लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर

खुशी क्या है? क्या यह कोई अंतिम मंज़िल है, जिसे पा लेने के बाद हम जीवन भर के लिए एक परम सुकून से भर जाते हैं, या फिर यह वो रास्ता है, जिस पर हम हर पल चल रहे होते हैं? यह एक ऐसा शाश्वत प्रश्न है जिसने सदियों से दार्शनिकों, संतों और कलाकारों को मथ कर रखा है, और आधुनिक दौर की भागदौड़, उपभोक्तावाद और लगातार कुछ बेहतर पा लेने की अंधी दौड़ ने इस सवाल को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। यह सवाल हमें उस वक़्त और भी गहराई से सोचने पर मजबूर करता है, जब हम दो अलग-अलग कोनों से आई, मगर आंतरिक रूप से एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी फिल्मों-‘Into the Wild’ (2007) और ‘Perfect Days’ (2023) को एक साथ रखकर देखते हैं। एक तरफ क्रिस्टोफर मैककैंडलेस है, जो समाज, व्यवस्था और भौतिकता के बंधनों से भागकर अलास्का के बर्फीले जंगलों में सच्ची खुशी और अपनी आत्मा की स्वतंत्रता ढूंढ़ता है, और दूसरी तरफ हिरायामा है, जो टोक्यो जैसे महानगर के शोर, कंक्रीट के जंगलों और एकरस दिनचर्या के बीच भी अपने हिस्से का सुकून और मुस्कान खोज लेता है। इन दोनों फिल्मों का समानांतर अध्ययन दरअसल मानवीय चेतना की दो अलग-अलग यात्राओं का अध्ययन है, जो हमें यह समझने में मदद करती हैं कि मनुष्य अपने वजूद और शांति को किस तरह अलग-अलग रास्तों पर तलाशता है।

‘Into the Wild’ और क्रिस्टोफर का चरम आदर्शवाद

शॉन पेन द्वारा निर्देशित ‘Into the Wild’ एक वास्तविक और विचलित कर देने वाली कहानी पर आधारित है, जिसमें क्रिस्टोफर मैककैंडलेस नाम का एक स्थापित मानकों के अनुसार ‘सफल’ युवा जिसके पास अच्छी डिग्री, समृद्ध परिवार और उज्ज्वल भविष्य है सब कुछ अचानक छोड़ देता है। वह अपनी सारी जमा-पूंजी दान कर देता है, अपने पहचान पत्र नष्ट कर देता है और खुद को एक नया नाम देता है एलेक्जेंडर सुपरट्रैम्प, क्योंकि उसका मानना है कि समाज कृत्रिम है, रिश्ते एक बंधन हैं, और भौतिक संपत्ति आत्मा की दुश्मन है। वह अमेरिकी विचारक हेनरी डेविड थोरू और लियो टॉल्स्टॉय के विचारों से प्रभावित होकर पूर्ण अलगाव की तलाश में निकल पड़ता है और उसका यह मानना होता है कि तमाम कृत्रिमताओं से दूर, प्रकृति के आदिम रूप में ही मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान पा सकता है। क्रिस्टोफर की यह यात्रा शुरुआत में एक असीम रोमांच और आज़ादी के उत्सव जैसी लगती है, जहाँ वह अमेरिका के विभिन्न हिस्सों से गुजरता है, नए लोगों से मिलता है, उनके जीवन को छूता है, और हर पल को एक नए नज़रिए से जीने की कोशिश करता है।

लेकिन जैसे ही वह अलास्का के जंगलों में ‘मैजिक बस’ के भीतर कैद होता है, कहानी का सुर बदलने लगता है और प्रकृति, जो दूर से सुंदर और आध्यात्मिक दिखती है, पास आने पर निष्ठुर और उदासीन साबित होती है। भूख, बीमारी और अकेलेपन के चरम क्षणों में क्रिस्टोफर को अहसास होता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और वह समाज से पूरी तरह कटकर जीवित नहीं रह सकता। अपनी मृत्यु के करीब पहुँचकर, जब वह बोरिस पास्तरनाक की किताब ‘डॉक्टर जिवागो’ पढ़ रहा होता है, तो वह पन्नों के हाशिये पर अपने कांपते हाथों से जीवन का सबसे बड़ा सच लिखता है कि खुशी तभी असली होती है, जब उसे बांटा जाए। यह वाक्य केवल एक फिल्म का संवाद नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के पूरे इतिहास का निचोड़ बन जाता है, क्योंकि क्रिस्टोफर की त्रासदी यह नहीं थी कि वह मर गया, बल्कि यह थी कि जब उसे खुशी का असली मंत्र समझ में आया, तब तक उसके पास उस खुशी को बांटने के लिए कोई इंसान नहीं बचा था। यह फिल्म हमें सिखाती है कि प्रकृति से प्रेम करना और आत्म-खोज पर निकलना अद्भुत है, लेकिन इंसानों से रिश्ता तोड़कर, नफरत या आक्रोश में आकर पाई गई आज़ादी अंततः एक भयावह खालीपन में बदल जाती है।

‘Perfect Days’ और हिरायामा का व्यावहारिक ज़ेन दर्शन

इसके बिल्कुल विपरीत छोर पर खड़ी है जर्मन निर्देशक विम वेंडर्स की जापानी फिल्म ‘Perfect Days’, जो हिरायामा नाम के एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति की चुपचाप, बिना किसी शोर के बहती ज़िंदगी को हमारे सामने रखती है। हिरायामा टोक्यो में पब्लिक टॉयलेट साफ करने का काम करता है, एक ऐसा काम, जिसे हमारा आधुनिक, संभ्रांत समाज आमतौर पर हेय दृष्टि से देखता है और बहुत ही निम्न दर्जे का मानता है। लेकिन हिरायामा की आँखों से देखें तो इस काम में भी एक गरिमा है, एक कला है, और वह टॉयलेट्स को ऐसे साफ करता है जैसे कोई चित्रकार कैनवास पर रंग भर रहा हो या कोई पुजारी मंदिर की सफाई कर रहा हो। हिरायामा की दुनिया बहुत छोटी है, मगर उसकी खुशी असीम रूप से गहरी है, और उसकी ज़िंदगी एक कड़े अनुशासन, ठहराव और दोहराव से चलती है जहाँ वह रोज सुबह सूरज की पहली किरण के साथ उठता है, पौधों को पानी देता है, अपनी वर्दी पहनता है और अपनी छोटी वैन में चलते हुए सत्तर और अस्सी के दशक के रॉक संगीत की कैसेट सुनता है।

टोक्यो के आधुनिक टॉयलेट्स को पूरी तन्मयता से साफ करने के बाद, शाम को वह स्थानीय सार्वजनिक स्नानघर जाता है, किताबों की दुकान से एक बेहद सस्ती सेकंड-हैंड किताब खरीदता है और सोते समय उसकी पंक्तियों में पूरी तरह डूब जाता है। हिरायामा का चरित्र जापानी दर्शन ‘वाबी-साबी’ यानी अपूर्णता और सादगी में सुंदरता देखना और ‘कोमोरेबी’ का जीवंत उदाहरण है, जिसका अर्थ होता है पेड़ों की पत्तियों से छनकर आती हुई सूरज की रोशनी। हिरायामा हर दोपहर लंच करते समय पुराने कैमरे से पेड़ों के ऊपर से आती इसी रोशनी की तस्वीरें खींचता है, क्योंकि वह जानता है कि कोई भी दो दिन एक जैसे नहीं होते और हवा का हर झोंका तथा धूप की हर परछाईं केवल उसी एक पल के लिए है, जो अगले ही पल हमेशा के लिए गायब हो जाएगी। उसकी दुनिया में कोई महत्वाकांक्षा नहीं है, कोई शिकायत नहीं है, और वह उसी एकरसता के भीतर अपने लिए हर दिन एक नया आसमान ढूंढ लेता है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली संतुष्टि साधनों में नहीं बल्कि साधना में है।

अलगाव बनाम ठहराव: दोनों चरित्रों का दार्शनिक विश्लेषण

यदि हम इन दोनों चरित्रों को एक वैचारिक तराजू पर तौलें, तो हमें समझ आता है कि दोनों ही समकालीन दुनिया की विसंगतियों, उपभोक्तावाद और अलगाव से जूझ रहे हैं, मगर उनके समाधान बिल्कुल जुदा हैं। क्रिस्टोफर का दृष्टिकोण पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी और विद्रोही है, जो व्यवस्था को बदले बिना या उससे पूरी तरह नाता तोड़े बिना शुद्धता पाने को असंभव मानता है, इसलिए वह व्यवस्था पर चोट करता है और खुद को भौगोलिक रूप से बहुत दूर ले जाता है। हिरायामा इसके उलट यह समझ चुका है कि दुनिया को बदला नहीं जा सकता और न ही उससे पूरी तरह भागा जा सकता है, लेकिन अपने भीतर के संसार को इस तरह निर्मित किया जा सकता है कि बाहर की गंदगी या शोर अंदर प्रवेश न कर सके। क्रिस्टोफर ने समाज को ‘पाखंड’ माना और जंगलों की ओर भागा, लेकिन अंत में उसने पाया कि इंसानी जुड़ाव ही जीवन का असली सार है, जिसके बिना सब कुछ अधूरा है।

हिरायामा समाज के भीतर रहता है, वह लोगों से बहुत कम बात करता है, लेकिन वह उनसे पूरी तरह कटा हुआ नहीं है, बल्कि वह पार्क में एक बेघर आदमी के अजीब डांस को सम्मान से देखता है, टॉयलेट में खोए हुए एक बच्चे की माँ को ढूंढने में मदद करता है और अपनी भतीजी के आने पर अपना कमरा उसके लिए छोड़ देता है। हिरायामा दिखाता है कि अकेले रहना और अकेलापन दो अलग चीज़ें हैं, और वह अकेले रहते हुए भी अपने शांत स्वभाव के कारण पूरी दुनिया से एक गहरे स्तर पर जुड़ा हुआ है। क्रिस्टोफर खुशी को भविष्य में और किसी अन्य स्थान पर तलाश रहा था, जबकि हिरायामा खुशी को इसी वक्त, इसी जगह और अपने भीतर जी रहा है, जो इन दोनों फिल्मों के बीच का सबसे बड़ा दार्शनिक अंतर बनकर उभरता है।

सिनेमाई शिल्प, संगीत और क्लाइमेक्स की गूंज

दोनों फिल्मों का विजुअल और साउंडस्केप उनके दर्शन को और गहरा बनाता है, जहाँ ‘Into the Wild’ में अलास्का के विशाल, विहंगम दृश्य हैं, जो मनुष्य के बौनेपन और प्रकृति की विशालता को दिखाते हैं। एडी वेडर का बैकग्राउंड संगीत क्रिस्टोफर के भीतर की कशमकश, उसके गुस्से और उसकी आज़ादी की तड़प को आवाज़ देता है, जिसमें एक रवानगी और बेचैनी है जो दर्शक को भी थकाती और रोमांचित करती है। इसके विपरीत, ‘Perfect Days’ को एक संकीर्ण आस्पेक्ट रेशियो में शूट किया गया है, जो फ्रेम हिरायामा की सीमित और संकुचित दुनिया को दर्शाता है, लेकिन कमाल यह है कि इस छोटे फ्रेम के भीतर भी निर्देशक इतनी सुंदरता भर देते हैं कि वह विशाल लगने लगती है। यहाँ कोई भारी बैकग्राउंड संगीत नहीं है, बल्कि यहाँ टोक्यो की सड़कों का शोर है, झाड़ू के सरकने की आवाज़ है, और सबसे महत्वपूर्ण हिरायामा की कार में बजने वाले पुराने गानों के कैसेट्स हैं जो उसके मूड को बयां करते हैं।

फिल्म का अंतिम दृश्य सिनेमा के इतिहास के सबसे बेहतरीन दृश्यों में से एक है, जहाँ हिरायामा गाड़ी चला रहा है और नीना सिमोन का मशहूर गाना “Feeling Good” बज रहा है, जो एक नई सुबह और नई ज़िंदगी की बात करता है। इस दृश्य में कैमरा लगातार हिरायामा के चेहरे पर टिका रहता है और सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर आ-जा रही होती है, जिससे उसके चेहरे पर एक साथ कई भावनाएँ तैरती दिखाई देती हैं। उसकी आँखों में आंसू हैं, जो शायद उसके अतीत के किसी अनकहे दर्द, अकेलेपन या खोए हुए परिवार की याद के हैं, और उसी पल उसके होठों पर एक गहरी, शांत मुस्कान आ जाती है, जो वर्तमान पल के प्रति उसकी कृतज्ञता को दर्शाती है। यह दृश्य दिखाता है कि खुशी कोई स्थायी सपाट भावना नहीं है, बल्कि यह दुखों, आंसुओं और पुरानी यादों को स्वीकार करते हुए भी जीवन को पूरी जीवंतता के साथ ‘हाँ’ कहने का नाम है, जो दर्शक के दिल पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है।

‘Into the Wild’ और ‘Perfect Days’ मिलकर खुशी के भूगोल और उसके विभिन्न आयामों को पूरी तरह से मुकम्मल करती हैं। क्रिस्टोफर हमें यह बड़ी चेतावनी देता है कि हम अपने अहंकार या आदर्शवाद में समाज से इतने दूर न निकल जाएँ कि वापस लौटने के सारे रास्ते बंद हो जाएँ और अंत में केवल पछतावा हाथ लगे। वह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितनी भी बड़ी उपलब्धि या आज़ादी पा लें, अगर हमारे पास उसे साझा करने के लिए कोई सहयात्री नहीं है, तो वह आज़ादी एक बंजर ज़मीन जैसी है जहाँ कुछ नहीं उगता। वहीं, दूसरी ओर हिरायामा हमें सिखाती है कि जीवन को सुंदर और सार्थक बनाने के लिए अलास्का के जंगलों या किसी हिमालय की गुफाओं में जाने की कतई ज़रूरत नहीं है।

खुशी कोई बहुत बड़ा मकसद, कोई क्रांति या कोई चमत्कारी मोड़ नहीं है, बल्कि यह तो रोज़मर्रा की छोटी-छोटी, मामूली लगने वाली बातों में छिपी हुई है। यह खुशी एक किताब की किसी पसंदीदा लाइन में है, सुबह की पहली चाय की चुस्की में है, किसी पुराने कैसेट की घिसघिसाती आवाज़ में है, किसी अजनबी बच्चे की बेसाख्ता मुस्कान में है, या किसी शाम घर लौटते वक्त पेड़ों से छनकर आती ढलती हुई धूप के अहसास में है। ‘Into the Wild’ हमें बाहर के विराट संसार की अनिवार्य सच्चाई से रूबरू कराती है, और ‘Perfect Days’ हमें हमारे भीतर के उस शांत कोने से मिलवाती है जिसे हम अक्सर इस आधुनिक अंधी दौड़ में भूल जाते हैं। दोनों फिल्में सामूहिक रूप से हमें एक ही परम सत्य की ओर ले जाती हैं कि खुशी कहीं खोई नहीं है, वह यहीं है, इसी वक्त है, बस हम ही उसे देखना भूल गए हैं, और जीवन को जीने के दो ही तरीके हैं कि या तो हर चीज़ को एक चमत्कार की तरह देखो, या किसी भी चीज़ को चमत्कार मत मानो, जहाँ हिरायामा ने पहली राह चुनी और क्रिस्टोफर ने उसे अंतिम क्षणों में चुनते-चुनते अपनी जान दे दी।

अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।