Tag: Islam
मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की ...
Posted by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधि...
Posted by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
इस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश...
Posted by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धा...
Posted by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?...
Posted by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims
by Arif Aziz | Mar 9, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Geo Politics | 0 |
The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.
Read Moreमुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?
by Arif Aziz | Feb 23, 2026 | Education and Empowerment, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
क़ुरआन ईश्वरीय वह्य है, जबकि तफ़्सीर मानवीय समझ की कोशिश। इतिहास में अधिकतर व्याख्याएँ पुरुष दृष्टिकोण से गढ़ी गईं, जिससे महिलाओं के अनुभव हाशिये पर रहे। क़ुरआन नैतिक बराबरी, इंसाफ़ और रहम की बात करता है। इसलिए ज़रूरी है कि वह्य और व्याख्या में फर्क पहचानकर, समकालीन संदर्भ में आयतों को उसके व्यापक नैतिक संदेश की रोशनी में समझा जाए—ताकि परंपरा को बरक़रार रखते हुए न्यायपूर्ण पुनर्विचार संभव हो।
Read Moreवैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार
by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।
Read Moreइस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेखिका ~ डॉ. उज़्मा खातून मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर के बीच हालिया बहस ने ख़ुदा के वजूद...
Read More“काफ़िर” शब्द की असलियत: सियासी गाली से क़ुरआनी संदर्भ तक
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Culture and Heritage, Social Justice and Activism | 0 |
— डॉ. उज़्मा ख़ातून आज के सियासी माहौल में ‘काफ़िर’ शब्द को उसकी रूहानी और धार्मिक...
Read MoreReclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context
by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous, Political | 0 |
Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.
Read Moreबांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धांतों की एक परीक्षा
by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
लेखक – डॉ. उज़्मा खातून (नोट: यह लेख मूलतः अंग्रेजी में “Hindu Persecution in Bangladesh:...
Read Moreबहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?
by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।
Read Moreमुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्यों है?
by Arif Aziz | Dec 11, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
इस्लामिक फेमिनिज्म मुस्लिम समाजों में बराबरी और लैंगिक न्याय को पुनर्जीवित करने वाला आंदोलन है, जो कुरान और हदीस की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देकर उनके नैतिक उसूलों—इंसाफ, तौहीद और तक़वा—को केंद्र में रखता है। अस्मा बरलास, अमीना वदूद और फातिमा मेरनिसी जैसी विद्वान दिखाती हैं कि कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक पितृसत्ता की उपज हैं। यह आंदोलन कानूनी व सामाजिक सुधारों, विशेषकर पारिवारिक कानूनों में समानता की मांग करता है। आलोचनाओं के बावजूद, इस्लामिक फेमिनिज्म औरतों के अधिकार, गरिमा और समान भागीदारी को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read Moreहिजाब: अशराफ़िया पितृसत्ता और पसमांदा पहचान का द्वंद्व
by Abdullah Mansoor | Dec 2, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
~ अब्दुल्लाह मंसूर एक तरफ ईरान में लड़कियाँ #FreeFromHijab का नारा बुलंद करते हुए हिजाब को हवा में...
Read Moreगाजा शांति प्रस्ताव: न्याय, पुनर्निर्माण और अस्थिर भविष्य
by Arif Aziz | Oct 28, 2025 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक: अब्दुल्लाह मंसूर गाजा में युद्धविराम की घोषणा केवल बंदूकों की गूंज का शांत होना नहीं है। यह...
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- खामेनेई के बाद का ईरान: रिजजीम चेंज’ के पश्चिमी भ्रम और सैन्य तंत्र की उभरती चुनौती
- मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?