित महिलाओं के दर्द, उनकी सामाजिक अछूत स्थिति और उनके रोज़मर्रा के शारीरिक व मानसिक शोषण का क्रूर मखौल उड़ाती हैं। उस शोषित वर्ग का दर्द यह है कि उनके लिए यह शब्द कोई डिजिटल ‘हैशटैग’ नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक कलंक है जिसे वे चाहकर भी अपने माथे से मिटा नहीं सकतीं।

इसके अतिरिक्त, जो इन्फ्लुएंसर्स अपनी स्क्रीन के पीछे बैठकर “रंडी” शब्द को गर्व का विषय बता रहे हैं, उन्हें शायद भारत की जटिल सामाजिक और जातीय संरचना का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं है। सड़क पर झाड़ू लगाने वाली, खेतों में मजदूरी करने वाली गरीब पसमांदा और दलित महिलाओं के लिए यह शब्द कितनी बड़ी हिंसा है, इसका उन्हें अंदाज़ा भी नहीं। इन वंचित समुदायों की महिलाओं के लिए यह शब्द जातिगत और लैंगिक हिंसा का हथियार है। उनके लिए यह कोई ‘कूल’ ट्रेंड नहीं, बल्कि वह शोषण और अपमान है जो उन्हें उनकी जाति और गरीबी के कारण सामंती सोच वाले पुरुषों से रोज़ झेलना पड़ता है। इतिहास गवाह है कि किसी दबे-कुचले समाज ने शब्दों को ‘रिक्लेम’ तब किया है जब उसका मकसद राजनीतिक चेतना और आत्म-सम्मान जगाना था जैसे ‘दलित’ शब्द का उत्थान। ‘दलित’ शब्द एक राजनीतिक पहचान बना, न कि गाली। ठीक ऐसे ही ‘ पसमांदा’ शब्द का अर्थ है-जो पीछे छुट गए, इस शब्द का राजनीतिक प्रयोग इस समाज को देश की मुख्य धारा में लाना है लेकिन यहाँ ‘रंडी’ शब्द को अपनाने का मकसद कोई राजनीतिक चेतना नहीं, बल्कि सिर्फ इंटरनेट पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है। यह ‘शहरी और बाज़ारू फेमिनिज्म’ उन माताओं के संघर्ष का अपमान है जो दिन-रात मेहनत करती हैं ताकि उनकी बेटियाँ इन गालियों से दूर रहें और पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर बनें।

इस ट्रेंड ने सबसे ज्यादा नुकसान उन मासूम बच्चियों का किया है जो अभी दुनिया की जटिलताओं को नहीं समझतीं। इन्फ्लुएंसर्स के पास तो कानूनी मदद के लिए वकीलों की फौज और संसाधन हैं, लेकिन जिनका डिजिटल रिकॉर्ड हमेशा के लिए खराब हो जाएगा, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब बच्चों को वयस्क और अश्लील विमर्श में धकेलना नहीं हो सकता। असली सशक्तिकरण गालियों को अपनाने या खुद को ‘बिकाऊ’ विशेषणों से नवाजने में नहीं है। हम नारीवाद के उस स्वरूप का समर्थन करते हैं जो बराबरी और सम्मान की बात करता है, न कि वह जो बाज़ारू हथकंडे अपनाता है। असली फेमिनिज्म उस सामाजिक और आर्थिक ढांचे को बदलने में है जहाँ किसी महिला को गाली देना ताकत की निशानी समझा जाता है। हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि विद्रोह का मतलब अश्लीलता नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और उन महिलाओं के लिए आवाज़ उठाना है जिनके पास बोलने का अधिकार नहीं है। एसी कमरों से बाहर निकलकर जब हम उस पसमांदा और शोषित महिला की आँखों में देखेंगे, तब समझ आएगा कि जिन शब्दों को हम ‘खेल’ समझ रहे हैं, वे असल ज़िन्दगी में ‘खंजर’ हैं।

लेखक परिचय : अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।