Tag: SocialJustice

पसमांदा समाज: संघर्ष से सम्मान और विकास की नई राह

पसमांदा समाज, जो लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा, आज राष्ट्रीय विमर्श में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। यह बदलाव केवल राजनीतिक स्वीकार्यता का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और निरंतर संघर्ष की देन है। अब यह समाज शिक्षा, रोजगार और अधिकारों के प्रति सजग होकर विकास की नई दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

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शब्बीर अहमद अंसारी: पसमांदा चेतना के अग्रदूत

शब्बीर अहमद अंसारी का जीवन संघर्ष, संवैधानिक चेतना और सामाजिक न्याय की एक प्रेरक कथा है। साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद जातीय असमानताओं को पहचानते हुए चार दशकों तक पसमांदा वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनका निधन केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं, बल्कि एक वैचारिक शून्य है, जिसे भरना आसान नहीं होगा। उनकी विरासत वंचितों के आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई में सदैव जीवित रहेगी।

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पमरिया: साझा संस्कृति का बोझ और पसमांदा पहचान का बहुजन विमर्श

डा० अयुब राईन की पुस्तक ‘पमरिया’ भारतीय लोक-संस्कृति के उस अनदेखे पक्ष को सामने लाती है, जहाँ मजहबी सीमाओं से परे साझा विरासत जीवित है। पमरिया समुदाय इस सांस्कृतिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है।

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समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद

पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।

मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।

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वैलेंटाइन डे: परंपराओं की बेड़ियां और चुनाव का अधिकार

लेखक अब्दुल्लाह मंसूर वैलेंटाइन डे को बाजारवाद नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के प्रतीक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार प्रेम भारतीय समाज की कठोर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को चुनौती देता है। ऑनर किलिंग और जबरन विवाह जैसी कुप्रथाओं के बीच प्रेम ‘राइट टू चॉइस’ का उत्सव है। अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाह सामाजिक क्रांति के कदम हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने भी माना। प्रेम स्वतंत्रता, समानता और सामाजिक न्याय की चेतना जगाता है।

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ओवैसी का उभार, पहचान की राजनीति और पसमांदा सवाल

ओवैसी और एआईएमआईएम का उभार मुस्लिम समाज की असुरक्षा, निराशा और सेक्युलर दलों की विफलताओं से पैदा हुआ है। वे प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन उनकी पहचान-आधारित राजनीति धार्मिक ध्रुवीकरण को भी मज़बूत करती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान पसमांदा मुसलमानों को होता है, जिनके जाति, शिक्षा और रोज़गार जैसे मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। लेख पसमांदा आंदोलन को सामाजिक न्याय और समावेशी राष्ट्रवाद का विकल्प मानता है।

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भारतीय संविधान: पसमांदा समाज की ढाल और हमारे वजूद का दस्तावेज

26 जनवरी वह दिन है जब भारत ने संविधान के ज़रिये बराबरी, आज़ादी और न्याय पर आधारित नया सामाजिक समझौता अपनाया। संविधान ने सत्ता को जनता के अधीन किया, बहुमत और सरकार पर कानून की लगाम लगाई और जाति-धर्म आधारित अन्याय तोड़ा। इसी ने पसमांदा समाज को नागरिक अधिकार, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और न्यायिक सुरक्षा दी। संविधान से ही पसमांदा सुरक्षित है, और पसमांदा की सुरक्षा से भारत मज़बूत।

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वंदे मातरम विरोध: पसमांदा को मुख्यधारा से काटने की साजिश

लेख में वंदे मातरम विवाद को धर्म या राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि अशराफ़ नेतृत्व की भावनात्मक और डर-आधारित राजनीति बताया गया है। लेखक के अनुसार यह विवाद पसमांदा मुसलमानों के असली मुद्दों—शिक्षा, रोज़गार और हिस्सेदारी—से ध्यान भटकाने का साधन है। इतिहास में 1937 के समझौते से यह प्रश्न सुलझ चुका था, फिर भी इसे बार-बार उछाला जाता है। अशराफ़ वर्ग अपनी सत्ता बचाने के लिए अलगाव को बढ़ावा देता है, जबकि पसमांदा समाज का असली संघर्ष गरीबी, जहालत और राजनीतिक शोषण के खिलाफ होना चाहिए।

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डी-रेडिकलाइजेशन और शिक्षा सुधार में मदरसा शिक्षकों की निर्णायक भूमिका

यह लेख बताता है कि आधुनिक दौर में कट्टरपंथ और हिंसक उग्रवाद गंभीर सुरक्षा चुनौतियाँ हैं, पर अक्सर मदरसों को गलत रूप से इसका मुख्य कारण मान लिया जाता है। वास्तविकता यह है कि मदरसा शिक्षक समस्या का हिस्सा होते हुए भी समाधान की सबसे मजबूत कड़ी बन सकते हैं। वे छात्रों में आलोचनात्मक चिंतन, सार्वभौमिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर कट्टरपंथी विचारों को तोड़ सकते हैं। विकृत धर्मशास्त्र, पहचान संकट और राजनीतिक इस्लाम जैसी समस्याओं का मुकाबला करने में शिक्षक एक पुल की तरह काम करते हैं। उचित प्रशिक्षण, सम्मान और पाठ्यक्रम सुधार से वे समाज के सशक्त रक्षक बन सकते हैं।

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बिहार 2025: ‘मुस्लिम’ राजनीति से ‘पसमांदा’ दावेदारी तक

**सारांश (100 शब्दों में):**
अब्दुल्लाह मंसूर लिखते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में पसमांदा समाज अब मात्र ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का ‘गेम चेंजर’ बन चुका है। इस आंदोलन की जड़ें आज़ादी से पहले मोमिन कॉन्फ्रेंस और अब्दुल कय्यूम अंसारी के राष्ट्रवादी संघर्ष में हैं। आज पसमांदा राजनीति रोजगार, शिक्षा और सम्मान की हिस्सेदारी पर केंद्रित है। मंडल युग से उभरी यह चेतना अब भाजपा, जदयू और महागठबंधन सभी को प्रभावित कर रही है। बिहार के 72% मुस्लिम पसमांदा हैं और उनकी नई पीढ़ी अशराफ वर्चस्व को चुनौती देते हुए सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की राजनीति का नया अध्याय लिख रही है।

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अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ

सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।

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