लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
बहमन घोबादी की फिल्म ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ महज एक सिनेमाई अनुभव नहीं है बल्कि यह उस मानवीय त्रासदी का एक जीता-जागता और दहला देने वाला दस्तावेज है जिसे अक्सर दुनिया की बड़ी ताकतें आंकड़ों और राजनीतिक बयानों के पीछे छुपा देती हैं। साल 2004 में आई यह फिल्म इराक पर अमेरिकी हमले के ठीक पहले के दौर को दिखाती है लेकिन इसका कैनवास किसी युद्ध फिल्म जैसा नहीं है जिसमें तोपें और विमानों के बीच वीरता की कहानियां बुनी गई हों। इसके बजाय यह फिल्म उन नन्हे कंधों पर बोझ दिखाती है जिनका बचपन बारूदी सुरंगों के बीच दफन हो चुका है। ईरानी-कुर्द निर्देशक बहमन घोबादी ने कुर्दिस्तान की उस मिट्टी की सोंधी खुशबू और वहां के लहू की गंध को इतनी शिद्दत से पर्दे पर उतारा है कि देखने वाला खुद को उसी शरणार्थी कैंप का एक हिस्सा महसूस करने लगता है। फिल्म की शुरुआत से ही एक ऐसी उदासी और बेचैनी का माहौल बनता है जो अंत तक दर्शक का पीछा नहीं छोड़ता। यह एक ऐसी दुनिया है जहां स्कूल की घंटी नहीं बल्कि धमाकों की गूंज बच्चों की सुबह करती है और जहां खिलौनों की जगह वे असली बमों के खाली खोल से खेलते हैं।
फिल्म का मुख्य किरदार सैटेलाइट है जो तेरह साल का एक लड़का है और उस शरणार्थी कैंप के बच्चों का बेताज बादशाह है। उसका नाम सैटेलाइट इसलिए पड़ा है क्योंकि वह तकनीकी समझ रखता है और गांव वालों के लिए टीवी एंटीना और डिश लगाने का काम करता है ताकि वे सद्दाम हुसैन के पतन और अमेरिकी फौज की आमद की खबरें सुन सकें। सैटेलाइट एक ऐसा पात्र है जो युद्ध की विभीषिका के बीच भी एक तरह की व्यवस्था बनाने की कोशिश करता है। वह बच्चों की एक फौज चलाता है जो पहाड़ों और खेतों में बिछी बारूदी सुरंगों को निकालते हैं ताकि उन्हें बेचकर कुछ पैसे कमाए जा सकें। यह देखना रोंगटे खड़े कर देता है कि जिस उम्र में बच्चों को अक्षरों का ज्ञान होना चाहिए उस उम्र में ये बच्चे मौत के सौदागरों द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों को पहचानने और उन्हें निष्क्रिय करने में माहिर हो चुके हैं। सैटेलाइट के मन में अमेरिका को लेकर एक अजीब सी कशिश और उम्मीद है। वह अमेरिकी फौज को अपना रक्षक और मसीहा मानता है। वह उनकी भाषा के चंद लफ्ज बोलकर गर्व महसूस करता है और उसे लगता है कि जब वे आएंगे तो सब कुछ बदल जाएगा। उसकी यह मासूमियत और उसका यह अटूट भरोसा ही इस फिल्म का सबसे बड़ा दुखद पहलू है क्योंकि दर्शक जानते हैं कि यह उम्मीद जल्द ही चकनाचूर होने वाली है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब तीन नए बच्चे इस कैंप में दाखिल होते हैं जिनमें हेंगोव, उसकी बहन अग्रिन और एक छोटा बच्चा रीगा शामिल हैं। हेंगोव के दोनों हाथ नहीं हैं, वह बारूदी सुरंग का शिकार हो चुका है लेकिन उसके पास भविष्य देखने की एक अलौकिक शक्ति है। उसकी बहन अग्रिन की आंखों में एक ऐसा गहरा सन्नाटा और खौफ है जिसे देखकर रूह कांप जाती है। वह शायद ही कभी मुस्कुराती है और उसकी खामोशी फिल्म के सबसे भारी दृश्यों में से एक है। सैटेलाइट अग्रिन की ओर आकर्षित होता है, वह उसकी मदद करना चाहता है, उसे खुश देखना चाहता है लेकिन अग्रिन एक ऐसे जख्म को ढो रही है जिसका इलाज किसी भी मसीहा के पास नहीं है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है यह कड़वा सच सामने आता है कि छोटा बच्चा रीगा, अग्रिन का भाई नहीं बल्कि उसका अपना बेटा है जो सद्दाम के सैनिकों द्वारा किए गए अत्याचार और बलात्कार की एक निशानी है। यह खुलासा फिल्म के माहौल को और भी गमगीन कर देता है। अग्रिन के लिए वह बच्चा उसके अतीत के उस भयानक मंजर की याद दिलाता है जिसे वह भूलना चाहती है। वह उस बच्चे से नफरत नहीं करती लेकिन उसे अपनी लाचारी और जिल्लत का प्रतीक मानती है। यह बोझ इतना भारी है कि एक तेरह-चौदह साल की बच्ची इसे सहन नहीं कर पाती।
फिल्म का शीर्षक ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ यानी कछुए उड़ सकते हैं, प्रतीकात्मक रूप से बहुत गहरा है। कछुआ अपनी धीमी चाल और भारी कवच के लिए जाना जाता है जो उसे जमीन से चिपकाए रखता है। ठीक इसी तरह ये बच्चे अपनी मजबूरियों, अपंगता और गरीबी के बोझ तले दबे हुए हैं। उनके लिए उड़ना यानी आजादी पाना एक असंभव सपना है। लेकिन मौत के आगोश में शायद वे उस बोझ से मुक्त हो जाते हैं। जब अग्रिन अपने बच्चे को पानी में डुबोकर मार देती है, तो वह दृश्य इस बात की गवाही देता है कि कभी-कभी जिंदगी मौत से ज्यादा डरावनी हो जाती है। पानी के भीतर तैरते कछुए और डूबता हुआ बच्चा एक ऐसी बेबसी को बयां करते हैं जिसे शब्दों में बांधना मुमकिन नहीं है। बहमन घोबादी ने पेशेवर कलाकारों के बजाय असली शरणार्थी बच्चों को लेकर यह फिल्म बनाई है और यही वजह है कि उनकी आंखों का डर और उनके चेहरों की झुर्रियां बनावटी नहीं लगतीं। कई बच्चों के शरीर पर मौजूद घाव और कटी हुई टांगें किसी मेकअप का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे उस असलियत का हिस्सा हैं जिसे वे हर रोज जीते हैं।
तकनीकी रूप से भी फिल्म बहुत ही सधे हुए अंदाज में आगे बढ़ती है। कैमरा अक्सर जमीन के करीब रहता है ताकि हम उन बच्चों के नजरिए से दुनिया को देख सकें। छोटे कद के बच्चों के लिए दुनिया कितनी विशाल और डरावनी हो सकती है, यह कैमरे के एंगल से बखूबी समझ आता है। फिल्म की भाषा बहुत सरल है, लेकिन वह रूह तक उतर जाती है। इसमें बड़े-बड़े संवाद नहीं हैं बल्कि छोटी-छोटी बातें और इशारे बहुत कुछ कह जाते हैं। जब सैटेलाइट जैसा लड़का जो अमेरिका का गुणगान करते नहीं थकता था, अंत में लहूलुहान होकर बैसाखियों के सहारे चलता है और गुजरती हुई अमेरिकी सेना की गाड़ियों से अपना मुंह फेर लेता है, तो वह पल उस पूरे भ्रम के टूटने का प्रतीक है। वह समझ जाता है कि जिन लोगों को वह अपना हमदर्द समझ रहा था, उनके लिए ये बच्चे सिर्फ एक संख्या भर हैं। अमेरिकी सैनिक पर्चे गिराकर चले जाते हैं, वे अपनी जीत का जश्न मनाते हैं लेकिन उन बच्चों के हिस्से में वही पुराना अंधेरा और वही खतरनाक बारूदी सुरंगें रह जाती हैं। इराक की पथरीली जमीन पर बिखरे हुए ये बच्चे पूरी मानवता से सवाल पूछते नजर आते हैं।
यह फिल्म पश्चिमी समाज और दुनिया के उन हिस्सों के लिए एक आईना है जो युद्ध को न्यूज़ चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ या किसी वीडियो गेम की तरह देखते हैं। हम ड्राइंग रूम में बैठकर हिंसा पर चर्चा करते हैं लेकिन ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ हमें यह महसूस कराती है कि युद्ध का असली मतलब किसी का घर उजड़ना, किसी की अस्मत लुटना और किसी बच्चे का हाथ कट जाना होता है। यह फिल्म राजनीति के उन स्याह पन्नों को उधेड़ती है जहां मासूम बच्चों का बचपन सत्ता के संघर्ष में आहुति दे दिया जाता है। कुर्दों की बेबसी जिनका अपना कोई देश नहीं है और जिन्हें हर तरफ से सिर्फ नफरत और गोलियां मिली हैं, फिल्म में बड़ी संजीदगी से दिखाई गई है। सैटेलाइट और हेंगोव के बीच का द्वंद्व भी गौर करने लायक है। एक तरफ तकनीक और बाहरी दुनिया से जुड़ने की चाहत है और दूसरी तरफ अंतर्ज्ञान और कड़वे अनुभवों से उपजी खामोशी है। निर्देशक ने बहुत ही खूबसूरती से यह दिखाया है कि कैसे एक अपाहिज बच्चा भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए किस हद तक जा सकता है।
फिल्म के अंत में जो सन्नाटा बचता है वह रूह को झकझोर कर रख देता है। यह फिल्म सवाल पूछती है कि क्या कोई भी जीत इतनी बड़ी हो सकती है कि उसके लिए हजारों बच्चों की मुस्कुराहट छीन ली जाए? क्या लोकतंत्र और आजादी के नाम पर किसी मुल्क को मलबे के ढेर में बदल देना जायज है? ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ का हर फ्रेम एक चीख है जो अनसुनी रह जाती है। यह फिल्म हमें यह सिखाती है कि इंसानियत की सबसे बड़ी हार युद्ध के मैदान में नहीं बल्कि उन बच्चों की आंखों में होती है जिन्होंने सपने देखना छोड़ दिया है। इस फिल्म को देखते हुए आप सिर्फ रोते नहीं हैं बल्कि आप एक अजीब सी लाचारी महसूस करते हैं कि कैसे दुनिया की सबसे बड़ी ताकतें छोटे से स्वार्थ के लिए मासूमों का लहू बहा देती हैं। बहमन घोबादी ने इस फिल्म के जरिए दुनिया को एक ऐसा सच दिखाया है जिसे शायद ही कोई भूल पाए। यह एक ऐसी कलाकृति है जो समय की सीमाओं को लांघकर हमेशा हमें यह याद दिलाती रहेगी कि युद्ध कभी कोई समाधान नहीं होता, वह सिर्फ और सिर्फ तबाही और कभी न भरने वाले घाव देता है।
फिल्म में जब सैटेलाइट रीगा को बचाने के लिए बारूदी सुरंग वाले खेत में भागता है, तो वह दृश्य सांसें रोक देने वाला है। वहां न कोई संगीत है, न कोई फिल्मी ड्रामा, बस एक बच्चे की जान बचाने की जद्दोजहद है। वह लड़का जो खुद को बहुत होशियार समझता था, उस पल में अपनी जान की बाजी लगा देता है। यह फिल्म हमें यह भी दिखाती है कि इन बच्चों के बीच आपसी प्रेम और भाईचारा कितना गहरा है। उनके पास कुछ नहीं है, फिर भी वे एक-दूसरे का सहारा बनते हैं। अग्रिन का किरदार पूरे सिनेमा इतिहास के सबसे दुखद किरदारों में से एक है। उसकी उदासी संक्रामक है जो फिल्म खत्म होने के कई दिनों बाद तक आपके साथ रहती है। उसकी आत्महत्या सिर्फ एक जान का जाना नहीं है, बल्कि उम्मीद की हत्या है। जब वह पहाड़ की चोटी से कूदती है, तो ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया की मासूमियत ने हार मान ली हो।
यह फिल्म उन लोगों की दास्तान है जिन्हें इतिहास के पन्नों में हाशिए पर धकेल दिया गया है। पसमांदा और मजलूम समाज की तकलीफें भी कुछ ऐसी ही होती हैं जहां उनकी पहचान और उनके वजूद की लड़ाई सदियों से चली आ रही है। यह फिल्म सिखाती है कि दर्द का कोई मजहब नहीं होता और न ही उसकी कोई सरहद होती है। युद्ध में मरने वाला बच्चा सिर्फ एक बच्चा होता है, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने का हो। ‘टर्टल्स कैन फ्लाई’ का अनुभव करने के बाद युद्ध के प्रति आपका नजरिया हमेशा के लिए बदल जाता है और आप उन बेनाम बच्चों के लिए दुआ करने लगते हैं जो आज भी दुनिया के किसी न किसी कोने में अपनी कटी हुई टांगों के साथ एक नए सवेरे का इंतजार कर रहे हैं। यह फिल्म एक कड़वा घूंट है जिसे पीना हर उस इंसान के लिए जरूरी है जो खुद को संवेदनशील मानता है। यह फिल्म हमें एक गहरे अंधेरे में छोड़कर जाती है, लेकिन उस अंधेरे में भी यह उम्मीद की एक छोटी सी लौ जलाए रखती है कि शायद किसी दिन कछुए सच में उड़ सकेंगे और इन बच्चों को अपनी जमीन पर बिना किसी डर के चलने का हक मिलेगा।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।