~डॉक्टर ज़ेबा शाहीन
भारत में इलाज के तरीके सिर्फ बीमारी दूर करने का जरिया नहीं रहे हैं, बल्कि ये हमारे समाज की सोच, जीने के सलीके और सदियों के पुराने तजुर्बों का एक खास हिस्सा रहे हैं। हमारे यहाँ सेहत को कभी भी सिर्फ शरीर की समस्या नहीं माना गया, बल्कि इसे जिंदगी के तालमेल और समाज से जुड़कर देखा गया है। यही वजह है कि आयुर्वेद और यूनानी जैसी पुरानी पद्धतियों के साथ-साथ होम्योपैथी ने भी भारत में अपनी गहरी जगह बनाई। हालांकि इसकी शुरुआत यूरोप में हुई थी, लेकिन भारत ने इसे जिस अपनेपन से अपनाया, उसने इसे हमारे देश के चिकित्सा जगत का एक पक्का और जरूरी हिस्सा बना दिया। 19वीं सदी में जब होम्योपैथी भारत आई, तब देश एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा था। उस वक्त अंग्रेजी दवाइयों (एलोपैथी) की शुरुआत तो हो चुकी थी, लेकिन उनकी पहुँच बहुत कम थी। साथ ही, वह तरीका उस समय के भारतीय समाज की माली हालत और संस्कृति से पूरी तरह मेल नहीं खाता था। ऐसे में होम्योपैथी एक आसान, कम खर्च वाली और पहुँच में आने वाली पद्धति के रूप में सामने आई।
होम्योपैथी का बुनियादी उसूल “लक्षणों के मेल से इलाज” भारतीय लोगों के लिए नया नहीं था। हमारे यहाँ कुदरत के संतुलन, शरीर और मन के आपसी रिश्ते और इंसान के मिजाज के हिसाब से इलाज करने की परंपरा पहले से मौजूद थी। इसलिए, भारतीयों ने इसे किसी ‘विदेशी’ तरीके के बजाय एक मददगार नजरिए के तौर पर देखा। खासकर गाँवों और कस्बों में, जहाँ अस्पतालों की कमी थी, वहाँ होम्योपैथी डॉक्टरों ने शुरुआती इलाज की जिम्मेदारी संभाली। एक होम्योपैथ जब मरीज के दिमागी, सामाजिक और पारिवारिक हालात को समझकर दवा देता है, तो वह प्रक्रिया सिर्फ इलाज न रहकर एक गहरी बातचीत बन जाती है। मरीज को महसूस होता है कि डॉक्टर सिर्फ उसकी बीमारी को नहीं, बल्कि उसकी पूरी जिंदगी के हालात को समझ रहा है।
जैसे-जैसे होम्योपैथी का चलन बढ़ा, इसके साथ वैज्ञानिक सवाल भी जुड़ते गए। आधुनिक विज्ञान के मुताबिक, दवाइयां बनाने के दौरान उन्हें इतना पतला कर दिया जाता है कि उनमें मूल पदार्थ के कणों को ढूँढ पाना नामुमकिन हो जाता है। आलोचकों का कहना रहा है कि अगर दवा में कोई असली चीज मौजूद ही नहीं है, तो वह शरीर पर असर कैसे डाल सकती है? इन सवालों ने होम्योपैथी को खत्म करने के बजाय उसे और बेहतर बनाने की प्रेरणा दी। भारत में इस तरीके को सलीके से चलाने के लिए कॉलेज खोले गए, पढ़ाई का कोर्स तय हुआ और सरकारी नियम बनाए गए। आज होम्योपैथी सिर्फ कुछ लोगों के निजी तजुर्बे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित सरकारी सिस्टम बन चुका है। आयुष मंत्रालय के जरिए इसे सरकारी नीतियों में शामिल करना इस बात का सबूत है कि आम जनता की सेहत, खासकर पुरानी बीमारियों के इलाज में इसकी भूमिका को गंभीरता से लिया जा रहा है।
आज के दौर में किसी भी इलाज की साख इस बात पर टिकी होती है कि उसके पास कितने पक्के सबूत हैं। सबूतों के इस दौर में भारतीय होम्योपैथी ने भी खुद को बदला है। अब इलाज के रिकॉर्ड और कागजी कार्रवाई पर बहुत जोर दिया जा रहा है। आजकल के डॉक्टर सिर्फ मरीज की बातों पर भरोसा नहीं करते, बल्कि खून की जांच, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और दूसरी नई तकनीकों के जरिए इलाज के नतीजों को परखते हैं। यह बदलाव सिर्फ वैज्ञानिक मान्यता पाने के लिए नहीं है, बल्कि इलाज के स्तर को सुधारने की एक कोशिश है। जब डॉक्टर अपने इलाज के नतीजों का पूरा डेटा रखते हैं, तो वे अपनी कामयाबी और नाकामी को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। रिसर्च के मामले में “नैनो-साइंस” ने यहाँ एक नई उम्मीद जगाई है। कुछ नई रिसर्च से इशारा मिला है कि बहुत ज्यादा पतला करने के बाद भी, दवाओं में बेहद बारीक कण बचे रह सकते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं पर असर डालने की ताकत रखते हैं। हालांकि यह मामला अभी भी बहस का विषय है, लेकिन इसने होम्योपैथी के काम करने के तरीके को समझने की नई राहें खोल दी हैं।
इसके साथ ही, दवाओं की शुद्धता और क्लिनिकों को चलाने के लिए कड़े नियम आने से इसमें पारदर्शिता बढ़ी है। जब निजी तजुर्बों को लैब के टेस्ट के जरिए साबित किया जाता है, तो वह सिर्फ एक इंसान का ज्ञान न रहकर पूरी दुनिया के विज्ञान का हिस्सा बन जाता है। होम्योपैथी के साथ जो सबसे बड़ी आलोचना जुड़ी है, वह है “प्लेसबो असर”। आलोचकों का मानना है कि डॉक्टर मरीज को जो वक्त देते हैं और जो हमदर्दी दिखाते हैं, उससे मरीज का दिमागी तनाव कम होता है। इससे शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत अपने आप बढ़ जाती है। यानी उनके मुताबिक, सुधार दवा से नहीं बल्कि दिमागी तसल्ली से होता है। इसके उलट, इसे मानने वालों का तर्क है कि अगर यह सिर्फ यकीन का खेल है, तो छोटे बच्चों और जानवरों पर ये दवाएं कैसे असर करती हैं, जिन्हें दवा या डॉक्टर के बर्ताव के बारे में कुछ पता ही नहीं होता?
यह बहस आज भी जारी है, लेकिन इसका एक अच्छा नतीजा यह निकला है कि अब इलाज की दुनिया में “पूरे शरीर और मन की सेहत” की अहमियत को समझा जाने लगा है। आने वाले वक्त में इलाज की व्यवस्था किसी एक तरीके तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वह “मिले-जुले मॉडल” की ओर बढ़ेगी। इसका मतलब है कि इमरजेंसी, ऑपरेशन और गंभीर इन्फेक्शन में एलोपैथी की मदद ली जाए, जबकि रहन-सहन से जुड़ी बीमारियों और दिमागी-शारीरिक उलझनों में होम्योपैथी जैसे नजरिए को अपनाया जाए। भारत में पढ़ाई के सुधार और मरीज की जरूरतों पर आधारित नीतियां इस दिशा में नई उम्मीदें जगा रही हैं। अगर होम्योपैथी अपने नतीजों को साफ-सुथरे और मापने लायक तरीके से पेश कर पाती है, तो वह पूरी दुनिया के सामने एक मजबूत वैज्ञानिक विकल्प के रूप में उभर सकती है।
भारत में होम्योपैथी का सफर “यकीन से सबूत” और “पुरानी परंपरा से नए विज्ञान” की ओर बढ़ने की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यह सफर दिखाता है कि कैसे एक बाहरी तरीके ने भारत की मिट्टी में रच-बसकर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आज भारतीय होम्योपैथी सिर्फ पुरानी बातों का बोझ नहीं ढो रही, बल्कि वह नई रिसर्च के जरिए कल की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रही है। यह एक ऐसे सिस्टम के रूप में बढ़ रही है जो हमारी पुरानी विरासत और आज के वैज्ञानिक नजरिए के बीच एक पुल का काम कर सकती है। आखिर में, सेहत का मकसद सिर्फ बीमारी को दबाना नहीं, बल्कि इंसान को शरीर और मन से पूरी तरह स्वस्थ बनाना है, और इस मकसद को पूरा करने में होम्योपैथी का रोल बहुत अहम बना हुआ है।
~डॉ. ज़ेबा शाहीन, पीजीटी 2023 (ऑर्गेनन ऑफ मेडिसिन)
