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मुस्लिम समाज को महिलाओं के दृष्टिकोण से क़ुरआन की व्याख्या की ज़रूरत क्यों है?

क़ुरआन ईश्वरीय वह्य है, जबकि तफ़्सीर मानवीय समझ की कोशिश। इतिहास में अधिकतर व्याख्याएँ पुरुष दृष्टिकोण से गढ़ी गईं, जिससे महिलाओं के अनुभव हाशिये पर रहे। क़ुरआन नैतिक बराबरी, इंसाफ़ और रहम की बात करता है। इसलिए ज़रूरी है कि वह्य और व्याख्या में फर्क पहचानकर, समकालीन संदर्भ में आयतों को उसके व्यापक नैतिक संदेश की रोशनी में समझा जाए—ताकि परंपरा को बरक़रार रखते हुए न्यायपूर्ण पुनर्विचार संभव हो।

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मुस्लिम समाज को इस्लामी नारीवाद की आवश्यकता क्यों है

आज भी इस्लामी नारीवाद इसी मिशन पर काम कर रहा है। यह क्लासिकल इस्लामी इल्म और आधुनिक नारीवादी सोच दोनों से बातचीत करता है ताकि महिलाओं के हुकूक को बेहतर तरीके से समझा जा सके। सेक्युलर नारीवादी अक्सर इस्लाम को पितृसत्तात्मक मानते हुए उसकी आलोचना करते हैं, लेकिन इस्लामी नारीवादी मज़हब के अंदर रहकर उन तशरीहों को चुनौती देते हैं जो महिलाओं पर ज़ुल्म का सबब बनती हैं। इस्लामी नारीवाद का सबसे अहम पहलू यह है कि यह क़ुरआन के नैतिक उसूलों पर आधारित है। अस्मा बरलास और अमीना वदूद जैसे विद्वानों का मानना है कि क़ुरआन इंसाफ़, बराबरी और इंसानी इज़्ज़त-ओ-तक्रीम (सम्मान) को बढ़ावा देता है। उनका कहना है कि तौहीद (ईश्वर की एकता) का मतलब यह भी है कि किसी इंसान को दूसरे इंसान पर लिंग, नस्ल या जाति के आधार पर हुकूमत करने का हक नहीं है। पितृसत्ता, जो मर्दों को महिलाओं पर प्रभुत्व देती है, तौहीद के उसूल के खिलाफ जाती है।

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