Tag: muslim
ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल...
Posted by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
इस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश...
Posted by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?...
Posted by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
मुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्य...
Posted by Arif Aziz | Dec 11, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों...
Posted by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
पसमांदा समाज: संघर्ष से सम्मान और विकास की नई राह
by Arif Aziz | Apr 16, 2026 | Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा समाज, जो लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा, आज राष्ट्रीय विमर्श में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। यह बदलाव केवल राजनीतिक स्वीकार्यता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और निरंतर संघर्ष की देन है। अब यह समाज शिक्षा, रोजगार और अधिकारों के प्रति सजग होकर विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
Read Moreवैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार
by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।
Read Moreओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल
by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।
Read Moreइस्लाम में अक़्ल, बहस और ख़ुदा की तलाश
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Education and Empowerment | 0 |
लेखिका ~ डॉ. उज़्मा खातून मुफ़्ती शमाइल नदवी और जावेद अख़्तर के बीच हालिया बहस ने ख़ुदा के वजूद...
Read More“काफ़िर” शब्द की असलियत: सियासी गाली से क़ुरआनी संदर्भ तक
by Arif Aziz | Dec 29, 2025 | Culture and Heritage, Social Justice and Activism | 0 |
— डॉ. उज़्मा ख़ातून आज के सियासी माहौल में ‘काफ़िर’ शब्द को उसकी रूहानी और धार्मिक...
Read MoreReclaiming “Kafir”: From Political Slur to Quranic Context
by Arif Aziz | Dec 24, 2025 | Education and Empowerment, Miscellaneous, Political | 0 |
Dr. Uzma Khatoon highlights how the term Kafir has been stripped of its Quranic nuance and misused in contemporary politics, media debates, and extremist narratives to fuel hatred and violence. She explains that linguistically and theologically, Kufr denotes deliberate rejection of known truth, not a blanket label for non-Muslims. Islamic scholarship, she notes, strictly limits Takfir (declaring others infidel), emphasizing ethical restraint, dignity, and gentle discourse. Dr. Khatoon argues that weaponizing religious language violates Quranic and Prophetic ethics, harms social harmony, and strengthens Islamophobia, calling for reclaiming faith-based vocabulary through wisdom, justice, and mercy.
Read Moreबहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?
by Arif Aziz | Dec 12, 2025 | Culture and Heritage, Gender Equality and Women's Rights, Social Justice and Activism | 0 |
भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।
Read Moreमुस्लिम समाज को ‘इस्लामिक फेमिनिज्म’ की ज़रूरत क्यों है?
by Arif Aziz | Dec 11, 2025 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
इस्लामिक फेमिनिज्म मुस्लिम समाजों में बराबरी और लैंगिक न्याय को पुनर्जीवित करने वाला आंदोलन है, जो कुरान और हदीस की पितृसत्तात्मक व्याख्याओं को चुनौती देकर उनके नैतिक उसूलों—इंसाफ, तौहीद और तक़वा—को केंद्र में रखता है। अस्मा बरलास, अमीना वदूद और फातिमा मेरनिसी जैसी विद्वान दिखाती हैं कि कई भेदभावपूर्ण प्रथाएँ धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक पितृसत्ता की उपज हैं। यह आंदोलन कानूनी व सामाजिक सुधारों, विशेषकर पारिवारिक कानूनों में समानता की मांग करता है। आलोचनाओं के बावजूद, इस्लामिक फेमिनिज्म औरतों के अधिकार, गरिमा और समान भागीदारी को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read Moreगाजा शांति प्रस्ताव: न्याय, पुनर्निर्माण और अस्थिर भविष्य
by Arif Aziz | Oct 28, 2025 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक: अब्दुल्लाह मंसूर गाजा में युद्धविराम की घोषणा केवल बंदूकों की गूंज का शांत होना नहीं है। यह...
Read Moreमक्का चार्टर: इस्लाम की असली सोच की ओर वापसी
by Arif Aziz | Oct 22, 2025 | Culture and Heritage, Political, Social Justice and Activism | 0 |
मक्का चार्टर (2019) इस्लाम के मूल पैगाम—शांति, बराबरी और सह-अस्तित्व—की पुनःस्थापना है, न कि कोई नया सुधार। यह पैगंबर मुहम्मद के मदीना संविधान से प्रेरित है, जिसने विभिन्न धर्मों और कबीलों को ‘उम्मा’ के रूप में एकजुट किया। 139 देशों के 1200 से अधिक विद्वानों द्वारा स्वीकृत इस चार्टर ने धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता, अतिवाद का विरोध, महिलाओं और युवाओं के सशक्तीकरण, और पर्यावरण की रक्षा पर ज़ोर दिया। यह कुरान व इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक नैतिक संविधान है जो मुस्लिम दुनिया को एकजुट कर मानवाधिकार, न्याय और दया के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रस्तुत करता है।
Read Moreआधुनिक शिक्षा के नाम पर भेदभाव? सर सैयद पर बड़ा सवाल!
by Arif Aziz | Oct 20, 2025 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
अब्दुल्ला मंसूर ज्यादातर हम समझते हैं कि मौलवी या उलेमा ही धार्मिक उपदेश के जरिए मतिभ्रम फैलाते...
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