लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर

एडम मकै की फिल्म ‘वाइस’ अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति डिक चेनी की कहानी है, लेकिन इसे सिर्फ एक बायोग्राफी समझना गलती होगी। यह फिल्म असल में उस ‘सिस्टम’ का पोस्टमार्टम है जो सत्ता की भूख में इंसानियत को सूली पर चढ़ा देता है। डिक चेनी कोई ऐसे नेता नहीं थे जो मंच पर खड़े होकर बड़े-बड़े भाषण देते या जनता के बीच जाकर हाथ मिलाते। वे नेपथ्य के खिलाड़ी थे। फिल्म हमें दिखाती है कि कैसे एक साधारण सा आदमी, जो कभी बिजली के खंभों पर चढ़कर तार ठीक करता था और शराब पीकर गाड़ी चलाने के जुर्म में पकड़ा जाता था, दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का सबसे खतरनाक मास्टरमाइंड बन गया। यह कहानी हमें बताती है कि असली ताकत शोर मचाने में नहीं, बल्कि खामोशी से फाइलों के बीच बैठकर कानून की नई परिभाषाएं लिखने में होती है।

डिक चेनी की सत्ता का सफर ‘मौन’ की राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। फिल्म में क्रिश्चियन बेल ने चेनी का किरदार जिस तरह निभाया है, वह रोंगटे खड़े कर देता है। चेनी ने सत्ता की सीढ़ियां बहुत चालाकी से चढ़ीं। उन्होंने यह समझ लिया था कि अगर आपको व्यवस्था पर कब्जा करना है, तो आपको राष्ट्रपति बनने की जरूरत नहीं है, बल्कि आपको उस कुर्सी के पीछे खड़ा होना है जहाँ से फैसले लिए जाते हैं। उन्होंने अमेरिकी विदेश नीति, खुफिया एजेंसियों और यहाँ तक कि मीडिया को भी अपने इशारों पर नचाना शुरू कर दिया। मौन रहने का मतलब सिर्फ चुप रहना नहीं है, बल्कि दूसरों को पढ़ना है। चेनी एक ऐसे शख्स थे जो मीटिंग्स में सबसे कम बोलते थे और सबसे ज्यादा सुनते थे। इससे उन्हें यह पता चल जाता था कि सामने वाले की कमजोरी क्या है, कौन किसके पक्ष में है और किसे कैसे रास्ते से हटाना है। जब आप चुप रहते हैं, तो आप अपनी योजनाएं गुप्त रखते हैं और दूसरों को खुद को उजागर करने का मौका देते हैं। सूचना ही आज की दुनिया में असली दौलत है, और चेनी ने खामोश रहकर उस पर एकाधिकार कर लिया था। चेनी ने ‘यूनिटरी एग्जीक्यूटिव थ्योरी’ जैसा एक कानूनी हथियार खोजा, जिसका सीधा सा मतलब था कि अगर राष्ट्रपति कुछ करता है, तो वह गैरकानूनी नहीं हो सकता। इस एक विचार ने लोकतंत्र को अंदर ही अंदर खोखला करना शुरू कर दिया।

फिल्म का सबसे डरावना पहलू वह है जिसे हम ‘मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स’ कहते हैं। यह शब्द सुनने में भारी लगता है, लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा है हथियार कंपनियों, फौज के ठेकेदारों और राजनेताओं का एक ऐसा नापाक गठजोड़ जो सिर्फ युद्ध से फलता-फूलता है। फिल्म बताती है कि इराक पर हमला करने से बहुत पहले ही अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को यह साफ पता था कि सद्दाम हुसैन के पास न तो कोई एटमी हथियार हैं और न ही उसका 9/11 के हमलों से कोई लेना-देना है। लेकिन चेनी और उनकी मंडली को युद्ध चाहिए था। क्यों? क्योंकि युद्ध उनके लिए कोई त्रासदी नहीं, बल्कि ‘बिजनेस डील’ थी। जब मिसाइलें गिरती हैं, तो आम लोगों के घर तबाह होते हैं, लेकिन हथियार बनाने वाली कंपनियों के शेयर आसमान छूने लगते हैं।यह इस धंधे का सबसे चालाकी भरा हिस्सा है। इसमें वही लोग शामिल होते हैं जो कभी सरकारी पदों पर बैठकर नीतियां बनाते हैं और बाद में उन्हीं हथियार कंपनियों के बोर्ड मेंबर या सलाहकार बन जाते हैं। ‘वाइस’ फिल्म में डिक चेनी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं वे पहले रक्षा मंत्री रहे, फिर ‘हैलीबर्टन’ जैसी बड़ी कंपनी के सीईओ बने, और फिर उपराष्ट्रपति बनकर वापस सरकार में आए। जब फैसला लेने वाला व्यक्ति खुद उस कंपनी का हिस्सा रहा हो जो युद्ध का सामान बेचती है, तो वह शांति के बजाय हमेशा युद्ध का ही रास्ता चुनेगा।

इस अर्थशास्त्र का एक और काला पक्ष यह है कि ये कंपनियां सिर्फ युद्ध के दौरान हथियार बेचकर ही पैसा नहीं कमातीं, बल्कि युद्ध के बाद उस तबाह हुए मुल्क को ‘दोबारा बनाने’ (Reconstruction) के नाम पर भी अरबों डॉलर बटोरती हैं। इराक में यही हुआ पहले बमबारी से बुनियादी ढांचा नष्ट किया गया, और फिर उसे फिर से बनाने के ठेके उन्हीं अमेरिकी कंपनियों को दिए गए जो सत्ता के करीब थीं। यानी, विनाश में भी मुनाफा और विकास में भी मुनाफा।अमेरिका जैसे विकसित देश अपनी जीडीपी का एक बहुत बड़ा हिस्सा डिफेंस पर खर्च करते हैं। लेकिन वे सिर्फ अपने लिए हथियार नहीं बनाते, बल्कि वे पूरी दुनिया को हथियार बेचते हैं। इस बाजार को चलाने के लिए ‘डर’ का निर्यात किया जाता है। दो पड़ोसी देशों के बीच तनाव पैदा करना या किसी क्षेत्र में अस्थिरता बनाए रखना इस अर्थशास्त्र के लिए जरूरी है। जब तक डर रहेगा, तब तक देशों के बीच हथियारों की होड़ (Arms Race) लगी रहेगी और इस कॉम्प्लेक्स की तिजोरियां भरती रहेंगी।हथियार बनाने वाली कंपनियां राजनीति में बहुत गहरा दखल रखती हैं। वे चुनाव के समय राजनेताओं को करोड़ों डॉलर का चंदा देती हैं। बदले में, वे यह सुनिश्चित करती हैं कि सरकार ऐसी विदेश नीति बनाए जिससे हथियारों की मांग कभी कम न हो। इसे ‘लॉबिंग’ कहा जाता है। यही कारण है कि जब आम जनता शांति की मांग करती है, तब भी सरकारें रक्षा बजट बढ़ाती रहती हैं, क्योंकि वे जनता के प्रति नहीं, बल्कि उन कंपनियों के प्रति जवाबदेह होती हैं जिन्होंने उन्हें सत्ता तक पहुँचाया है।

यहाँ मीडिया का रोल भी महत्वपूर्ण है। ​अक्सर हमें लगता है कि मीडिया स्वतंत्र है, लेकिन असलियत यह है कि बड़े मीडिया हाउस खुद एक बहुत बड़ा बिजनेस हैं। जब मीडिया का मालिक एक बड़ा उद्योगपति होगा, तो वह कभी ऐसी खबरें नहीं दिखाएगा जिससे उसके दूसरे धंधों (जैसे हथियार, तेल या बिजली) को नुकसान पहुंचे। यहाँ खबरों का चयन इस आधार पर नहीं होता कि ‘सच’ क्या है, बल्कि इस आधार पर होता है कि ‘मुनाफा’ किसमें है। विज्ञापन देने वाली कंपनियां भी मीडिया की भाषा तय करती हैं, क्योंकि वे ही पैसा देती हैं।मीडिया हाउस अपनी खबरों के लिए सरकारी महकमों, बड़े अधिकारियों, पेंटागन या पुलिस जैसे संस्थानों पर निर्भर होते हैं। सत्ता इन्हीं संस्थानों के जरिए मीडिया को ‘प्लांटेड’ सूचनाएं (Information Feed) देती है। जब हर चैनल और अखबार को एक ही जगह से सूचना मिलेगी, तो वे सब एक ही सुर में बात करने लगेंगे। इससे जनता को लगता है कि ‘अगर सब यही कह रहे हैं, तो सच यही होगा।’ यहीं से आम आदमी के दिमाग में एक खास किस्म का सच बैठा दिया जाता है।

जनमत बनाने का सबसे पुराना और कारगर तरीका है ‘डर’। ‘वाइस’ फिल्म में भी हम देखते हैं कि कैसे इराक युद्ध से पहले अमेरिकी जनता को सद्दाम हुसैन के नाम से डराया गया। कभी आतंकवाद, कभी धर्म, तो कभी पड़ोसी मुल्क का खतरा दिखाकर लोगों के मन में असुरक्षा पैदा की जाती है। जब इंसान डरा हुआ होता है, तो वह अपनी आजादी और अपना पैसा सत्ता के हाथों में सौंप देता है ताकि वह सुरक्षित रह सके। यह डर ही वह जरिया है जिससे ‘युद्ध’ या ‘कठोर कानूनों’ के लिए जनता की सहमति (Consent) हासिल की जाती है।अगर कोई पत्रकार या बुद्धिजीवी सत्ता के नैरेटिव (बनाए गए सच) पर सवाल उठाता है, तो पूरा सिस्टम उसे चुप कराने में लग जाता है। उसे ‘देशद्रोही’, ‘विदेशी एजेंट’ या ‘पुराने खयालात का’ बताकर बदनाम किया जाता है। सोशल मीडिया और चैनलों पर उसे इतना ट्रोल किया जाता है कि बाकी लोग सवाल पूछने की हिम्मत ही न करें। इसे ‘फ्लैक’ (Flak) कहते हैं, यानी सच बोलने वाले पर चौतरफा हमला करना ताकि सत्ता का बनाया हुआ झूठ ही एकमात्र सच बना रहे।

मीडिया लगातार हमें यह यकीन दिलाता है कि सत्ता जो कर रही है, वही ‘देशहित’ में है और इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता (Alternative) संभव ही नहीं है। बार-बार एक ही बात को अलग-अलग चर्चाओं में दोहराकर इसे एक ‘यूनिवर्सल सच’ बना दिया जाता है। धीरे-धीरे लोग सवाल पूछना बंद कर देते हैं और यह मानने लगते हैं कि यही सही है। इसी को ‘जनमत का निर्माण’ कहते हैं, जहाँ जनता की राय असल में उसकी अपनी नहीं होती, बल्कि सत्ता द्वारा उसके दिमाग में डाली गई होती है।

चेनी उपराष्ट्रपति बनने से पहले इस बड़ी कंपनी के सीईओ थे। फिल्म तथ्यों के साथ दिखाती है कि कैसे इराक युद्ध शुरू होते ही हैलीबर्टन को बिना किसी कंपटीशन के अरबों डॉलर के ठेके दे दिए गए। यह सीधा-सादा भ्रष्टाचार नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ नीति बनाने वाला ही मुनाफा कमाने वाला भी था। यहाँ तर्क यह है कि अगर दुनिया में शांति हो जाएगी, तो ये अरबों-खरबों की मिसाइलें और टैंक कौन खरीदेगा? इसलिए युद्ध को खत्म करने के बजाय उसे बनाए रखना, उसे फैलाना और नए दुश्मन पैदा करना इस सिस्टम की मजबूरी है।

यही वजह है कि आज भी हम देखते हैं कि अफगानिस्तान हो, सीरिया हो या यमन दुनिया का कोई भी कोना जल रहा हो, अमेरिका के हथियार वहां जरूर मौजूद होते हैं। तालीबान और अलकायेदा के आतंकवादियों के हाथों में अमेरिकी हथियार नज़र आना इसी बात की गवाही देता है। अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है लेकिन ‘वाइस’ हमें एक और गहरे सवाल की तरफ ले जाती है जो हथियार लॉबी पूरी दुनिया में मौत का सामान बेचती है, क्या वह अपने देश के नागरिकों को छोड़ देगी? फिल्म एक अनकहे सवाल की तरह हमें झकझोरती है कि अमेरिका के भीतर हर साल हजारों लोग गन वायोलेंस (बंदूक की हिंसा) में मारे जाते हैं, छोटे-छोटे बच्चे स्कूलों में गोलियों का शिकार होते हैं, फिर भी वहां बंदूकों पर रोक क्यों नहीं लगती?

इसका जवाब भी उसी मुनाफे के गणित में छिपा है। वही लॉबी जो विदेशों में युद्ध बेचती है, अपने देश के भीतर भी डर और असुरक्षा का माहौल बनाए रखती है। वे चाहते हैं कि हर नागरिक डरा हुआ रहे, ताकि वह अपनी सुरक्षा के लिए बंदूक खरीदे। डर ही वह ईंधन है जिससे हथियारों का बाजार चलता है। जब तक पड़ोसी को पड़ोसी से खतरा महसूस होगा, तब तक गन बनाने वाली कंपनियों की तिजोरियां भरती रहेंगी। डिक चेनी का किरदार इसी सोच का चेहरा है, जहाँ इंसान की जान की कीमत किसी कंपनी के बैलेंस शीट से कम आंकी जाती है।

फिल्म एक और बारीक चीज की तरफ इशारा करती है, जिसे हम ‘भाषा की बाजीगरी’ कह सकते हैं। चेनी और उनकी टीम ने अपराधों को छुपाने के लिए नए-नए शब्द गढ़े। उन्होंने ‘टॉर्चर’ (यातना) को ‘एनहांस्ड इंटरोगेशन’ (उन्नत पूछताछ) कहना शुरू कर दिया। उन्होंने बेगुनाह लोगों की मौत को ‘कोलेटरल डैमेज’ (अप्रत्यक्ष नुकसान) का नाम दिया। यह सिर्फ नाम बदलना नहीं था, बल्कि यह लोगों के जमीर को सुलाने की कोशिश थी। जब आप किसी मासूम की मौत को एक तकनीकी नाम दे देते हैं, तो लोगों का गुस्सा ठंडा पड़ जाता है। एडम मकै ने इस फिल्म को शोध और व्यंग्य से बुना है, लेकिन इसका हर सीन हमें यह एहसास कराता है कि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ सच को शब्दों के जाल में दफन कर दिया गया है।

मीडिया की भूमिका पर भी यह फिल्म कड़ा प्रहार करती है। फिल्म दिखाती है कि कैसे बड़े-बड़े न्यूज चैनलों का इस्तेमाल करके जनता के दिमाग में झूठ भरा गया। राष्ट्रवाद और सुरक्षा के नाम पर लोगों को इस कदर उकसाया गया कि उन्होंने अपने ही अधिकारों की बलि दे दी। लोग टीवी के सामने बैठकर युद्ध का जश्न मना रहे थे, जबकि पीछे बैठकर कुछ लोग उस युद्ध से अपनी तिजोरियां भर रहे थे। यह ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ का सबसे क्लासिक उदाहरण है, जहाँ जनता को लगता है कि फैसला उनका है, जबकि हकीकत में उनका दिमाग सत्ता के कंट्रोल में होता है।

डिक चेनी का किरदार उस राजनीति का प्रतीक है जो भावनाओं और देशभक्ति का लबादा ओढ़कर सिर्फ कॉर्पोरेट हितों की रक्षा करती है। फिल्म के अंत में जब चेनी सीधे दर्शकों की आँखों में झाँककर कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया, देशहित में हमारी सुरक्षा के लिए किया और उन्हें इसके लिए कोई पछतावा नहीं है, तो वह असल में हमें आइना दिखा रहे होते हैं। वे कह रहे होते हैं कि जब तक हम सवाल नहीं पूछेंगे, जब तक हम सत्ता के पीछे छिपे धंधे को नहीं समझेंगे, तब तक वे ऐसे ही हमारा इस्तेमाल करते रहेंगे।

‘वाइस’ एक चेतावनी है। यह हमें बताती है कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि सत्ता की रगों में दौड़ रहे उस जहर को पहचानने का नाम है जो मुनाफे के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अगर हम सिर्फ चेहरे देखते रहेंगे और उनके पीछे के खेल को नजरअंदाज करेंगे, तो सत्ता न सिर्फ निर्दयी होगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी घातक बन जाएगी। यह फिल्म हमें मजबूर करती है कि हम अखबार की सुर्खियों के पीछे छिपे उन छोटे अक्षरों को पढ़ें जहाँ असली साजिशें रची जाती हैं। सत्ता जब बेनकाब होती है, तो वह बहुत कुरूप होती है, लेकिन उस कुरूपता को देखना ही उसे बदलने की पहली शर्त है।

अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।