लेखक ~डॉ. उज़्मा खातून

अफ़गानिस्तान की धरती से आने वाली ख़बरें आज पूरी दुनिया के लिए न केवल चिंता का विषय हैं, बल्कि यह उस न्याय व्यवस्था पर भी गहरे सवाल खड़े करती हैं जिसे ‘इस्लाम’ के नाम पर लागू किया जा रहा है। हाल ही में तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा के हस्ताक्षरों के साथ जारी हुआ ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ (Mahakumu Jazaai Osulnama) महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उस सोच का आईना है जो समाज को संकुचित वर्गों में बांटती है और आधी आबादी यानी महिलाओं को उनके बुनियादी वजूद से बेदखल करती है। जब किसी कठोर और कबीलाई व्यवस्था को खुदा के कानून की ढाल बनाकर पेश किया जाता है, तो एक गंभीर संकट पैदा होता है। यह संकट न केवल इंसानी हक़ों का है, बल्कि यह उस मज़हबी सच्चाई का भी है जिसे सदियों से विद्वानों ने दया, न्याय और गरिमा के तौर पर पेश किया है। तालिबान द्वारा लागू की गई यह नई व्यवस्था घरेलू हिंसा, महिलाओं की गवाही और उनकी सामाजिक भागीदारी को जिस तरह से परिभाषित कर रही है, वह आधुनिक सभ्य समाज ही नहीं बल्कि खुद इस्लामी न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों के भी खिलाफ नज़र आती है।

इस नए कानून के भीतर जो सबसे दर्दनाक पहलू उभरकर सामने आता है, वह है घरेलू हिंसा की परिभाषा। तालिबानी दस्तावेज़ के मुताबिक, किसी पति को तब तक अपराधी नहीं माना जा सकता जब तक उसकी हिंसा से पत्नी को कोई स्पष्ट गहरा घाव न हो जाए या उसकी कोई हड्डी न टूट जाए। इसका सीधा और डरावना मतलब यह निकलता है कि थप्पड़ मारना, धक्का देना, घसीटना या मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना अब कानून की नज़र में कोई जुर्म नहीं रह गया है। यह व्यवस्था उस दौर की याद दिलाती है जहाँ शरीर को सिर्फ एक मशीन समझा जाता था, जबकि आज की दुनिया और विकसित न्यायशास्त्र यह मानता है कि हिंसा सिर्फ हड्डियों के टूटने का नाम नहीं है। मानसिक पीड़ा, भावनात्मक शोषण और अपमान भी इंसान की रूह को उसी तरह तोड़ते हैं जैसे कोई शारीरिक चोट। तालिबान का यह कानून पुरुषों को ‘अनुशासन’ के नाम पर निजी तौर पर सज़ा देने की छूट देता है, जो किसी भी सभ्य समाज में अराजकता का कारण बन सकता है। जब कानून और निजी ताक़त के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है, तो सबसे ज़्यादा नुकसान उन कमज़ोर वर्गों का होता है जो पहले से ही सामाजिक दबाव में जी रहे हैं।

अदालती प्रक्रियाओं में भी महिलाओं के लिए जो शर्तें रखी गई हैं, वे इंसाफ़ के दरवाज़े बंद करने जैसी हैं। एक ऐसा ढांचा जहाँ महिला की गवाही को बराबर का दर्जा न मिले और उसे अपनी चोट साबित करने के लिए पुरुष प्रधान व्यवस्था के कड़े पैमानों से गुजरना पड़े, वहाँ न्याय केवल एक सपना बनकर रह जाता है। इसके साथ ही, समाज को उलेमा, अभिजात वर्ग और निम्न वर्ग जैसे कड़े सामाजिक खानों में बांटना कानून की उस रूह को मार देता है जो कहती है कि ‘कानून की नज़र में सब बराबर हैं’। यदि दंड का निर्धारण अपराधी के कर्म के बजाय उसकी सामाजिक स्थिति से होने लगे, तो वह व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं बल्कि सामंती कहलाएगी। तालिबान की नीतियां, जो 2022 के बाद से महिलाओं की शिक्षा, उनकी आवाजाही और उनके सार्वजनिक जीवन पर पाबंदी लगाती आई हैं, वे कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। यह एक सोची-समझी रणनीति है जिसके तहत महिलाओं को समाज की मुख्यधारा से काटकर घर की चारदीवारी तक सीमित किया जा रहा है। यह कहना कि यह ‘शुद्ध इस्लाम’ है, इतिहास और मज़हबी हक़ीक़तों से आँखें मूंदने जैसा है।

वास्तव में, तालिबान जिसे इस्लाम कह रहा है, वह पश्तून समाज की कठोर कबीलाई परंपराओं और ‘पश्तूनवाली’ आचार संहिता का मिश्रण है। सम्मान और सुरक्षा के नाम पर महिलाओं पर थोपी गई यह कठोरता स्थानीय संस्कृति तो हो सकती है, लेकिन इसे वैश्विक इस्लाम का चेहरा नहीं माना जा सकता। यदि हम मुस्लिम इतिहास के सुनहरे दौर को देखें, तो बगदाद, क़ाहिरा और क़ुर्तुबा जैसे ज्ञान के केंद्रों में महिलाएं न केवल शिक्षित थीं, बल्कि वे व्यापार, राजनीति और कानून के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभा रही थीं। इस्लामी न्यायशास्त्र में ‘इख़्तिलाफ’ यानी विचारों की भिन्नता को हमेशा एक रहमत माना गया है।अलग-अलग समय में विद्वानों ने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से कानून की व्याख्या की है। इसलिए, तालिबान का यह दावा कि उनकी कठोर व्याख्या ही एकमात्र ‘सत्य’ है, खुद इस्लामी बौद्धिक परंपरा के लचीलेपन और उसकी महानता को छोटा करने जैसा है।

यहाँ हमें एक बहुत ही बारीक और ज़रूरी फर्क को समझने की ज़रूरत है। शरीअत और फिक़्ह के बीच का अंतर। शरीअत वह ईश्वरीय रास्ता है जो न्याय, दया और मानवीय गरिमा जैसे ऊंचे नैतिक मूल्यों पर आधारित है। वहीं फिक़्ह (Feqh) उन सिद्धांतों को इंसानी समझ के ज़रिए ज़मीनी हकीकत में बदलने की एक कोशिश है। फिक़्ह का इतिहास गवाह है कि यह समय, स्थान और ज़रूरतों के हिसाब से बदलती रही है। जब हम किसी सदियों पुरानी व्याख्या को पत्थर की लकीर मान लेते हैं और उसमें बदलाव की गुंजाइश खत्म कर देते हैं, तो हम उस मज़हब की रूह को कैद कर देते हैं जो ‘क़यामत’ तक के लिए मार्गदर्शन का दावा करता है। महिलाओं की शिक्षा का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।कुरआन का पहला शब्द ‘इक़रा’ यानी ‘पढ़ो’ था, जो किसी जेंडर के लिए नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए था। पैगंबर मुहम्मद साहब ने ज्ञान की तलाश को हर मुसलमान (मर्दों और औरतों) पर फर्ज़ करार दिया था। आज के दौर में अगर कोई सत्ता महिलाओं को यूनिवर्सिटी जाने से रोकती है, तो वह मज़हब की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि उसके बुनियादी आदेश की नाफरमानी कर रही है।

कुरआन की कुछ आयतें, जैसे सूरह निसा की आयत 4:34, जिसका इस्तेमाल अक्सर पुरुष वर्चस्व को जायज़ ठहराने के लिए किया जाता है, उसकी गहराई में जाना बहुत ज़रूरी है। महिलाओं के दृष्टिकोण का महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब हम इन जैसी आयतों को देखते हैं। सूरह निसा की आयत (4:34),में कहा गया है कि “पुरुष महिलाओं पर क़व्वाम (qawwamun) हैं।” इस शब्द का अर्थ अक्सर यह निकाला गया है कि पुरुषों को महिलाओं पर अधिकार या श्रेष्ठता प्राप्त है। कुछ पुरानी व्याख्याओं ने तो ‘दरबा’ शब्द के आधार पर वैवाहिक जीवन में शारीरिक दंड तक की गुंजाइश निकाल ली। ऐसी व्याख्याओं के गहरे सामाजिक परिणाम हुए हैं। हालाँकि, जब हम संदर्भ के साथ सावधानीपूर्वक व्याख्या करते हैं, तो अर्थ अधिक सूक्ष्म हो जाता है। शब्द ‘क़व्वाम’ की जड़ ‘क़-व-म’ है, जो ज़िम्मेदारी, देखरेख और सहारे से जुड़ा है। आयत खुद इस भूमिका को आर्थिक ज़िम्मेदारी से जोड़ती है: “क्योंकि वे अपने माल में से खर्च करते हैं।” सातवीं सदी के अरब में, पुरुष ही आमतौर पर आर्थिक सहारा थे। आयत ने उस सामाजिक ढांचे को संबोधित किया। ‘क़व्वाम’ को स्थायी श्रेष्ठता के रूप में पढ़ना मूल पाठ की सीमा से बाहर जाना है। यह आयत ज़िम्मेदारी को आर्थिक कर्तव्य से जोड़ती है, न कि पुरुष के जन्मजात मूल्य से। इसके अलावा, क़ुरआन को एक संपूर्ण इकाई के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। 4:34 की कोई भी व्याख्या उसके व्यापक नैतिक विज़न के अनुरूप होनी चाहिए। क़ुरआन निकाह में इंसाफ़ (अदल), रहम (रहमह) और दयालुता पर ज़ोर देता है। यह कहता है, “उनके साथ भलाई से रहो” (4:19) और विवाह को सुकून, मोहब्बत और रहम का रिश्ता बताता है (30:21)। वर्चस्व या हिंसा को सही ठहराने वाली कोई भी व्याख्या इन व्यापक सिद्धांतों के खिलाफ है।

पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) का उदाहरण भी मायने रखता है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नियों के साथ सम्मान का व्यवहार किया और कभी हिंसा नहीं की। इसलिए, नुकसान को सामान्य बताने वाली व्याख्याओं पर क़ुरआनी नैतिकता और सुन्नत दोनों की रोशनी में सवाल उठाया जाना चाहिए। ऐसी आयतों की समीक्षा करने का मतलब क़ुरआन को दोबारा लिखना नहीं है। इसका मतलब ईश्वरीय संदेश और विरासत में मिली व्याख्याओं के बीच फर्क करना है। मुस्लिम विद्वानों ने हमेशा अपने संदर्भ के अनुसार व्याख्या का काम किया है। आज के विद्वान, जिनमें महिलाएँ भी शामिल हैं, उसी बौद्धिक प्रयास को आगे बढ़ा रहे हैं। इस पूरी बहस का सबसे बुनियादी सवाल यह है कि क्या मुसलमान कुरआन को सीधे पढ़ते हैं, या हम इसे उन चश्मों से देखते हैं जो हमें सदियों पहले थमा दिए गए थे? यह सच है कि कुरआन पूरी इंसानियत के लिए है, लेकिन उसे समझने और समझाने का काम सदियों से ज़्यादातर पुरुषों ने ही किया है। जब कोई किताब केवल पुरुष दृष्टिकोण से पढ़ी और समझाई जाती है, तो उसमें स्वाभाविक रूप से उस समय के पितृसत्तात्मक समाज के असर आ जाते हैं। इसलिए आज इस बात की सख्त ज़रूरत है कि कुरआन को महिलाओं के नज़रिए से दोबारा पढ़ा और समझा जाए। यह कुरआन को बदलने की कोशिश नहीं है, बल्कि उस ईश्वरीय संदेश की रूह तक पहुँचने की कोशिश है जिसे इंसानी व्याख्याओं की परतों ने कहीं छुपा दिया है। हमें यह समझना होगा कि कुरआन ‘वह्य’ (ईश्वरीय प्रेरणा) है जो पवित्र और कभी न बदलने वाली है, लेकिन ‘तफ़्सीर’ (व्याख्या) एक मानवीय प्रयास है जो भाषा, संस्कृति और इतिहास से प्रभावित होता है। अगर हम पुराने विद्वानों की व्याख्याओं को उनके समय के संदर्भ में देखें, तो हम पाएंगे कि वे अपने दौर के हिसाब से सही हो सकते थे, लेकिन उनके विचार खुदा का आखिरी शब्द नहीं हैं।

क़ुरआन खुद महिलाओं को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सक्षम व्यक्तित्व के रूप में पेश करता है। मरियम (स.अ.) को ‘चुनी हुई और पाक’ बताया गया है (3:42–43)। सबा की रानी (बिलक़ीस) एक समझदार और बुद्धिमान राजनीतिक नेता के रूप में सामने आती हैं (27:23–44)। क़ुरआन बार-बार मोमिन मर्दों और औरतों को ज़िम्मेदारी और इनाम में बराबर रखता है (33:35)। यह उन्हें एक-दूसरे का ‘वली’ (साथी/दोस्त) बताता है जो नेकी को बढ़ावा देने और बुराई को रोकने में एक-दूसरे की मदद करते हैं (9:71)। ये आयतें खुदा के सामने नैतिक बराबरी को दर्शाती हैं। मुस्लिम समाज में महिलाओं के दृष्टिकोण की कमी का नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के अनुभव, उनकी समस्याएं और उनकी आकांक्षाएं मज़हबी बहसों से गायब हो गईं। कुरआन में मरियम (स.अ.) को एक महान हस्ती के रूप में पेश किया गया है, सबा की रानी बिलकीस को एक बेहद अकलमंद हुक्मरान बताया गया है, और हज़रत आयशा (र.अ.) को इल्म का एक समंदर माना गया है जिनसे बड़े-बड़े सहाबा कानूनी सलाह लेते थे। जब कुरआन खुद महिलाओं को नैतिक और आध्यात्मिक तौर पर पुरुषों के बराबर खड़ा करता है, तो फिर हमारी सामाजिक और कानूनी व्यवस्थाएं उन्हें कमतर क्यों मानती हैं? यह असमानता मज़हब से नहीं, बल्कि उन व्याख्याओं से आई है जो सत्ता और नियंत्रण के इर्द-गिर्द बुनी गई थीं। आज की मुस्लिम महिला विद्वान, जैसे अमीना वदूद या फातिमा मर्निसी, इसी बात पर ज़ोर देती हैं कि अगर इस्लाम का आधार ‘तौहीद’ (एक खुदा की सर्वोच्चता) है, तो कोई भी पुरुष खुद को किसी महिला से श्रेष्ठ कैसे कह सकता है? खुदा के सामने सब बराबर हैं और यही बराबरी ज़मीन पर भी दिखनी चाहिए।

आज की दुनिया में घरेलू हिंसा, शिक्षा का अधिकार और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे विषय मज़हब से अलग नहीं हैं। ये इंसान की गरिमा से जुड़े मामले हैं। जब हम कुरआन को महिलाओं की नज़रों से देखते हैं, तो हमें वह आयतें ज़्यादा साफ दिखाई देती हैं जो कहती हैं कि ‘मर्द और औरत एक दूसरे के वली (दोस्त और साथी) हैं’। यहाँ किसी की किसी पर हुकूमत नहीं, बल्कि आपसी सहयोग की बात है। महिलाओं की आवाज़ को मज़हबी व्याख्याओं में शामिल करने का मतलब परंपरा को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे मुकम्मल करना है। एक ऐसा समाज जो अपनी आधी आबादी की अक्ल और रूहानी गहराई को नज़रअंदाज़ करता है, वह कभी भी खुदा के उस इंसाफ़ और रहम के विज़न को पूरा नहीं कर सकता जिसका कुरआन दावा करता है। तालिबानी कानून जैसी व्यवस्थाएं हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम किस रास्ते पर जा रहे हैं। क्या हम इस्लाम को महज़ पाबंदियों और सजाओं का एक संकलन बनाना चाहते हैं, या हम इसे उस करुणा और न्याय के रूप में देखना चाहते हैं जो कमज़ोर को ताक़त देता है और ज़ुल्म को मिटाता है? इस्लामी नैतिकता के मूल मूल्य ‘अदल’ (न्याय) और ‘रहमा’ (दया) हैं। अगर कोई भी कानून इन दो बुनियादों पर खरा नहीं उतरता, तो उसे इस्लामी कहना गलत होगा। ज़रूरत इस बात की है कि मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी, उलेमा और आम नागरिक इस बात पर गौर करें कि इस्तेहाद (बौद्धिक प्रयास) के दरवाज़े कभी बंद नहीं होते। हमें अपनी बेटियों को शिक्षा देनी होगी, उन्हें न्याय की कुर्सियों पर बिठाना होगा और कुरआन की उन व्याख्याओं की तरफ लौटना होगा जो इंसान को इंसान होने का गौरव देती हैं। खुदा का कलाम हर दौर के लिए है, और हर दौर अपनी सच्चाइयों के साथ उसे दोबारा समझने का हक रखता है। एक संतुलित भविष्य तभी मुमकिन है जब व्याख्या की मेज़ पर पुरुषों के साथ महिलाओं की आवाज़ भी उतनी ही मज़बूती से गूंजेगी।

डॉ. उज़्मा ख़ातून अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व फैकल्टी हैं और एक लेखिका, स्तंभकार व सामाजिक चिंतक हैं।