लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर
‘Rick and Morty’ महज़ एक अमेरिकी एनीमेशन सीरीज़ नहीं है, बल्कि यह समकालीन समय का सबसे तीखा दार्शनिक और वैज्ञानिक विमर्श है। जस्टिन रोइलैंड और डैन हारमोन द्वारा रचित यह श्रृंखला पहली नज़र में एक साधारण कार्टून लग सकती है, लेकिन इसकी परतों के नीचे छिपे सवाल इतने गहरे हैं कि वे आधुनिक मनुष्य की जड़ों को हिला देते हैं। यह सीरीज़ हमें उस मोड़ पर खड़ा करती है जहाँ विज्ञान की अंतिम सीमा और दर्शन की शुरुआत होती है। यह लेख इस सीरीज़ के दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्षों का विस्तार से विश्लेषण करेगा और यह समझने की कोशिश करेगा कि क्यों रिक सांचेज़ का शून्यवाद आज के दौर की सबसे बड़ी सच्चाई बन कर उभर रहा है।
शून्यवाद, अस्तित्ववाद और मानवीय अर्थ की खोज
दर्शन की दुनिया में ‘शून्यवाद’ (Nihilism) को अक्सर एक नकारात्मक विचार माना जाता है, लेकिन रिक सांचेज़ के चरित्र के माध्यम से यह एक ‘सशक्त सत्य’ के रूप में उभरता है। रिक ब्रह्मांड का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति है, और उसकी बुद्धि ही उसका सबसे बड़ा श्राप है। वह जानता है कि यह ब्रह्मांड इतना विशाल और अनंत है कि इसमें किसी एक व्यक्ति, ग्रह या यहाँ तक कि एक पूरी प्रजाति के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब वह कहता है कि “कुछ भी मायने नहीं रखता” (Nothing matters), तो वह महज़ एक चिड़चिड़े बूढ़े की बात नहीं होती, बल्कि वह ‘कॉस्मिक निहिलिज्म’ (Cosmic Nihilism) का सार होता है। विज्ञान हमें बताता है कि ब्रह्मांड लगभग 13.8 अरब साल पुराना है और इसमें खरबों आकाशगंगाएँ हैं। इस पैमाने पर मनुष्य का इतिहास महज़ एक सेकंड के लाखवें हिस्से जैसा है। रिक इसी वैज्ञानिक तथ्य को अपने जीवन का आधार बनाता है।
यहाँ रिक का टकराव ‘अस्तित्ववाद’ (Existentialism) से होता है। अस्तित्ववाद कहता है कि भले ही ब्रह्मांड ने हमें कोई अर्थ न दिया हो, लेकिन हम अपना अर्थ खुद चुन सकते हैं। शो का दूसरा मुख्य पात्र, मोर्टी, इसी यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है। शुरुआत में मोर्टी डरा हुआ और भ्रमित बच्चा है, लेकिन एक जगह मोर्टी q अपनी बहन समर से कहता है, “कोई भी किसी मकसद के लिए पैदा नहीं हुआ है, हम सब मरने वाले हैं। चलो टी.वी. देखते हैं।” यह वाक्य अस्तित्ववाद की पराकाष्ठा है। यह बताता है कि जब आप इस भारी सच को स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन का कोई ‘तयशुदा’ अर्थ नहीं है, तब आप वास्तव में आज़ाद होते हैं। तब आप इस बात की चिंता छोड़ देते हैं कि समाज क्या सोचेगा या परंपराएँ क्या चाहेंगी।
इसी संदर्भ में हमें ‘असंगतिवाद’ (Absurdism) को भी समझना होगा। अल्बर्ट कामू का मानना था कि मनुष्य का स्वभाव अर्थ खोजना है, जबकि ब्रह्मांड स्वभाव से अर्थहीन है। इस टकराव से जो ‘असंगति’ (Absurdity) पैदा होती है, उसे ही ‘Rick and Morty’ व्यंग्य के रूप में प्रस्तुत करती है। जब रिक एक रोबोट बनाता है जिसका एकमात्र उद्देश्य मेज़ पर मक्खन पहुँचाना है, और वह रोबोट अपने अस्तित्व का मकसद पूछने पर निराश हो जाता है, तो यह हम इंसानों पर ही कटाक्ष है। हम भी उस रोबोट की तरह अपने निर्माता से अपना ‘मकसद’ पूछ रहे हैं, जबकि हो सकता है कि हमारा कोई खास मकसद हो ही न। रिक का दर्शन हमें इस कड़वे सच को हँसते हुए और साहसिक तरीके से स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
सत्ता का दर्शन, सिटाडेल की राजनीति और सामाजिक न्याय
एक सामाजिक चिंतक के तौर पर जब हम इस सीरीज़ को देखते हैं, तो ‘Citadel of Ricks’ (रिकों का किला) वाला हिस्सा हमें सत्ता और व्यवस्था के घिनौने सच दिखाता है। यह सिटाडेल हज़ारों आयामों के रिक और मोर्टी द्वारा बनाया गया एक शहर है। यहाँ एक ही जैसे लोग हैं, लेकिन यहाँ भी ‘वर्ग भेद’ (Class Struggle) और ‘सत्ता का पदानुक्रम’ (Hierarchy) मौजूद है। कुछ रिक शासक हैं, कुछ वैज्ञानिक हैं और कुछ महज़ फैक्ट्री में मज़दूर हैं। यह इस बात पर गहरा प्रहार है कि बुद्धिमत्ता या ज्ञान अकेले न्याय की गारंटी नहीं दे सकते। जब बुद्धि का संस्थागतकरण (Institutionalization) होता है, तो वह भी शोषण का औज़ार बन जाती है।
‘Evil Morty’ का उदय इसी शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ एक विद्रोह है। वह उन सभी ‘रिकों’ को चुनौती देता है जो मानते हैं कि वे ही ब्रह्मांड के केंद्र में हैं। यहाँ एक दार्शनिक सवाल खड़ा होता है: क्या कोई भी व्यवस्था (System), चाहे वह कितनी भी वैज्ञानिक क्यों न हो, बिना किसी ‘कमज़ोर वर्ग’ (Underclass) के जीवित रह सकती है? सिटाडेल में मोर्टीज़ का इस्तेमाल महज़ ‘ढाल’ के तौर पर किया जाता है। यह हमारे समाज के उस ढांचे का अक्स है जहाँ सत्ता के शिखर पर बैठे लोग हमेशा एक ऐसे वर्ग को पैदा करते हैं जिसका शोषण किया जा सके। रिक सांचेज़ खुद को किसी भी ‘काउंसिल’ या ‘फेडरेशन’ का हिस्सा नहीं बनाना चाहता क्योंकि वह जानता है कि हर सरकार अंततः तानाशाही होती है। वह ‘अराजकतावाद’ (Anarchism) का समर्थक है, जो मानता है कि व्यक्तिगत आज़ादी ही सर्वोच्च सत्य है।
यहाँ हमें रिक के ‘नार्सिसिज्म’ (Narcissism) और उसके सामाजिक न्याय के प्रति उदासीनता को भी समझना होगा। वह अक्सर खुद को भगवान से ऊपर मानता है। लेकिन यह अहंकार उसे समाज से काट देता है। वह सामाजिक न्याय की लड़ाई को “बुद्धिहीनों का खेल” मानता है क्योंकि वह जानता है कि अंततः सब कुछ नष्ट होने वाला है। लेकिन यहाँ शो एक बारीक़ व्यंग्य करता है रिक जितना ज़्यादा सिस्टम से भागता है, वह उतना ही अकेला होता जाता है। यह उन बुद्धिजीवियों के लिए एक चेतावनी है जो समाज की समस्याओं से कटकर अपने ‘आइवरी टावर’ (Ivory Tower) में बैठ जाते हैं।
विज्ञान की सीमाएँ: जैव-रसायन, अमरता और सिमुलेशन
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह सीरीज़ ‘मल्टीवर्स थ्योरी’ और ‘क्वांटम मैकेनिक्स’ की प्रयोगशाला है। लेकिन इससे भी गहरा सवाल ‘जैव-रसायन’ (Biochemistry) का है। रिक अक्सर कहता है कि जिसे लोग ‘प्यार’ कहते हैं, वह महज़ एक केमिकल रिएक्शन है। विज्ञान के पास आज इसका जवाब है ऑक्सीटोसिन, डोपामाइन और सेरोटोनिन। अगर हमारी हर भावना चाहे वह माँ का बच्चे के प्रति प्रेम हो या प्रेमी की तड़प महज़ रसायनों का खेल है, तो फिर ‘पवित्रता’ कहाँ बचती है? रिक का यह तर्क हमें ‘रिडक्शनिज्म’ (Reductionism) की ओर ले जाता है, जहाँ हर महान अनुभव को उसके सबसे छोटे भौतिक हिस्से में तोड़कर देखा जाता है।
परंतु, क्या भावना को रसायनों में तोड़ देने से उसकी ‘अनुभूति’ (Subjective Experience) खत्म हो जाती है? यहाँ विज्ञान हार जाता है। भले ही रिक जानता हो कि प्यार क्या है, लेकिन वह अपनी बेटी बेथ के प्रति अपने लगाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाता। यह उसके भीतर का मानवीय ‘Anomaly’ या विसंगति है। इसी तरह ‘सिमुलेशन थ्योरी’ का उपयोग करके शो हमें बताता है कि जिसे हम हकीकत मान रहे हैं, वह शायद किसी सुपर-कंप्यूटर का कोड हो। आदि शंकराचार्य का ‘अद्वैतवाद’ भी यही कहता है “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या”। आज का विज्ञान इसी माया को ‘वर्चुअल रियलिटी’ या ‘कंप्यूटर सिमुलेशन’ कह रहा है।
रिक अपनी तकनीकी शक्ति से ‘अमरता’ (Immortality) के करीब पहुँच चुका है। उसके पास ‘Operation Phoenix’ है, जिससे मरने के बाद उसकी यादें दूसरे शरीर में चली जाती हैं। लेकिन क्या मौत के बिना जीवन का कोई मूल्य है? दार्शनिक मार्टिन हिडेगर (Heidegger) का मानना था कि मौत ही वह चीज़ है जो हमारे जीवन को ‘अर्थ’ और ‘गंभीरता’ देती है। चूंकि रिक मर नहीं सकता, इसलिए उसके लिए जीवन एक उबाऊ खेल बन गया है। वह बार-बार खतरे मोल लेता है क्योंकि वह कुछ ‘महसूस’ करना चाहता है। यह आधुनिक तकनीक-संपन्न मनुष्य का भविष्य है, जहाँ हमारे पास सब कुछ होगा, पर जीने की इच्छा खत्म हो जाएगी। रिक का अवसाद इसी अमरता और असीमित ज्ञान का नतीजा है।
उत्तर-आधुनिकतावाद और दादावाद का संगम
सीरीज़ की संरचना और उसकी कहानी कहने का अंदाज़ ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ (Post-modernism) की याद दिलाता है। उत्तर-आधुनिकतावाद मानता है कि दुनिया में कोई भी एक ‘बड़ा सच’ (Grand Narrative) नहीं है। न धर्म, न विज्ञान, न ही मानवतावाद हमें पूरी तरह समझा सकते हैं। रिक इसी दर्शन का जीता-जागता उदाहरण है। वह हर उस संस्था का मज़ाक उड़ाता है जो अनुशासन और अर्थ की बात करती है। वह स्कूल को “समय की बर्बादी” कहता है और सरकारों को “बड़ी कंपनियों का पिछलग्गू”। यह विचार हमें ‘दादावाद’ (Dadaism) की ओर भी ले जाता है, जो कला और समाज के स्थापित नियमों को तर्कहीन और बेतुका (Nonsensical) मानकर खारिज करता है।
रिक का “Pickle Rick” (अचार वाला रिक) बनना इसी तर्कहीनता का चरम है। वह अपनी थेरेपी से बचने के लिए खुद को एक अचार में बदल लेता है। यह मज़ाक नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि एक अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति अपनी भावनाओं का सामना करने के बजाय किसी भी हद तक गिर सकता है। यहाँ विज्ञान का उपयोग प्रगति के लिए नहीं, बल्कि पलायन (Escape) के लिए किया गया है। यह हमें आज के उस समाज की याद दिलाता है जहाँ हम इंटरनेट, मीम्स और मनोरंजन का उपयोग अपनी कड़वी सच्चाइयों से भागने के लिए करते हैं। हम एक ‘डिस्ट्रैक्शन सोसाइटी’ में जी रहे हैं जहाँ ‘Pickle Rick’ जैसा मज़ाक हमारे अस्तित्व के संकट से ज़्यादा बड़ा हो जाता है।
इसके साथ ही, शो में “यूनिटी” (Unity) जैसे पात्र का होना जो एक सामूहिक चेतना (Hive Mind) है। हमें व्यक्तिगत पहचान बनाम सामूहिक पहचान के संकट को समझाता है। यूनिटी पूरे ग्रह को नियंत्रित करती है और वहाँ अपराध या गरीबी नहीं है। लेकिन वहाँ ‘स्वतंत्र इच्छा’ (Free Will) भी नहीं है। रिक यूनिटी से प्यार करता है लेकिन उसके साथ रह नहीं पाता क्योंकि रिक के लिए ‘स्वतंत्रता’ सबसे ज़रूरी है, भले ही वह स्वतंत्रता अराजक और दुखदायी हो। यह आधुनिक लोकतंत्र और तानाशाही के बीच के दार्शनिक संघर्ष को दर्शाता है। क्या हम शांति के लिए अपनी आज़ादी देने को तैयार हैं? रिक का जवाब हमेशा “नहीं” होता है।
एंट्रोपी, विनाश और सृजन का चक्र
विज्ञान का एक बहुत महत्वपूर्ण नियम है ‘एंट्रोपी’ (Entropy) ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम। यह कहता है कि ब्रह्मांड में हर चीज़ अंततः व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर, और जीवन से मृत्यु की ओर बढ़ रही है। यह ब्रह्मांड का वह सच है जिससे कोई नहीं बच सकता। रिक इसे बहुत गहराई से समझता है। उसकी पोर्टल गन और उसके तमाम आविष्कार इसी एंट्रोपी के खिलाफ एक छोटी सी जंग हैं। वह विनाश के बीच सृजन करता है, लेकिन वह जानता है कि उसका हर सृजन भी अंततः मिट जाएगा। यह ‘मिथ ऑफ सिसिफस’ (Myth of Sisyphus) की तरह है जहाँ सिसिफस पत्थर को ऊपर ले जाता है और वह फिर नीचे गिर जाता है।
यही वह जगह है जहाँ रिक का ‘सिनिसिज्म’ (Cynicism) चरम पर पहुँचता है। वह किसी भी चीज़ का सम्मान नहीं करता क्योंकि वह अंत देख चुका है। लेकिन यहाँ एक दार्शनिक मोड़ आता है। यदि सब कुछ मिटने वाला है, तो क्या इसका मतलब यह है कि अभी जो है, उसका कोई मूल्य नहीं? मोर्टी का चरित्र इसी सवाल का जवाब देता है। मोर्टी जानता है कि वह ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है, फिर भी वह अपने परिवार को प्यार करता है, वह जानवरों की रक्षा करना चाहता है और वह सही काम करना चाहता है। यह ‘प्रामाणिक जीवन’ (Authentic Life) जीने की कोशिश है। रिक हमें ‘नार्सिसिज्म’ की ओर ले जाता है, जबकि मोर्टी हमें ‘सहानुभूति’ (Empathy) की ओर वापस लाता है।
रिक की शराब की लत और उसकी खुद को नुकसान पहुँचाने वाली प्रवृत्तियाँ वास्तव में उसके ‘ईश्वर बनने की सज़ा’ हैं। जब आप सब कुछ जान लेते हैं और सब कुछ देख लेते हैं, तो ब्रह्मांड आपके लिए एक रहस्य नहीं रह जाता। बिना रहस्य के जीवन एक बोझ बन जाता है। रिक का दुख वास्तव में उस ‘आधुनिकता’ का दुख है जिसने जादुई दुनिया को खत्म कर दिया और हमें केवल ठंडे, सूखे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ छोड़ दिया। इसीलिए वह बार-बार तबाही मचाता है, ताकि वह महसूस कर सके कि वह अभी भी ज़िंदा है और क्रियाशील है। यह सृजन और विनाश का एक अंतहीन चक्र है जिसे रिक बार-बार दोहराता है।
उपसंहार: शून्यवाद से सृजनवाद की ओर
‘Rick and Morty’ हमें एक आईना दिखाती है जिसमें हम अपनी लघुता और अपनी महानता, दोनों को देख सकते हैं। यह हमें बताती है कि विज्ञान हमें ‘कैसे’ का जवाब दे सकता है, लेकिन ‘क्यों’ का जवाब हमें खुद तलाशना होगा। रिक सांचेज़ का शून्यवाद वास्तव में एक ‘सकारात्मक शून्यवाद’ (Optimistic Nihilism) है। यदि ब्रह्मांड को आपकी परवाह नहीं है, तो हमें इस बात की आज़ादी है कि हम उस चीज़ की परवाह करें जो हमें खुशी देती है। हमें किसी काल्पनिक देवता या स्वर्ग-नरक के डर की ज़रूरत नहीं है ताकि हम अच्छे इंसान बन सकें।
यह सीरीज़ हमें उस ‘Philosophical Suicide’ से बचाती है जहाँ हम बिना सोचे-समझे मान्यताओं को मान लेते हैं। यह हमें एक ‘जागृत’ और ‘तर्कशील’ मनुष्य बनने की प्रेरणा देती है, जो सवाल उठाने से नहीं डरता। अंत में, रिक का तकियाकलाम ‘Wubalubadubdub’ (मैं बहुत दर्द में हूँ, मेरी मदद करें) इस पूरे विमर्श का निचोड़ है। यह उस आधुनिक मनुष्य की चीख है जिसने ब्रह्मांड को तो जीत लिया है, लेकिन अपने अंदर के खालीपन को नहीं भर पाया।
इस अनंत और ठंडे ब्रह्मांड में हमारी छोटी सी रसोई, हमारा परिवार और हमारा साझा दुख ही वह एकमात्र ‘अर्थ’ है जिसे हम सच कह सकते हैं। रिक और मोर्टी का रिश्ता हमें सिखाता है कि चाहे आप ब्रह्मांड के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति हों या सबसे साधारण बच्चे, अंततः हमें एक-दूसरे की ज़रूरत होती है। यही वह ‘मानवीय विसंगति’ है जो हमें मशीनों से अलग करती है और विज्ञान के तमाम कड़वे तथ्यों के बावजूद जीने की वजह देती है।
यह लेख मुख्य रूप से ‘Rick and Morty’ के शुरुआती चार सीज़न और उसमें निहित दार्शनिक आधारों पर केंद्रित है, जो आज के सामाजिक और वैज्ञानिक परिदृश्य में और भी प्रासंगिक हो गए हैं।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।