Author: Arif Aziz

क्या ईश्वर है?

मुफ्ती शमाइल नदवी और जावेद अख्तर के बीच ईश्वर के अस्तित्व को लेकर हुई बहस ने आस्था और तर्क के टकराव को उजागर किया। नदवी ने सृष्टि की व्यवस्था को ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण बताया, जबकि अख्तर ने ठोस सबूतों की मांग करते हुए दुनिया में दुख और अन्याय पर सवाल उठाए। लेख में कैरन आर्मस्ट्रांग के हवाले से कहा गया कि ईश्वर को विज्ञान से नहीं, अनुभूति से समझा जाना चाहिए। निष्कर्ष यह है कि बहस ईश्वर के होने-न होने से अधिक इस बात पर है कि धर्म और विज्ञान इंसानियत व न्याय की सेवा कर रहे हैं या नहीं।

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वंदे मातरम विरोध: पसमांदा को मुख्यधारा से काटने की साजिश

लेख में वंदे मातरम विवाद को धर्म या राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि अशराफ़ नेतृत्व की भावनात्मक और डर-आधारित राजनीति बताया गया है। लेखक के अनुसार यह विवाद पसमांदा मुसलमानों के असली मुद्दों—शिक्षा, रोज़गार और हिस्सेदारी—से ध्यान भटकाने का साधन है। इतिहास में 1937 के समझौते से यह प्रश्न सुलझ चुका था, फिर भी इसे बार-बार उछाला जाता है। अशराफ़ वर्ग अपनी सत्ता बचाने के लिए अलगाव को बढ़ावा देता है, जबकि पसमांदा समाज का असली संघर्ष गरीबी, जहालत और राजनीतिक शोषण के खिलाफ होना चाहिए।

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बहुविवाह: मज़हबी हक़ या सामाजिक नाइंसाफी?

भारतीय मुस्लिम समाज में बहुविवाह का मुद्दा अब धार्मिक बहस से आगे बढ़कर मानवाधिकार, संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन गया है। BMMA के सर्वे और कई महिलाओं की दर्दनाक कहानियाँ दिखाती हैं कि अनियंत्रित बहुविवाह आर्थिक तंगी, मानसिक आघात और सामाजिक अपमान का कारण बनता है, विशेषकर पसमांदा परिवारों में। कानूनी असमानता भी बनी हुई है, जहाँ मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो अन्य समुदायों की महिलाओं को प्राप्त है। कुरान की ‘इंसाफ’ की शर्त practically पूरी होना नामुमकिन बताती है, जिससे एक विवाह का सिद्धांत ही मूल बनता है। इसलिए सुधार और कड़े कानून इंसाफ तथा मानवीय गरिमा की मांग हैं।

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