Tag: SocialJustice
वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधि...
Posted by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल...
Posted by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
भारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद ...
Posted by Arif Aziz | Jan 24, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धा...
Posted by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
वंदे मातरम विरोध: पसमांदा को मुख्यधारा से काटने की...
Posted by Arif Aziz | Dec 18, 2025 | Culture and Heritage, Political | 0 |
समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद
by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।
मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।
Read Moreवैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार
by Arif Aziz | Feb 14, 2026 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।
Read Moreओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल
by Arif Aziz | Feb 2, 2026 | Pasmanda Caste, Political | 0 |
ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।
Read Moreभारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद का दस्तावेज
by Arif Aziz | Jan 24, 2026 | Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
26 जनवरी वह दिन है जब भारत ने संविधान के ज़रिये बराबरी, आज़ादी और न्याय पर आधारित नया सामाजिक समझौता अपनाया। संविधान ने सत्ता को जनता के अधीन किया, बहुमत और सरकार पर कानून की लगाम लगाई और जाति-धर्म आधारित अन्याय तोड़ा। इसी ने पसमांदा समाज को नागरिक अधिकार, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और न्यायिक सुरक्षा दी। संविधान से ही पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से भारत मज़बूत।
Read Moreबांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार: इस्लामी सिद्धांतों की एक परीक्षा
by Arif Aziz | Dec 21, 2025 | Political, Social Justice and Activism | 0 |
लेखक – डॉ. उज़्मा खातून (नोट: यह लेख मूलतः अंग्रेजी में “Hindu Persecution in Bangladesh:...
Read Moreवंदे मातरम विरोध: पसमांदा को मुख्यधारा से काटने की साजिश
by Arif Aziz | Dec 18, 2025 | Culture and Heritage, Political | 0 |
लेख में वंदे मातरम विवाद को धर्म या राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि अशराफ़ नेतृत्व की भावनात्मक और डर-आधारित राजनीति बताया गया है। लेखक के अनुसार यह विवाद पसमांदा मुसलमानों के असली मुद्दों—शिक्षा, रोज़गार और हिस्सेदारी—से ध्यान भटकाने का साधन है। इतिहास में 1937 के समझौते से यह प्रश्न सुलझ चुका था, फिर भी इसे बार-बार उछाला जाता है। अशराफ़ वर्ग अपनी सत्ता बचाने के लिए अलगाव को बढ़ावा देता है, जबकि पसमांदा समाज का असली संघर्ष गरीबी, जहालत और राजनीतिक शोषण के खिलाफ होना चाहिए।
Read Moreडी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका
by Arif Aziz | Dec 5, 2025 | Education and Empowerment, Social Justice and Activism | 0 |
यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।
Read Moreबिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक
by Arif Aziz | Nov 12, 2025 | Casteism, Pasmanda Caste, Political, Social Justice and Activism | 0 |
**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।
अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ
by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।
Read Moreमक्का चार्टर: इस्लाम की असली सोच की ओर वापसी
by Arif Aziz | Oct 22, 2025 | Culture and Heritage, Political, Social Justice and Activism | 0 |
मक्का चार्टर (2019) इस्लाम के मूल पैगाम—शांति, बराबरी और सह-अस्तित्व—की पुनःस्थापना है, न कि कोई नया सुधार। यह पैगंबर मुहम्मद के मदीना संविधान से प्रेरित है, जिसने विभिन्न धर्मों और कबीलों को ‘उम्मा’ के रूप में एकजुट किया। 139 देशों के 1200 से अधिक विद्वानों द्वारा स्वीकृत इस चार्टर ने धार्मिक स्वतंत्रता, समान नागरिकता, अतिवाद का विरोध, महिलाओं और युवाओं के सशक्तीकरण, और पर्यावरण की रक्षा पर ज़ोर दिया। यह कुरान व इस्लामी शिक्षाओं पर आधारित एक नैतिक संविधान है जो मुस्लिम दुनिया को एकजुट कर मानवाधिकार, न्याय और दया के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रस्तुत करता है।
Read Moreआधुनिक शिक्षा के नाम पर भेदभाव? सर सैयद पर बड़ा सवाल!
by Arif Aziz | Oct 20, 2025 | Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
अब्दुल्ला मंसूर ज्यादातर हम समझते हैं कि मौलवी या उलेमा ही धार्मिक उपदेश के जरिए मतिभ्रम फैलाते...
Read Moreकौन थे श्री नियामतुल्लाह अंसारी और क्या था रज़ालत टैक्स?
by Arif Aziz | Sep 30, 2025 | Biography, Culture and Heritage, Education and Empowerment, Pasmanda Caste, Social Justice and Activism | 0 |
श्री नियामतुल्लाह अंसारी (1903–1970) स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक न्याय के योद्धा थे। गोरखपुर में जन्मे, उन्होंने गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़कर आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाई। वे कांग्रेस और मोमिन कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मुस्लिम लीग की विभाजनकारी राजनीति का विरोध करते रहे। उनका सबसे बड़ा योगदान “रज़ालत टैक्स” के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई थी, जो पसमांदा मुसलमानों पर थोपे गए अपमानजनक कर का अंत कर गई। 1939 में अदालत ने उनके पक्ष में ऐतिहासिक फ़ैसला दिया। अंसारी ने दबे-कुचले समाज को सम्मान दिलाया और समानता की मशाल जलाकर सामाजिक क्रांति की राह प्रशस्त की।
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