✍️ — मोहम्मद कमरुद्दीन अंसारी

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की खूबसूरती यही है कि समाज के हर तबके की आवाज़ धीरे-धीरे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। पसमांदा समाज, जो लंबे समय तक सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहा, आज देश की मुख्यधारा की बहसों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में पसमांदा समाज का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक न्याय की बहसों में तेजी से उभरा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा पसमांदा समाज की स्थिति पर चिंता जताना और संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे की गूंज सुनाई देना इस बात का संकेत है कि अब यह विषय राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल हो चुका है। इससे यह उम्मीद और मजबूत होती है कि आने वाले समय में इस समाज के शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और राजनीतिक भागीदारी के लिए नए रास्ते खुलेंगे।

लेकिन केवल सरकार की पहल से ही किसी समाज का संपूर्ण उत्थान संभव नहीं होता। मोहम्मद कमरुद्दीन अंसारी ने आगे कहा कि किसी भी पिछड़े वर्ग को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना कोई भी सरकार अकेले नहीं कर सकती। इसके लिए समाज के बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जागरूक युवाओं और जनप्रतिनिधियों की समान रूप से लगन, मेहनत और ईमानदार प्रयास की आवश्यकता होती है।

असल बदलाव तब आता है जब समाज के भीतर से जागरूकता की लौ जलती है। जब बुद्धिजीवी वर्ग शिक्षा का महत्व समझाता है, सामाजिक कार्यकर्ता हक़ और अधिकार की लड़ाई को दिशा देते हैं, और युवा नई सोच के साथ आगे बढ़ते हैं, तभी कोई पिछड़ा वर्ग वास्तविक अर्थों में विकास की मुख्यधारा से जुड़ पाता है।

पसमांदा समाज के उत्थान में भी यही सामूहिक प्रयास सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। यदि सरकार की योजनाओं के साथ समाज के भीतर से जागरूकता, शिक्षा के प्रति समर्पण और सामाजिक एकजुटता का भाव जुड़ जाए, तो यह बदलाव केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि हर घर, हर गली और हर परिवार तक पहुंचेगा।

आज जरूरत इस बात की है कि पसमांदा समाज का हर जागरूक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए—कोई शिक्षा के क्षेत्र में काम करे, कोई सामाजिक न्याय के लिए आवाज़ उठाए, तो कोई युवाओं को रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की दिशा दिखाए। यही सामूहिक मेहनत आने वाले समय में इस समाज की तकदीर बदल सकती है।

युवा ही बदलाव की सबसे बड़ी ताकत

किसी भी समाज का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है, और पसमांदा समाज के युवाओं में आज नई चेतना दिखाई दे रही है। शिक्षा, तकनीक, प्रशासनिक सेवाओं, राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक नेतृत्व में उनकी बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह समाज अब पीछे रहने वाला नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि युवाओं को केवल भावनात्मक नारों तक सीमित न रखकर उन्हें शिक्षा, कौशल, नेतृत्व और संवैधानिक अधिकारों की मजबूत समझ दी जाए। जब पसमांदा युवा पंचायत से संसद तक अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगा, तब उसकी आवाज़ केवल सुनाई ही नहीं देगी, बल्कि नीतियों का हिस्सा भी बनेगी।

यही वह समय है जब पसमांदा समाज अपने संघर्ष को शिक्षा की रोशनी, सामाजिक एकता और राजनीतिक हिस्सेदारी के सहारे सम्मानजनक भविष्य में बदल सकता है। आने वाला दौर उसी का होगा, जो अपने इतिहास की पीड़ा को शक्ति बनाकर नई इबारत लिखने का साहस रखेगा।

✍️ मोहम्मद कमरुद्दीन अंसारी
राष्ट्रीय महासचिव
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज