व्हाइट-कॉलर’ आतंक: शिक्षित दिमाग में ज़हरीली सोच

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दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर का विस्फोट दिखाता है कि आतंकवाद अब सिर्फ गरीब या अशिक्षितों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षित पेशेवर भी कट्टरपंथ का शिकार हो रहे हैं। यह साबित करता है कि चरमपंथ का मूल आर्थिक नहीं, वैचारिक ज़हर है, जो लोगों को ‘बड़े मकसद’ और ‘हम बनाम वे’ की सोच में उलझा देता है। इसका असर पूरे मुस्लिम समुदाय पर अविश्वास बढ़ाता है। समाधान तकनीकी नहीं, वैचारिक और सामाजिक है—जैसे विश्वविद्यालयों में डी-रेडिकलाइज़ेशन, सकारात्मक डिजिटल अभियान और पसमांदा आंदोलन, जो भारतीय मुसलमानों को समानता, राष्ट्रहित और संवैधानिक रास्ते से जोड़ता है।

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