लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर
सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में महज मनोरंजन का जरिया नहीं होतीं, बल्कि वे आने वाली नस्लों के लिए तारीख का एक ऐसा दस्तावेज बन जाती हैं जो उन्हें अपनी जड़ों और अपने गौरव से जोड़े रखती हैं। 1981 में मुस्तफा अक्काद के निर्देशन में बनी फिल्म ‘लायन ऑफ द डेजर्ट’ एक ऐसी ही शाहकार कृति है। यह फिल्म सिर्फ लीबिया के एक बूढ़े मुजाहिद की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस इंसानी जज्बे की जीत है जो साम्राज्यवादी ताकतों की तोपों और टैंकों के सामने भी झुकना नहीं जानता। अक्काद ने इस फिल्म के जरिए दुनिया को बताया कि जब एक कौम अपनी आजादी का फैसला कर लेती है, तो दुनिया की कोई भी बड़ी ताकत उसे गुलाम नहीं रख सकती।
इस फिल्म की गहराई को समझने के लिए हमें उस दौर की तारीख में उतरना होगा, जब इटली की फासीवादी हुकूमत और बेनिटो मुसोलिनी अपने ‘रोमन साम्राज्य’ के सपने को दोबारा जिंदा करने के लिए लीबिया की जमीन को पैरों तले रौंद रहे थे। मुसोलिनी के लिए लीबिया महज एक रेगिस्तान नहीं था, बल्कि वह उसका ‘चौथा किनारा’ था जिसे वह किसी भी कीमत पर हड़पना चाहता था। इसी ऐतिहासिक और खौफनाक मंजर के बीच से एक शख्सियत उभरती है-उमर मुख्तार। एक साधारण सा स्कूल टीचर, जो बच्चों को कुरान पढ़ाता था, लेकिन जब जुल्म ने हद पार की, तो वही हाथ जो कलम पकड़ते थे, तलवार उठाने पर मजबूर हो गए।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका सलीका और सादगी है। इसे लीबिया के उन्हीं असली रेगिस्तानों और चट्टानी इलाकों में फिल्माया गया है जहाँ यह जंग लड़ी गई थी। फिल्म देखते वक्त ऐसा महसूस होता है जैसे तपती धूप और उड़ती हुई धूल हमारे चेहरों को छू रही हो। मुस्तफा अक्काद ने इस फिल्म को बनाने में पानी की तरह पैसा बहाया और हजारों स्थानीय लोगों को शामिल किया, ताकि फिल्म में वह असलियत और रूह आ सके जो अक्सर स्टूडियो में बनी फिल्मों में गायब रहती है।
किरदारों की बात करें तो एंथनी क्विन ने उमर मुख्तार के रोल में खुद को फना कर दिया है। उनकी आंखों में वह चमक है जो एक तरफ अपने लोगों के लिए बेपनाह मोहब्बत दिखाती है और दूसरी तरफ दुश्मन के लिए एक चट्टान जैसी सख्ती। वहीं दूसरी तरफ ओलिवर रीड ने जनरल ग्राजियानी के किरदार में उस क्रूरता और घमंड को पर्दे पर उतारा है जो एक साम्राज्यवादी फौज का हिस्सा होता है। इन दोनों किरदारों का टकराव सिर्फ दो फौजों का टकराव नहीं है, बल्कि यह दो अलग-अलग विचारधाराओं की जंग है। एक तरफ वह ताकत है जो मशीनों, हवाई जहाजों और जहरीली गैसों के दम पर राज करना चाहती है, और दूसरी तरफ वह नैतिकता है जो अपने मुल्क की मिट्टी और अपने उसूलों के लिए जान देने को तैयार है।
फिल्म में इटली की फौज द्वारा किए गए जुल्मों को जिस बेबाकी से दिखाया गया है, वह रूह को कंपा देता है। मासूम बच्चों का कत्ल, गांवों को जला देना और हजारों बेगुनाह लोगों को ‘कंसंट्रेशन कैंप’ में जानवरों की तरह ठूंस देना। ये वो मंजर हैं जो फासीवाद के असली चेहरे को बेनकाब करते हैं। फिल्म का संगीत, जिसे मौरिस जार ने तैयार किया है, रेगिस्तान की खामोशी और जंग के शोर के बीच एक ऐसा माहौल बुनता है जो दर्शकों को जज्बाती तौर पर फिल्म से बांधे रखता है।
उमर मुख्तार के किरदार की सबसे खूबसूरत बात यह दिखाई गई है कि वे जंग के मैदान में भी अपनी इंसानियत और उसूल नहीं भूलते। जब उनके साथी एक इतालवी कैदी को मारना चाहते हैं, तो मुख्तार उसे रोकते हुए कहते हैं कि हम उनके जैसे नहीं हैं, हम अपने उसूलों के लिए लड़ रहे हैं। यह बात साबित करती है कि प्रतिरोध की लड़ाई नफरत से नहीं, बल्कि इंसाफ की चाहत से लड़ी जाती है। इस फिल्म को इटली में कई दशकों तक इसलिए प्रतिबंधित रखा गया क्योंकि यह फिल्म उनकी पुरानी हुकूमत के काले कारनामों और फासीवादी जुल्मों को पूरी दुनिया के सामने नंगा कर रही थी।
फिल्म अपने आखिरी पड़ाव पर जब पहुँचती है, तो वह एक मातम नहीं बल्कि एक जीत का अहसास कराती है। भले ही उमर मुख्तार को गिरफ्तार कर लिया जाता है, लेकिन उनकी रूह को दुश्मन कैद नहीं कर पाता। अदालत का वह आखिरी दृश्य आज भी दुनिया भर के आजादी चाहने वालों के लिए एक मशाल की तरह है। जब अदालत के कमरे में उमर मुख्तार के सामने मौत खड़ी होती है, तब भी उनकी आवाज में वह खौफ नहीं होता जो एक हारने वाले में होता है।
जब अदालत में उनसे पूछा गया: “क्या तुम मानते हो कि तुमने बग़ावत की है?” तो उमर मुख्तार ने मुस्कुराकर निडरता से कहा “हाँ, मैं मानता हूं।” फिर जज ने जब उनकी मौत की सजा सुनाई, तो उन्होंने बड़े ही इत्मीनान से जवाब दिया “मुझे कोई अफ़सोस नहीं। यही मेरी ज़िन्दगी का बेहतरीन अंजाम होगा।”
दुश्मन को लगा था कि उमर मुख्तार को फांसी देकर वह इस बगावत को खत्म कर देगा, लेकिन जब जज ने उन्हें हथियार डालने और अपने साथियों को रोकने का लालच दिया, तो मुख्तार ने वो शब्द कहे जो सदियों तक गूँजते रहेंगे:
“हम या तो शानदार फतह हासिल करेंगे या फिर अल्लाह की राह में शहीद हो जाएंगे। हम हथियार नहीं डालेंगे। जंग जारी रहेगी। तुम्हें हमारी अगली नस्ल से लड़ना होगा।”
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।