Tag: Casteism
ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल...
Posted by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों...
Posted by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’:...
Posted by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
आधुनिक शिक्षा के नाम पर भेदभाव? सर सैयद पर बड़ा सव...
Posted by Arif Aziz | Oct 20, 2025 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
कर्बला की विरासत: शियाओं ने अपनी पहचान कैसे बनाई?...
Posted by Arif Aziz | Jul 29, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Political | 0 |
समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद
by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।
मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।
Read Moreओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल
by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read Moreहिजाब: अशराफ़िया पितृसत्ता और पसमांदा पहचान का द्वंद्व
by Abdullah Mansoor | Dec 2, 2025 | Casteism, Gender Equality and Women's Rights | 0 |
~ अब्दुल्लाह मंसूर एक तरफ ईरान में लड़कियाँ #FreeFromHijab का नारा बुलंद करते हुए हिजाब को हवा में...
Read Moreअशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ
by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।
Read Moreआधुनिक शिक्षा के नाम पर भेदभाव? सर सैयद पर बड़ा सवाल!
by Arif Aziz | Oct 20, 2025 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
अब्दुल्ला मंसूर ज्यादातर हम समझते हैं कि मौलवी या उलेमा ही धार्मिक उपदेश के जरिए मतिभ्रम फैलाते...
Read Moreकर्बला की विरासत: शियाओं ने अपनी पहचान कैसे बनाई?
by Arif Aziz | Jul 29, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Political | 0 |
डॉ. उज्मा खातून कर्बला की जंग का अंत सिर्फ एक दुखद घटना नहीं था, बल्कि इस्लामी इतिहास का एक गहरा,...
Read Moreसुपर हीरो की दुनिया में नस्लवाद: ‘वॉचमेन’ की समीक्षा
by Abdullah Mansoor | Jul 6, 2025 | Movie Review, Reviews | 0 |
लेखक :-अब्दुल्लाह मंसूर सुपरहीरो की कहानियाँ अक्सर काल्पनिक दुनिया में अच्छाई और बुराई के बीच होने...
Read Moreपसमांदा आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास
by pasmanda_admin | Mar 12, 2025 | Culture and Heritage, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
पसमांदा एक उर्दू शब्द है, जिसका अर्थ “जो पीछे रह गया” होता है। यह मुस्लिम धर्मावलंबी दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। इसका इतिहास संत कबीर से जुड़ता है, जिन्होंने इस्लाम में जातिवाद का विरोध किया। बाद में, मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी ने मोमिन कॉन्फ्रेंस की स्थापना की, जो एक संगठित पसमांदा आंदोलन बना। बंगाल में हाजी शरीयतुल्लाह के फरायज़ी आंदोलन और पंजाब में अगरा सहूतरा के प्रयास भी महत्वपूर्ण रहे। महाराष्ट्र में शब्बीर अंसारी ने ओबीसी सूची में पसमांदा जातियों को शामिल कराने की लड़ाई लड़ी। असम में फैय्याजुद्दीन अहमद ने मछुआरा समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। अली अनवर, डॉ. अय्यूब राईन और अन्य पसमांदा नेताओं ने सामाजिक न्याय के लिए काम किया। आज भी कई संगठन पसमांदा अधिकारों के लिए सक्रिय हैं, और डिजिटल मीडिया के माध्यम से यह विमर्श मुख्यधारा में आ रहा है।
Read Moreक्या है मुस्लिम तुष्टिकरण का असली सच? एक विचारोत्तेजक पड़ताल
by Abdullah Mansoor | Feb 11, 2025 | Casteism, Culture and Heritage, Pasmanda Caste | 0 |
इस नीति की चपेट में सबसे ज़्यादा वे लोग आये जिन्होंने कालांतर में किन्हीं कारणों से अपना मतांतरण करके मुस्लिम धर्म अपनाया था। जो कभी भी सत्ता और शासन के निकट नहीं रहे या रहने नहीं दिया गया, जिन्हें देशज पसमांदा मुस्लिम के नाम से जानते हैं, जिनकी ज़िन्दगियों में मतांतरण का कोई विशेष लाभ दृष्टिगोचर नहीं होता है और ये अपने पूर्ववर्ती सभ्यता, संस्कृति भाषा एवम् सामाजिक संरचनाओं से जुड़े हुए रहे।
Read Moreउर्दू अदब का जातिवादी चरित्र
by pasmanda_admin | Feb 6, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Poetry and literature | 0 |
चूँकि उर्दू अशराफ की भाषा रही है इसलिए अशराफ के सभ्यता और संस्कृति की प्रतिनिधि भी रही है। इस लेख में अशराफ के जातिवादी नज़रिये की अक्कासी करती हुई उर्दू अदब (साहित्य) से सम्बंधित कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों और उनकी रचना पर विवेचना करने की कोशिश की गई है।
Read Moreबंदिश बैंडिट्स का माही – एक समाज की आवाज़ या आवाज़ का बाज़ारीकरण?
by Abdullah Mansoor | Feb 2, 2025 | Movie Review | 0 |
एंटी-कास्ट सिनेमा में बहुजन समाज का अनुभव, उनकी जीवन-शैली, संस्कृति केंद्र बिंदु पर होता है जिसे उनकी भाषा, भोजन, भाव-भंगिमा से चित्रित किया जाता है। अंबेडकरवादी विचारधारा को बोलकर नहीं बल्कि उनके कार्यों, निर्णयों, अन्याय के प्रति उनकी सोच में दिखाया जाता है। अंबेडकर, बुद्ध, कबीर, इलयाराजा का संगीत, सावित्री-ज्योतिबा फुले इत्यादि के प्रतीक चिन्ह आपको एंटी-कास्ट पात्र के आस-पास देखने को मिलते हैं जो इंगित करते हैं कि वो समाज की पहचान, इतिहास और संघर्षों के प्रति जागरूक है।
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