Tag: SocialJustice

सामाजिक  अस्पृश्यता और बहिष्करण से लड़ती मुस्लिम हलालखोर जाति

‘हलालखोर’ यानी हलाल का खाने वाला, यह सिर्फ एक अलंकार नहीं है बल्कि मुस्लिम समाज में मौजूद एक जाति का नाम है। जिनका पेशा नालों, सड़कों की सफाई करना, मल-मूत्र की सफाई करना, बाजा बजाना, और सूप बनाना है। हलालखोर जाति के अधिकतर व्यक्ति मुस्लिम समाज के सुन्नी संप्रदाय के मानने वाले हैं। यह लोग अपनी मेहनत द्वारा कमाई गई रोटी के कारण हलालखोर कहलाए होंगे। वहीं, कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद जब इस जाति ने सूअर का गोश्त खाना छोड़ दिया तो इस जाति को हलालखोर के नाम से जाना जाने लगा।

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लोकसभा चुनाव 2024 का सबसे चर्चित मुद्दा मुस्लिम आरक्षण: तथ्य और मिथ्य

लोकसभा 2024 के चुनाव ने इस बार बहुचर्चित मुद्दा मुस्लिम आरक्षण था। कोई सारे मुसलमानों को आरक्षण देने की बात कर रहा था तो कोई सारे मुसलमानों के आरक्षण को खत्म करने की बात कर रहा था। मुस्लिम आरक्षण सदैव से एक अबूझ पहेली रही है। समाज से लेकर न्यायालायों तक में इस पर बहसें होती रहीं हैं।
सबसे पहले यह तथ्य समझ लेना चाहिए कि EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर) आरक्षण लागू होने के बाद ऐसा कोई मुस्लिम तबका नहीं है जो आरक्षण की परिधि से बाहर हो अर्थात लगभग सारे मुसलमान पहले से ही आरक्षण का लाभ लें रहें हैं। विदित रहे कि मज़हबी पहचान के नाम पर आरक्षण संविधान के मूल भावना के विरुद्ध है कोई भी मज़हब पिछड़ा या दलित नहीं होता है बल्कि उसके मानने वालो में गरीब, पिछड़े और दलित हो सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए आरक्षण की EWS, ओबीसी और एसटी कैटेगरी में अन्य धर्मों के मानने वालों के साथ-साथ सारे मुसलमानों को भी समाहित किया गया।

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लापता हमारी कहानियाँ

किरण राव द्वारा निर्देशित “लापता लेडीज़” महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण भारत में महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले असंख्य सामाजिक मुद्दों के विषयों पर आधारित है। फिल्म की कहानी दो युवा दुल्हनों के इर्द-गिर्द घूमती है जो ट्रेन यात्रा के दौरान रहस्यमय तरीके से गायब हो जाती हैं, जिससे घटनाओं की एक श्रृंखला शुरू होती है जो महिलाओं के दैनिक जीवन में आने वाली जटिलताओं और चुनौतियों को उजागर करती है। लापता दुल्हनों की खोज के माध्यम से, कहानी ग्रामीण समाज की जटिल गतिशीलता को उजागर करती है, महिलाओं की लचीलापन और ताकत को उजागर करती है क्योंकि वे विभिन्न सामाजिक दबावों और बाधाओं से गुजरती हैं। यह मार्मिक अन्वेषण पारंपरिक रूप से पितृसत्तात्मक सेटिंग्स में लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए चल रहे संघर्ष पर प्रकाश डालता है।

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ज़ातत-पात (जातिवाद) की जड़ें

मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) पिछड़ी बिरादरियों को शिक्षा का अधिकार दिए जाने कि बात दूर की है. धार्मिक दृष्टिकोण से सभी मुसलमानों को बराबर नहीं समझा गया. इस का एक उदाहरण मौलाना अशरफ़ अली थानवी (र०अ०) की किताब ‘अशरफ़-उल-जवाब’ में मिलता है. उस के अन्दर है कि-

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डॉक्टर अंबेडकर नहीं बल्कि कुछ बहुजन बुद्धिजीवी दलित मुस्लिमों के आरक्षण के खिलाफ हैं

यदि संविधान कहता है कि अगर संविधान के हिसाब से सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता, तो सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण से बाहर भी नहीं किया जा सकता। लेकिन 1950 का राष्ट्रपति आदेश बिल्कुल यही करता है, जिसमें दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को केवल उनके धर्म के कारण एससी श्रेणी से बाहर रखा गया है। यह उनके मूल अधिकारों, विशेष रूप से अनुच्छेद 14 (समानता), बल्कि अनुच्छेद 15 (कोई भेदभाव नहीं), 16 (नौकरियों में कोई भेदभाव नहीं), और 25 (विवेक की स्वतंत्रता) के भी खिलाफ है।

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पसमांदा आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास

बहुत सालों बाद बाबा कबीर की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए  मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी (1890-1953) ने बाजाब्ता सांगठनिक रूप में एकअंतरराष्ट्रीय संगठन (जमीयतुल मोमिनीन/ मोमिन कांफ्रेंस) की स्थापना किया जो भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका और वर्मा तक फैला हुआ था।

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पसमांदा : कल, आज और कल

सामाजिक बराबरी के लिए आज़ाद भारत में जो भी नीतियाँ बनी हैं, उनका लाभ बहुत कम तबकों को मिल सका है। उसका कारण ज़रूरतमंद लोगों के सही आंकड़ों का उपलब्ध ना होना भी है। इस्लाम को मानने वाले समाज में यह आंकड़े इसलिए नहीं जुट सके कि वहां व्यावहारिक और  सैद्धांतिक बातों में अंतर है। इस आलेख में इसी की पड़ताल करने का प्रयास है। आमतौर पर यही माना जाता है कि इस्लाम बराबरी और समानता का धर्म है जहां कोई ऊंच-नीच नहीं है। पर ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।

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पसमांदा आंदोलन के जनक आसिम बिहारी

आसिम बिहारी का जन्म शिक्षा और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से लगे खासगंज, बिहार शरीफ के एक देशभक्त परिवार में हुआ था. उनके दादा मौलाना अब्दुर्रहमान ने 1857 की क्रांति के झंडे को बुलंद किया था. आसिम बिहारी का असल नाम अली हुसैन था.
आसिम बिहारी के संघर्ष और सक्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वो पैदा बिहार के नालंदा में हुए, आंदोलन की शुरुआत कोलकाता से की और उनकी मृत्यु उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुई.

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मुस्लिम आरक्षण का आधा-अधूरा सच

कुछ बहुजन सोशल मीडिया दलालों द्वारा एक और अर्ध-सत्य फैलाया जा रहा है, इन मीडिया दलालों की हाल ही में हिंदू राइट के प्रति सहानुभूति है, वह कह रहे हैं कि मुस्लिम पहले से ही चार प्रकार की आरक्षण सुविधा प्राप्त कर रहे हैं – OBC वर्ग में पिछड़े मुस्लिम, ST वर्ग में आदिवासी मुस्लिम, EWS वर्ग में ऊपरी जाति (अशराफ़) मुस्लिम, और सरकार द्वारा अनुदानित मुस्लिम अल्पसंख्यक संस्थानों – और इसलिए दलित मुस्लिम (या ईसाई) को एससी वर्ग में शामिल करना गलत है।

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सांप्रदायिकता किसी भी क्षेत्र की हो उसका विरोध करना चाहिए : विभूति नारायण राय

अशराफ दलित हिन्दुओं के साथ उसी तरह व्यवहार करता है जिस तरह सवर्ण हिंदू करता है
अशराफ, पसमांदा आंदोलन को इग्नोर कर रहा है और उसे हिन्दू प्रोग्रेसिव लोगो का समर्थन मिल रहा है

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पुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास

मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।

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