Tag: Islam

Not in Islam’s Name: Rethinking the Taliban’s Legal Claims

The Taliban’s new “Criminal Procedure Code for Courts” has raised serious concerns among human rights observers, particularly regarding women’s rights and legal equality in Afghanistan. Critics argue that the framework normalizes domestic abuse, imposes unfair evidentiary burdens on women, and reflects tribal customs rather than broader Islamic principles. From an Islamic scholarly perspective, the debate highlights the urgent need to distinguish between divine ethical teachings and human interpretations, reaffirming justice, compassion, and education as core Islamic values.

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मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?

क़ुरआन ईश्वरीय वह्य है, जबकि तफ़्सीर मानवीय समझ की कोशिश। इतिहास में अधिकतर व्याख्याएँ पुरुष दृष्टिकोण से गढ़ी गईं, जिससे महिलाओं के अनुभव हाशिये पर रहे। क़ुरआन नैतिक बराबरी, इंसाफ़ और रहम की बात करता है। इसलिए ज़रूरी है कि वह्य और व्याख्या में फर्क पहचानकर, समकालीन संदर्भ में आयतों को उसके व्यापक नैतिक संदेश की रोशनी में समझा जाए—ताकि परंपरा को बरक़रार रखते हुए न्यायपूर्ण पुनर्विचार संभव हो।

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वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार

लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।

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Reclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context

Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.

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बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?

भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।

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मुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्यों है?

इस्लामिक फेमिनिज्म मुस्लिम समाजों में बराबरी और लैंगिक न्याय को पुनर्जीवित करने वाला आंदोलन है, जो कुरान और हदीस की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देकर उनके नैतिक उसूलों—इंसाफ, तौहीद और तक़वा—को केंद्र में रखता है। अस्मा बरलास, अमीना वदूद और फातिमा मेरनिसी जैसी विद्वान दिखाती हैं कि कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक पितृसत्ता की उपज हैं। यह आंदोलन कानूनी व सामाजिक सुधारों, विशेषकर पारिवारिक कानूनों में समानता की मांग करता है। आलोचनाओं के बावजूद, इस्लामिक फेमिनिज्म औरतों के अधिकार, गरिमा और समान भागीदारी को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है।

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डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका

यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।

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