लेखक-अब्दुल्लाह मंसूर
आधुनिक समाज ने सफलता और कर्मठता की एक बेहद खतरनाक परिभाषा गढ़ ली है, जिसके केंद्र में सबसे पहला प्रहार हमारी प्राकृतिक व्यवस्था, यानी नींद पर होता है। हमारे समाज में सदियों से ‘काकचेष्टा बको ध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्च लक्षणम्॥’ जैसे श्लोकों के जरिए युवाओं के मन में यह बात गहराई से बैठाई जाती रही है कि कुत्ते जैसी अधूरी नींद ही एक अच्छे छात्र की असली निशानी है। इस तरह सोने को सीधे तौर पर आलस, कामचोरी और अकर्मण्यता से जोड़ दिया गया है। जब मैं एक विद्यार्थी के रूप में जीवन के चार-पांच साल परीक्षाओं और भविष्य की तैयारी में लगा रहा था, तब मेरे भीतर भी यही सामाजिक भ्रम काम कर रहा था। मुझे लगता था कि यदि जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना है, तो सुख-चैन को छोड़कर नींद का त्याग करना ही होगा। रात-रात भर जागना, महज चार या पांच घंटे की अधूरी नींद लेना और चाय के सहारे खुद को जबरदस्ती जगाए रखना मेरी दिनचर्या बन चुका था। सालों तक अपनी जैविक घड़ी के साथ की गई इस क्रूरता का जो नतीजा निकला, उसने मेरी पूरी शारीरिक और मानसिक सेहत को हिलाकर रख दिया। मुझे गंभीर एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन और लगातार रहने वाली दिमागी थकान ने घेर लिया, जिससे मुझे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने लगा और एक अजीब सी घबराहट मेरे भीतर हर वक्त मौजूद रहने लगी।
जब यह मानसिक तनाव पूरी तरह बर्दाश्त के बाहर हो गया, तब मैंने डॉक्टर से सलाह ली और उनकी बातों ने जैसे मेरी आँखें खोल दीं। उन्होंने मुझे कोई भारी-भरकम दवा देने के बजाय नींद का असली वैज्ञानिक महत्व समझाया। डॉक्टर की इसी व्यावहारिक सलाह पर मैंने अपनी दिनचर्या में कड़े बदलाव करते हुए रात में चाय पीना बिल्कुल बंद कर दिया और यह तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, हर रात 7 से 8 घंटे की पूरी नींद जरूर लूँगा। बरसों की बिगड़ी आदत को बदलना शुरुआत में बेहद मुश्किल था, लेकिन जैसे-जैसे मेरी नींद का कोटा पूरा होने लगा, मेरी एंग्जायटी के बादल छंटने लगे। मेरे मन का वह ठहराव और सुकून, जो सालों पहले कहीं खो गया था, धीरे-धीरे वापस लौटने लगा और चीजों पर ध्यान लगाने की मेरी क्षमता पहले से कहीं बेहतर हो गई। तब मुझे गहराई से समझ में आया कि मैं जिसे ‘तैयारी की तपस्या’ समझ रहा था, वह दरअसल खुद के ही शरीर और दिमाग के साथ किया जा रहा एक भयानक अत्याचार था। आज एक शिक्षक के रूप में जब मैं सुबह की क्लास में अपने विद्यार्थियों के सुस्त और थके हुए चेहरे देखता हूँ, तो मुझे महसूस होता है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को भी उसी आत्मघाती रास्ते पर धकेल रहे हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में ‘धीमी आत्महत्या’ कहा जाता है।
न्यूरोसाइंटिस्ट मैथ्यू वॉकर की बुक ‘हम क्यों सोते हैं?’ ने मुझ पर बहुत गहरा असर डाला। मैथ्यू वॉकर की शोध और आधुनिक स्लीप साइंस के तथ्य यह साबित करते हैं कि नींद कोई विलासिता नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की सबसे मजबूत नींव है। चिकित्सा विज्ञान और उद्विकास के इतिहास को देखें तो समझ आता है कि प्रकृति ने नींद को एक जादुई दवा के रूप में विकसित किया है, जो हमारे पूरे सिस्टम को हर रात रिसेट करती है। जागते रहना दिमाग के लिए एक लो-लेवल ब्रेन डैमेज की तरह है, और नींद उस नुकसान की मुकम्मल सफाई है। हमारे दिमाग के भीतर एक 24 घंटे की कुदरती घड़ी होती है जिसे ‘सरकेडियन रिदम’ कहते हैं। प्रयोगों से पता चला है कि इंसानों की यह आंतरिक घड़ी ठीक 24 घंटे की नहीं, बल्कि 24 घंटे 15 मिनट की होती है, जिसे रोज सुबह सूरज की रोशनी रिसेट करती है। दिमाग के बीचों-बीच स्थित ‘सुप्राकैशमैटिक न्यूक्लियस’ इस मास्टर क्लॉक को चलाता है और सोने से पहले शरीर के मुख्य तापमान को कम कर देता है। इसके साथ ही, जब हम जागते हैं, तो हमारे दिमाग में ‘एडिनोसिन’ नामक एक रसायन लगातार जमा होता रहता है, जो स्लीप प्रेशर या नींद का दबाव बनाता है। जब हम इस दबाव को रात के समय चाय पीकर दबाने की कोशिश करते हैं, तो हम खुद को धोखा दे रहे होते हैं। चाय में मौजूद कैफीन केवल एडिनोसिन के रिसेप्टर्स को ब्लॉक करके दिमाग को सुस्ती का सिग्नल मिलने से रोकता है। जैसे ही कैफीन का असर खत्म होता है, जमा हुआ सारा एडिनोसिन एक साथ दिमाग पर हमला करता है, जिसे ‘कैफीन क्रैश’ कहते हैं, और यही क्रैश इंसान को भयंकर थकान और मानसिक तनाव के गर्त में धकेल कर एंग्जायटी का रूप ले लेता है।
नींद की कमी का यह प्रहार सिर्फ थकान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिमाग का भावनात्मक हिस्सा, जिसे ‘अमिगडाला’ कहते हैं, वह नींद न मिलने पर 60% तक अधिक सक्रिय और हिंसक हो जाता है। सामान्य स्थिति में हमारा अग्र-मस्तिष्क हमारे गुस्से और भावनाओं पर ब्रेक लगाता है, लेकिन नींद की कमी के कारण यह ब्रेक पूरी तरह फेल हो जाता है, जिससे इंसान का दिमाग आदिम जीवों की तरह व्यवहार करने लगता है और वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। इसके साथ ही, गहरी नींद के दौरान हमारा दिमाग ‘एमिलॉयड’ नामक जहरीले प्रोटीन की सफाई करता है, जो साफ न होने पर दिमाग में जमा होकर अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी भूलने की लाइलाज बीमारियों को जन्म देता है। मानसिक स्वास्थ्य के अलावा, अधूरी नींद हमारे पूरे भौतिक शरीर, अंगों और डीएनए को भीतर से खोखला कर देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब नींद की कमी को एक वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है, क्योंकि रोज छह या सात घंटे से कम सोने से इम्यून सिस्टम इतना कमजोर हो जाता है कि कैंसर होने का खतरा दोगुना हो जाता है। दिल की नसों में रुकावट आना, बीएड प्रेशर बढ़ना और टाइप-2 डायबिटीज सीधे तौर पर खराब नींद से जुड़ी हैं। यहाँ तक कि यह हमारी प्रजनन क्षमता को भी तबाह कर देती है, जहाँ कम सोने वाले पुरुषों का स्पर्म काउंट 29% तक घट जाता है और महिलाओं में इनफर्टिलिटी का खतरा 80% तक बढ़ जाता है।
वास्तव में, प्रकृति ने हमें 24 घंटे में केवल एक बार सोने के लिए नहीं बनाया था। पुराने कबीलों और बिना बिजली के रहने वाले समाजों को देखें, तो वे ‘बाय-फेजिक स्लीप’ यानी द्वि-चरण नींद लेते थे, जिसमें रात में 7-8 घंटे की नींद और दोपहर में 30 से 60 मिनट की छोटी झपकी शामिल थी। दोपहर के खाने के बाद जो आलस आता है, वह सिर्फ भारी भोजन की वजह से नहीं बल्कि हमारे जींस की वजह से होता है। प्राइमेट्स यानी बंदरों की तुलना में इंसान भले ही कम सोता है, लेकिन हम उनसे कहीं ज्यादा सपने यानी आरईएम (REM) नींद लेते हैं। लाखों साल पहले जब इंसान पेड़ों से उतरकर आग के सहारे जमीन पर सुरक्षित सोने लगा, तो गिरने का डर खत्म हो गया और हमें भरपूर आरईएम नींद मिलने लगी। इसी सपनों वाली नींद ने इंसानों के भीतर इमोशनल इंटेलिजेंस और रचनात्मकता को जन्म दिया, जिसने हमें दुनिया का सबसे समझदार जीव बनाया और इसी चरण में दिमाग मांसपेशियों को पूरी तरह लकवाग्रस्त कर देता है ताकि हम सपनों की हरकतों को असलियत में करके खुद को चोट न पहुँचा लें।
एक शिक्षक के तौर पर मेरे लिए सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था और आधुनिक जीवनशैली इस प्राकृतिक चक्र को नष्ट करने पर तुली हुई है। सुबह आठ बजे से पहले स्कूल शुरू करना किशोरों के स्वास्थ्य के साथ एक बहुत बड़ा खिलवाड़ है, क्योंकि स्लीप विज्ञान के अनुसार उनकी आंतरिक जैविक घड़ी वयस्कों की तुलना में दो घंटे आगे खिसक जाती है, जिससे उन्हें रात ग्यारह या बारह बजे से पहले स्वाभाविक रूप से नींद आ ही नहीं सकती। जब हम उन्हें सुबह जबरदस्ती अलार्म की चोंच मारकर उठाते हैं, तो हम उनके दिल को एक गहरा ‘कार्डियोवैस्कुलर शॉक’ देते हैं, जिससे उनका ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ जाता है। इससे भी बदतर है अलार्म बजने पर उसे बार-बार बंद करके सोने की ‘स्नूज़’ आदत, जो दिल को बार-बार यह जानलेवा झटका देती है। सुबह जल्दी उठाकर हम बच्चों से उनकी आरईएम नींद छीन लेते हैं, जो सुबह के समय सबसे ज्यादा आती है और उनके दिमाग के विकास के लिए खाद का काम करती है। इसकी कमी से बच्चों में चिड़चिड़ापन और सुसाइडल टेंडेंसी बढ़ने लगती है, क्योंकि थका हुआ दिमाग एक छलनी की तरह होता है जिसमें ज्ञान नहीं टिकता। अमेरिका में हर घंटे नींद की झपकी या ‘माइक्रोस्लीप’ के कारण घातक एक्सीडेंट होते हैं, जो यह साबित करते हैं कि कम नींद में गाड़ी चलाना शराब पीकर गाड़ी चलाने से भी ज्यादा खतरनाक है।
यदि हमें इस संकट से निकलना है, तो हमें व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यावहारिक बदलाव करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर हमें सोने के लिए कमरे का आदर्श तापमान 19.3 डिग्री सेल्सियस के आसपास रखना चाहिए, क्योंकि शरीर का आंतरिक तापमान कम होने पर ही मेलाटोनिन हार्मोन सही से काम करता है। इसके साथ ही, अलार्म बजने पर उसे बार-बार बंद करके सोने की आदत से बचना होगा। वीकेंड पर ज्यादा सोकर नींद का कर्ज नहीं चुकाया जा सकता, इसलिए रोज सोने और जागने का एक ही तय समय होना चाहिए। सामाजिक और संस्थागत स्तर पर, स्कूलों में ‘नींद के विज्ञान’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए और कंपनियों को अपने कर्मचारियों के लिए उनकी बॉडी क्लॉक के हिसाब से ‘फ्लेक्सिबल शिफ्ट्स’ और ‘स्लीप बोनस’ देना चाहिए। यहाँ तक कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है, क्योंकि अस्पतालों और आईसीयू का शोर एक बार या पब जितना होता है, जबकि नींद एक नेचुरल पेनकिलर है जिसकी कमी से दर्द सहने की क्षमता 42% घट जाती है। नवजात बच्चों के आईसीयू में रात को सिर्फ अंधेरा करने मात्र से बच्चों का वजन 50-60% तेजी से बढ़ता है और वे जल्दी ठीक होकर घर चले जाते हैं।
अब समय आ गया है कि हम अपनी इस अज्ञानता को सुधारें और ‘कम सोने वाले को कर्मठ’ तथा ‘भरपूर सोने वाले को आलसी’ समझने की इस रूढ़िवादी मानसिकता को पूरी तरह खारिज करें। मेरी अपनी जिंदगी का तजुर्बा यह चीख-चीख कर कहता है कि सफलता का रास्ता नींद की बलि देकर नहीं, बल्कि प्रकृति के नियमों के साथ तालमेल बिठाकर ही तय किया जा सकता है। जब हम भरपूर और गहरी नींद लेंगे, तभी हम मानसिक तनाव और एंग्जायटी से मुक्त होकर एक स्वस्थ, ऊर्जावान और तार्किक समाज का निर्माण कर पाएंगे। सोने पर शर्मिंदा होना बंद कीजिए, क्योंकि भरपूर नींद ही पूरी तरह जिंदा रहने और अपनी पूरी क्षमता से काम करने की पहली अनिवार्य शर्त है।
लेखक परिचय: अब्दुल्लाह मंसूर, एक लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वे ‘पसमांदा दृष्टिकोण’ से लिखते हुए, मुस्लिम समाज में जाति के प्रश्न और सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं।
