Author: Arif Aziz

व्हाइट-कॉलर’ आतंक: शिक्षित दिमाग में ज़हरीली सोच

Here is a **100-word summary**:

दिल्ली के लाल किले के पास 10 नवंबर का विस्फोट दिखाता है कि आतंकवाद अब सिर्फ गरीब या अशिक्षितों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षित पेशेवर भी कट्टरपंथ का शिकार हो रहे हैं। यह साबित करता है कि चरमपंथ का मूल आर्थिक नहीं, वैचारिक ज़हर है, जो लोगों को ‘बड़े मकसद’ और ‘हम बनाम वे’ की सोच में उलझा देता है। इसका असर पूरे मुस्लिम समुदाय पर अविश्वास बढ़ाता है। समाधान तकनीकी नहीं, वैचारिक और सामाजिक है—जैसे विश्वविद्यालयों में डी-रेडिकलाइज़ेशन, सकारात्मक डिजिटल अभियान और पसमांदा आंदोलन, जो भारतीय मुसलमानों को समानता, राष्ट्रहित और संवैधानिक रास्ते से जोड़ता है।

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बिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक

**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।

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