लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर
कुछ साल पहले मेरी जिंदगी में एक ऐसा दौर आया था जब मुझे लगता था कि मेरे साथ ही सब गलत क्यों होता है। करियर में लगातार असफलताएं मिल रही थीं, महीनों की लगन और मेहनत का कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ रहा था, और ठीक उसी नाजुक दौर में कुछ बेहद अहम और करीबी रिश्ते भी एक-एक करके खत्म हो गए। करियर के मोर्चे पर मुश्किलें तब और बढ़ गईं जब कोचिंग शुरू करने के तुरंत बाद एक बड़ा झटका लगा। हमने प्रचार के लिए ओखला में मेट्रो पिलर पर पोस्टर लगाए थे, जिस पर पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुँचाने (Defacement of Property) के तहत केस दर्ज हो गया। यह मामला साकेत कोर्ट चला गया और पूरा एक साल अदालतों के चक्कर काटने में निकल गया। इस कानूनी उलझन और मानसिक तनाव के बीच मेरी कोचिंग बंद हो गई, लेकिन केस फिर भी चलता रहा। उस वक्त कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हुए मुझे लगता था कि पूरी व्यवस्था ही मेरे खिलाफ खड़ी है।
उस वक्त मेरा दिमाग बहुत स्वाभाविक तरीके से एक ही सोच पर जाकर टिक जाता था कि मेरी तो किस्मत ही खराब है, लोग सिर्फ अपने मतलब के लिए साथ रहते हैं, और मैं चाहे कितनी भी कोशिश कर लूं, मेरी जिंदगी में कुछ भी बदलने वाला नहीं है। मुझे लगता था कि मुझसे बहुत औसत साथियों का भी सिलेक्शन हो रहा है, बस मेरा ही नहीं हो पा रहा। जब आप इस दौर से गुजर रहे होते हैं, तो आपको लगता है कि आपकी यह नकारात्मक सोच बिल्कुल सच और तार्किक है। इसे साइकोलॉजी की भाषा में ‘विक्टिम मेंटैलिटी’ कहा जाता है। लेकिन ईमानदारी से कहूं तो उस वक्त यह कोई किताबी या तकनीकी शब्द नहीं लगता, यह सिर्फ एक गहरा मानसिक दर्द, दिन-रात की मानसिक थकान और एक घुटन भरी लाचारी महसूस होती है।
कोई भी इंसान जानबूझकर खुद को बेबस, लाचार या दुखी नहीं बनाना चाहता। जब आपके साथ जिंदगी में एक के बाद एक कड़वे अनुभव होते हैं,चाहे वो करियर का रिजेक्शन हो, किसी भरोसेमंद इंसान का धोखा हो, या बिना किसी गलती के लगातार मिलती असफलता,तो आपका दिमाग पूरी तरह थक जाता है। बार-बार चोट खाने के बाद हमारा दिमाग खुद को और ज्यादा टूटने से बचाने के लिए एक अनचाहा बचाव का रास्ता (defense mechanism) ढूंढ लेता है।
आप खुद को और दूसरों को यह समझाने लगते हैं कि समस्या आपकी तरफ से है ही नहीं, बल्कि बाहर की पूरी दुनिया ही आपके खिलाफ काम कर रही है। इससे एक पल के लिए तो मन को राहत मिलती है क्योंकि आपको लगता है कि इस नाकामी में आपकी कोई गलती नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे यही सोच आपको अंदर से पंगु बना देती है और आप अपनी स्थिति को सुधारने का प्रयास करना ही पूरी तरह बंद कर देते हैं।
यहाँ एक बात बहुत साफ और स्पष्ट होनी चाहिए कि आपके साथ वास्तव में कोई अन्याय होना और हर वक्त ‘विक्टिम मोड’ में बने रहना,इन दोनों बातों में बहुत बड़ा फर्क होता है। अगर आपके साथ कुछ गलत हुआ है, किसी ने आपका भरोसा तोड़ा है, आपका दिल दुखाया है या करियर में आपके साथ कोई धोखा हुआ है, तो आपका गुस्सा होना, निराश होना और दुखी होना बिल्कुल स्वाभाविक और सही है। आपको उस दुख को महसूस करने, अपनी चोट पर रोने और अपनी भावनाएं बाहर निकालने का पूरा हक है। असली तकलीफ और मानसिक फंसाव तब शुरू होता है जब आप उस एक घटना, उस एक इंसान या उस पूरे बुरे दौर को अपनी पूरी जिंदगी का एकमात्र सच मान लेते हैं। जब आप यह सोचने लगते हैं कि “अब मेरे साथ कभी कुछ अच्छा हो ही नहीं सकता” और आप उसी पुरानी चोट को अपनी स्थाई पहचान बना लेते हैं।
मुझे इस बात का अहसास पहली बार तब हुआ जब एक दिन मैं अपने एक बहुत पुराने दोस्त के सामने हमेशा की तरह अपनी किस्मत, मुश्किल परिस्थितियों और मतलबी लोगों का रोना रो रहा था। मेरी पूरी बात बहुत धैर्य से सुनने के बाद उसने बिना किसी कड़वाहट के बहुत शांति से मुझसे एक सवाल पूछा। उसने कहा कि जो तुम्हारे साथ हुआ, मैं मानता हूँ कि वो वाकई बहुत बुरा था और तुम्हारा दुखी होना बिल्कुल जायज है, लेकिन अब तुम दिन-रात सिर्फ अपने आप को और अपनी किस्मत को कोसते रहो, तो इससे क्या हासिल होगा? क्या तुम्हारे पास यहाँ से आगे बढ़ने का कोई व्यावहारिक प्लान है? उस सीधे और सादे सवाल ने मुझे अंदर तक सोचने पर मजबूर कर दिया। मुझे पहली बार यह समझ आया कि जो बातें बीत चुकी हैं और जिन्हें बदला नहीं जा सकता, उन्हें बार-बार याद करने और उनका अफसोस जताने में मेरी इतनी ऊर्जा खर्च हो रही थी कि मेरे पास आज के दिन को बेहतर बनाने के लिए कुछ बच ही नहीं रहा था। मैंने अनजाने में अपनी जिंदगी की खुशी और मानसिक शांति की चाबी उन्हीं लोगों और हालात के हाथ में दे दी थी, जिन्होंने मुझे चोट पहुंचाई थी।
इस मानसिक दलदल से निकलने में जिस सबसे ताकतवर चीज ने मेरी मदद की, वह थी ‘शुक्रगुजारी’ यानी ‘ग्रेटिट्यूड’ (Gratitude) का अहसास। जब मैं गहरी निराशा और बेचारगी में डूब रहा था, तब मैंने एक दिन रुककर यह देखना शुरू किया कि मेरी तमाम मुश्किलों के बावजूद वह कौन-कौन सी चीजें हैं जो आज भी मेरे पास मौजूद हैं और जिनके लिए मुझे शुक्रगुजार होना चाहिए। मैंने गौर किया कि मैं देश की राजधानी दिल्ली में रहकर पिछले 12 सालों से अपनी पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूँ। जब मैंने इस बात को गहराई से सोचा कि भारत की कुल आबादी में से कितने प्रतिशत लोग हैं जिन्हें दिल्ली जैसे शहर में रहकर पढ़ाई और विचार-मंथन करने का अवसर मिलता है, और उसमें से भी मुस्लिम समुदाय के कितने लोग इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं, तो मेरे सामने आए आंकड़े बहुत चौंकाने वाले थे। मुझे तुरंत अहसास हुआ कि जिन चीजों को मैं बहुत आम मानकर अनदेखा कर रहा था, वे वास्तव में किसी विशेषाधिकार (privilege)से कम नहीं थीं।
इस सोच ने मेरे भीतर एक गहरा टर्निंग पॉइंट पैदा किया और मुझे कुरान की वह मशहूर आयत याद आई— “فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ “फ़बि-अय्यि आलाइ रब्बिकुमा तुकज़्ज़िबान”तो तुम अपने रब की कौन-कौन सी नेमतों को झुठलाओगे?)। यह बात हमें याद दिलाती है कि हमारी जिंदगी में परेशानियों के शोर के बीच भी अनगिनत नेमतें और खूबसूरत चीजें मौजूद होती हैं।
जब मैंने अपनी ब्लेसिंग्स को गिनना शुरू किया, तो मेरा ध्यान सिर्फ अपनी कमियों और असफलताओं पर अटकने के बजाय उन चीजों की तरफ गया जो मेरे पास पहले से थीं। ग्रेटिट्यूड की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह हमारा ध्यान शिकायतों से हटाकर उनके व्यावहारिक हल की तरफ मोड़ देता है। जब आप अपनी कड़वाहट छोड़कर शुक्रगुजार होना सीखते हैं, तो आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। जब हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी नेमतों के लिए शुक्र अदा करते हैं चाहे वह एक कप गर्म चाय की खुशबू हो, किसी बच्चों की हंसी हो, या शाम का कोई शांत नजारा तो दिल का बोझ हल्का होने लगता है और हम आज के पल में जीना सीख जाते हैं।
अगर आप भी आज इसी कड़वे दौर या मानसिक घुटन से गुजर रहे हैं, तो सबसे पहले खुद पर रातों-रात सब कुछ ठीक कर लेने का भारी दबाव मत बनाइए। इस नकारात्मक चक्र से बाहर निकलना कोई एक-दो दिन का काम नहीं है, बल्कि यह बेहद सब्र और नरमी मांगने वाली एक धीमी प्रक्रिया है। इस सफर में पहला और सबसे बड़ा कदम यह स्वीकार करना है कि भले ही आपके अतीत के जख्मों, असफलता या नाइंसाफी के लिए आप जिम्मेदार न हों, लेकिन आज की अपनी स्थिति को बदलने की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ आपकी है। इसके साथ ही आपको खुद से बात करने के तरीके (Self-Talk) और रुमिनेशन यानी दिमाग में पुरानी असफलताओं और दुखों की बार-बार जुगाली करने की आदत पर लगाम लगानी होगी। जब भी आपका दिमाग निराशा में डूबकर कहे कि “अब तो सब खत्म हो गया”, तो तुरंत उस पर यकीन करने के बजाय एक पल रुककर खुद से पूछिए कि “क्या सच में सब खत्म हो गया है या सिर्फ एक रास्ता बंद हुआ है?” मानसिक लाचारी के दौर में बड़े-बड़े लक्ष्य बनाना सिर्फ और ज्यादा निराशा देता है। इसलिए बहुत छोटे और आसान कदमों से शुरुआत करें ठीक वैसे ही जैसे 1000 टुकड़ों के किसी जटिल पज़ल को हल करने से पहले 100 टुकड़ों वाले आसान पज़ल से शुरुआत की जाती है। अपने कमरे की मेज साफ करना, समय पर खाना खाना या लंबे समय से रुके हुए किसी मामूली काम को पूरा कर लेना आपके अवचेतन मन को यह सीधा संदेश देता है कि आपकी जिंदगी का कुछ हिस्सा आज भी आपके अपने कंट्रोल में है। यही छोटी-छोटी दैनिक सफलताएं आपके भीतर खोया हुआ आत्मविश्वास और ‘जीतने की आदत’ धीरे-धीरे वापस लाती हैं।

अतीत के नुकसानों, गलतियों और कड़वे अनुभवों को दिल से लगाकर बैठे रहने से सामने वाले का कुछ नहीं बिगड़ता, बल्कि सिर्फ आपका आज और आने वाला कल बर्बाद होता है। इसलिए अपने पुराने जख्मों को बंद (closure) करने के लिए दूसरों को और खुद को माफ करके ‘रीसेट बटन’ दबाना सीखें। माफ़ी देने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि सामने वाले ने आपके साथ जो किया वो सही था, बल्कि माफ़ी का असली मतलब यह है कि अब आप उस पुरानी कड़वी बात को अपने आज के सुकून पर हावी नहीं होने देंगे। इसके साथ ही, अपने आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ‘ना’ कहना सीखें और आपको नीचा दिखाने वाले या लगातार आलोचना करने वाले लोगों से बहुत स्पष्ट मानसिक व भावनात्मक दूरी (emotional distance) तय करें क्योंकि आपकी अपनी अनुमति के बिना कोई भी इंसान आपको छोटा या बेबस महसूस नहीं करा सकता। अपनी तकलीफों और अकेलेपन के चक्र से ध्यान हटाने का एक और बेहद असरदार जरिया है दूसरों की निःस्वार्थ मदद करना (Giving to Others)। विक्टिम माइंडसेट इंसान को अत्यधिक ‘ज़रूरतमंद’ और आत्मकेंद्रित बना देता है, लेकिन जब आप किसी दूसरे के काम आते हैं, तो आप खुद को समर्थ, उपयोगी और आत्मनिर्भर महसूस करने लगते हैं। यह सच है कि जिंदगी हमेशा फेयर या निष्पक्ष नहीं होती, कई बार जी तोड़ मेहनत के बाद भी नतीजे नहीं मिलते; लेकिन चुनौतियों को ‘मुसीबत’ मानकर हार मानने के बजाय उन्हें ‘सीखने और खुद को मजबूत बनाने का अवसर’ (Growth & Resilience) मानें। अगर आप इस सोच के जाल से अकेले नहीं निकल पा रहे हैं, तो किसी समझदार दोस्त, मेंटॉर या पेशेवर थेरेपिस्ट से मदद मांगना किसी भी तरह की कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी की कमान वापस अपने हाथों में लेने की दिशा में उठाया गया एक बेहद परिपक्व कदम है।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।