लेखक – अब्दुल्लाह मंसूर
बीती 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के पहले जमीनी प्रदर्शन ने इस पूरे उफान की हकीकत सामने ला दी। सोशल मीडिया पर दो करोड़ की ‘फौज’ का दम भरने वाले इस आंदोलन के चेहरे शायद इसी फिराक में थे कि सरकार उन्हें एयरपोर्ट पर ही रोक लेगी, जिससे उन्हें दमन का शिकार होने का एक सियासी फायदा (नाटकीय माइलेज) मिल जाए। खुद मार्ग थाने (Marga Police Station) जाकर लिखित अर्जी सौंपना भी इसी योजना का हिस्सा था, वरना यह डिजिटल पार्टी यह काम एक ईमेल से भी कर सकती थी। मगर सत्ता ने उनके दांव को भांपते हुए जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरने की खुली छूट दे दी और टकराव के सहारे लाइमलाइट बटोरने की उनकी पूरी हवा ही निकल गई। मंच तो मिला, मगर सुर्खियां बटोरने वाला कोई विवाद खड़ा नहीं हो सका। यह घटनाक्रम तस्दीक करता है कि वर्चुअल दुनिया में लाइक्स बटोरना जितना आसान है, उन उंगलियों को सड़कों पर उतारकर वास्तविक तख्तापलट करना उतना ही टेढ़ी खीर है। दो करोड़ के डिजिटल कुनबे का दावा करने वाली CJP जब सड़क पर उतरी, तो वहां बीस हजार सिर भी नहीं जुट पाए। सोशल मीडिया की जोशीली रील्स और हैशटैग्स के उन्माद को देखकर जिन लोगों ने इसे फ्रांस की राज्यक्रांति (French Revolution) जैसा कोई ऐतिहासिक बदलाव मान लिया था, उन्हें जंतर-मंतर की खाली पड़ी दरी देखकर यकीनन एक गहरा झटका लगा होगा।
सच बताऊँ मुझे कोई झटका नहीं लगा क्योंकि अगस्त की वह तपती और झुलसाती धूप आज भी मेरी यादों में उतनी ही साफ़ है। दिल्ली की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ा हुआ था, हवा में एक अजीब सा इंकलाबी जज़्बा था और रामलीला मैदान सिरों के एक अंतहीन समंदर में तब्दील हो चुका था। ऐसा लग रहा था मानो आज़ाद भारत अपने इतिहास की सबसे बड़ी राजनैतिक करवट लेने के मुहाने पर खड़ा है। देश भर के कोने-कोने से आए युवा और छात्र उस मैदान की धूल में एक बेहतर मुल्क का ख़वाब लिए बैठे थे। उन दिनों मैं दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। माहौल में ऐसा सम्मोहन था कि चाय की दुकानों पर किताबों से ज़्यादा लोकपाल पर बहस होती थी। यहाँ तक कि कोचिंग संस्थानों के शिक्षकों ने भी हमसे कह दिया था, “जाओ, पढ़ाई कुछ दिन बाद भी हो जाएगी, लेकिन इस ऐतिहासिक आंदोलन में अपना योगदान देना पहले ज़रूरी है।” तत्कालीन सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से पूरा देश उद्वेलित था और हम युवाओं को ईमानदारी से लगता था कि अगर इस व्यवस्था को नहीं बदला गया, तो हमारा भविष्य और यह मुल्क पूरी तरह तबाह हो जाएगा।
मंच पर अरविंद केजरीवाल खड़े होकर देश के रसूख़दार नेताओं के नामों की फेहरिस्त पढ़ रहे थे। वे दावों के साथ बता रहे थे कि किस नेता का कितना पैसा स्विस बैंक में जमा है और कैसे एक झटके में उस काले धन को वापस लाकर देश की तकदीर बदली जा सकती है। उस दौर में ‘जनलोकपाल विधेयक’ को एक ऐसे रामबाण की तरह पेश किया गया था, मानो उसके आते ही देश की सदियों पुरानी सारी राजनैतिक बीमारियाँ एक पल में छूमंतर हो जाएंगी। हमें बताया गया कि लोकपाल एक ऐसी सर्वोच्च सत्ता होगा जिसके दायरे में सुप्रीम कोर्ट के जज से लेकर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक होंगे। हम युवा थे, और हमारे ख़ून के भीतर व्यवस्था को उलट-पुलट डालने की वैसी ही गर्म लहरें उठ रही थीं, जैसी आज मैं ‘जेनरेशन ज़ेड’ (Gen Z) के इन लड़कों के भीतर, उनकी डिजिटल सक्रियता में देखता हूँ।
सपनों का मोहभंग: आंदोलन से चुनावी राजनीति का सफ़र
अन्ना हजारे का वह आंदोलन, जो बाद में बड़ी तेज़ी से केजरीवाल के राजनैतिक अभियान में तब्दील हो गया, हमारी रग-रग में समा चुका था। जब केजरीवाल ने अंततः राजनैतिक पार्टी बनाने का फैसला किया, तो हमने आँख मूंदकर उसका समर्थन किया। उनके हक़ में माहौल बनाने के लिए वीडियो फॉरवर्ड करने से लेकर, दिल्ली की गलियों और मोहल्लों में घर-घर जाकर चंदा मांगने और कैंपेनिंग करने तक, हम हर मोर्चे पर मुस्तैदी से खड़े रहे। यहाँ तक कि जेएनयू (JNU) के कई धुर वामपंथी (Left) छात्र संगठन भी इस नई राजनीति के स्वागत में उनके प्रचार में सबसे आगे-आगे चल रहे थे। हमें लग रहा था कि हम एक बिल्कुल नए, पारदर्शी और पाक-साफ़ राजनीतिक युग के जन्मदाता बन रहे हैं।
लेकिन आज जब मैं डेढ़ दशक बाद पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि ‘आम आदमी पार्टी’ के रूप में जो बदलाव का सपना हमने देखा था, वह अंततः एक राजनैतिक छलावा साबित हुआ। जिस पार्टी ने राजनीति से ‘संपर्क स्तर’ (कम्युनिकेशन गैप) और वीआईपी कल्चर को पूरी तरह खत्म करने का वादा किया था, आज उनके ऊपर भी राज्यसभा की टिकटें बेचने और रसूख़दारों को फायदा पहुँचाने के गंभीर आरोप लगे। जिन नेताओं को वे मंचों से सरेआम भ्रष्ट कहकर जेल भेजने की कसमें खाते थे, जिनके खिलाफ कागज़ात लहराते थे, आज उन्हीं नेताओं और पार्टियों के साथ चुनावी गठबंधन (Alliance) बनाकर, मंच साझा करके और संगठन तैयार करके आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ रही है। सत्ता की राजनीति में आने के बाद आदर्शों का यह जो व्यावहारिक पतन हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि व्यवस्था को बदलने का दावा करने वाले लोग अंततः उसी व्यवस्था के रंग में रंग जाते हैं। यह ढांचा हाशिए के समाजों (बहुजन-पसमांदा) को केवल ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल करता है और शीर्ष प्रतिनिधित्व से दूर रखता है। उन्होंने युवाओं की राजनैतिक मासूमियत और उनके जज़्बे का इस्तेमाल महज़ अपनी राजनैतिक ज़मीन तैयार करने के लिए किया।
संस्थागत अपमान और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का डिजिटल जन्म
तो क्या जंतर-मंतर पर भीड़ न जुटा पाने के बाद यह मान लिया जाए कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ पूरी तरह विफल हो गई? या फिर जिन मांगों को लेकर युवाओं का यह हुजूम डिजिटल स्पेस में उठ खड़ा हुआ था, वे पूरी तरह बेमानी और महज़ एक बचकाना मज़ाक थीं? धरातल की हकीकत को समझने वाले किसी भी गंभीर विश्लेषक के लिए इसका जवाब ‘ना’ में होगा। जंतर-मंतर की खाली पड़ी दरियां भले ही CJP की संगठनात्मक कमजोरी को बयां करती हों, लेकिन वे उस गहरे संस्थागत अपमान और तीखे आक्रोश को कम नहीं कर सकतीं, जिसकी कोख से इस आंदोलन ने जन्म लिया था। दरअसल, इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि देश की सर्वोच्च अदालत के एक तीखे बयान से तैयार हुई थी।
मई 2026 में एक सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने उन युवाओं के लिए “कॉकरोच” और “परजीवी” (पैरासाइट्स) जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया, जो रोज़गार न मिलने पर सोशल मीडिया, आरटीआई (RTI) या जनहित याचिकाओं के ज़रिए व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। एक ऐसे दौर में जब देश का पढ़ा-लिखा युवा नीट (NEET) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के पेपर लीक होने, बेरोज़गारी, और बेतहाशा बढ़ती महंगाई से पहले ही गहरे मानसिक अवसाद से गुज़र रहा था, इस संस्थागत अपमान ने ज़ख्मों पर नमक का काम किया। हालांकि बाद में इस पर स्पष्टीकरण भी आया कि बात केवल ‘फेक डिग्री’ वाले फर्जी लोगों के संदर्भ में थी, लेकिन तब तक युवाओं के आत्मसम्मान को जो ठेस लगनी थी, वह लग चुकी थी। युवाओं ने इस अपमान को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया और यह सामूहिक धारणा बन गई कि “अगर यह व्यवस्था हमें कॉकरोच समझती है, तो हम गर्व से कॉकरोच बनकर ही इस बहरी व्यवस्था को अपनी आवाज़ सुनाएंगे।”
इस गुस्से को एक व्यवस्थित और मज़ाकिया शक्ल देने का काम 16 मई 2026 को बोस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे एक भारतीय छात्र अभिजीत दिपके के एक ट्वीट ने किया। उन्होंने महज़ एक पैरोडी के तौर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की घोषणा की और एक वेबसाइट बना दी, जिसमें शामिल होने की शर्तें भी उतनी ही मज़ाकिया थीं। लेकिन यह मज़ाक कितना बड़ा राजनैतिक सच बनने जा रहा था, इसका अंदाज़ा शायद खुद उसके निर्माता को भी नहीं था। इस पेज ने महज़ दो से चार दिनों के भीतर इंस्टाग्राम और एक्स (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर करोड़ों फॉलोअर्स जुटाकर स्थापित और पारंपरिक राजनैतिक दलों को पीछे छोड़ दिया। इस अभूतपूर्व डिजिटल बढ़त ने यह साफ़ कर दिया कि आज की नई पीढ़ी के लिए राजनीति अब केवल पारंपरिक रैलियों या उबाऊ भाषणों तक सीमित नहीं है; उनके लिए व्यंग्य, रील्स, स्क्रीनशॉट और मीम्स ही व्यवस्था की विसंगतियों से लड़ने की नई भाषा बन चुके हैं लेकिन यह भी ध्यान देना ज़रूरी है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला यह आक्रोश मुख्य रूप से शहरी, अर्ध-शहरी और स्मार्टफोन तक आसान पहुंच रखने वाले युवाओं का है। भारत के ग्रामीण अंचलों और बेहद पिछड़े (विशेषकर पसमांदा-बहुजन) समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी इस ‘डिजिटल विमर्श’ से दूर है, जो केवल ग्राउंड रियलिटी से जुड़कर ही इस आंदोलन का हिस्सा बन सकता है।
इस आंदोलन के डिजिटल घोषणापत्र में कुछ बेहद गंभीर मांगें शामिल की गईं, जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बुनियादी सुधार की वकालत करती थीं। इनमें यह मांग सबसे प्रमुख थी कि किसी भी चीफ जस्टिस को रिटायरमेंट के बाद इनाम के तौर पर राज्यसभा की सीट न मिले, ताकि न्यायपालिका की आज़ादी बची रहे। इसके साथ ही, वोटर लिस्ट से नागरिकों के नाम ग़लत तरीके से हटाए जाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त को यूएपीए (UAPA) के तहत गिरफ्तार करने, संसद और कैबिनेट दोनों में महिलाओं को 50% आरक्षण देने, बड़े उद्योगपतियों के मीडिया घरानों के लाइसेंस रद्द करके बिके हुए मीडिया के एकाधिकार को रोकने और दल-बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों पर 20 साल का लंबा प्रतिबंध लगाने जैसी मांगें उठाई गईं। ये मांगें व्यावहारिक राजनीति के धरातल पर भले ही अतिवादी या भावुक लगती हों, लेकिन ये इस बात का प्रतीक हैं कि युवा अब स्थापित व्यवस्था के रेंगते हुए सुधारों से ऊब चुका है।
जब इस डिजिटल आंदोलन ने पेपर लीक के विरोध में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की ऑनलाइन मुहीम शुरू की, तो उसे करोड़ों व्यूज मिले। इस बढ़ते प्रभाव से घबराकर प्रशासन द्वारा सुरक्षा का हवाला देते हुए इसके मुख्य अकाउंट्स को भारत में ब्लॉक कर दिया गया, जिसे डिजिटल सेंसरशिप और युवाओं की आवाज़ को दबाने का प्रयास माना गया। इसके बाद आंदोलन के संचालकों को धमकियों और ‘विदेशी साजिश’ या ‘पाकिस्तानी कनेक्शन’ होने जैसे आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है।
सरकारें नीतियां बनाती हैं और संस्थाएं देश को चलाती हैं; उनकी गरिमा तथा स्थिरता को बनाए रखना हम सभी नागरिकों का कर्तव्य है। व्यवस्था की आलोचना हमेशा सुधार के इरादे से होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही, एक शिक्षक के रूप में जब मैं क्लासरूम में बैठे उन उदास और हताश चेहरों को देखता हूँ जो रोज़गार की तलाश में भटकते हैं, परीक्षाओं की अनिश्चितता से जूझते हैं और अपनी पूरी जवानी कोचिंग के जाल में खपा देते हैं, तो उनकी मानसिक पीड़ा और भविष्य की चिंता को नज़रअंदाज़ करना भी मेरे लिए असंभव हो जाता है। देश की तरक्की तभी संभव है जब हमारी नीतियां और संस्थाएं युवाओं की आकांक्षाओं के प्रति अधिक संवेदनशील, जवाबदेह और पारदर्शी हों।
जब हम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के इस नए उभार की तुलना उस दौर के ‘आम आदमी पार्टी’ के आंदोलन से करते हैं, तो कई समानताएं और अंतर साफ़ नज़र आते हैं। दोनों ही आंदोलनों का जन्म स्थापित व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष, उपेक्षा और युवाओं के अपमान की भावना से हुआ था। लेकिन जहाँ ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) का जन्म ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (IAC) नाम के एक बहुत बड़े, सुसंगठित और जमीनी आंदोलन से हुआ था जिसे आरएसएस, वामपंथियों और नागरिक समाज (Civil Society) के बड़े चेहरों का समर्थन प्राप्त था वहीं CJP महज़ एक पैरोडी ट्वीट से शुरू हुई है। ‘आप’ के पास ज़मीन पर एक ठोस नेतृत्व, अनशन, टोपी और रैलियों का पारंपरिक ढांचा था; इसके विपरीत CJP पूरी तरह ‘नेताविहीन’ और ‘अनाम’ (Anonymous) है। एक अनाम डिजिटल भीड़ जब राजनैतिक पार्टी बनती है, तो उसका बिखरना कहीं ज़्यादा आसान होता है।
यह अंतर दिखाता है कि बीते एक दशक में तकनीक ने हमारे सोचने और संगठित होने के तरीके को कितना बदल दिया है। लेकिन इस आंदोलन की सबसे बड़ी और हालिया करवट यह है कि CJP भी अब महज़ एक डिजिटल मज़ाक या सोशल मीडिया का बुलबुला नहीं रह गई है, बल्कि वह भी अब एक औपचारिक राजनैतिक दल (Political Party) बनने की राह पर चल पड़ी है। यह मोड़ इस आशंका को और गहरा कर देता है कि क्या CJP भी भविष्य में ‘आप’ वाले उसी ढर्रे पर आगे बढ़ेगी? क्या सत्ता के गलियारों में कदम रखते ही इसके आदर्श भी उसी तरह समझौतों की भेंट चढ़ जाएंगे जैसे डेढ़ दशक पहले एक आंदोलन के चढ़े थे? क्या चुनावी राजनीति का दलदल इस नए ‘डिजिटल विकल्प’ को भी अपने रंग में रंग लेगा? यह एक ऐसा सवाल है जो हम जैसे उन तमाम लोगों को डराता है जिन्होंने एक बार राजनीति बदलने के नाम पर अपना सब कुछ दांव पर लगाया था।
पड़ोसी देशों से सबक
पड़ोसी देशों का हालिया इतिहास हमारे इस पूरे विश्लेषण को एक बेहद ज़रूरी और गंभीर अंतरराष्ट्रीय संदर्भ देता है। जब हम भारत के आस-पास के मुल्कों की हलचलों को देखते हैं चाहे वह श्रीलंका का ‘अरागलया’ आंदोलन हो, बांग्लादेश में छात्रों का अभूतपूर्व तख्तापलट हो, या नेपाल में होने वाले हालिया राजनैतिक उलटफेर तो इन सबमें एक साझा सूत्र साफ़ दिखाई देता है। यह सूत्र है: पढ़े-लिखे लेकिन बेरोज़गार युवाओं का चरम पर पहुँचा सब्र। इन सभी देशों में ऐसी युवा आबादी की संख्या बहुत बड़ी है जो इतिहास में सबसे ज़्यादा शिक्षित है, जिसके पास डिग्रियां तो हैं, लेकिन व्यवस्था उन्हें सम्मानजनक और स्थाई रोज़गार देने में पूरी तरह नाकाम रही है। जब इन युवाओं की बुनियादी ज़रूरतों और उनकी गरिमा को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो उनका गुस्सा किसी न किसी मोड़ पर एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ता है।
इस कड़ी में सबसे ताज़ा मामला नेपाल का है। वहाँ लंबे समय से जारी राजनैतिक अस्थिरता, आर्थिक सुस्ती और नौजवानों के लिए अवसरों की कमी ने अवाम के भीतर एक गहरा कड़वाहट भरा असंतोष पैदा कर दिया। जब पारंपरिक दलों की खींचतान से ऊब चुके और रोज़गार की तलाश में भटकते युवाओं के सब्र का बांध टूटा, तो उनका यह आक्रोश सड़कों पर एक बड़े राजनैतिक उलटफेर के रूप में सामने आया। यह घटना साफ़ करती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में अगर युवाओं की बुनियादी आकांक्षाओं को दरकिनार किया जाएगा, तो स्थापित सत्ताएं अपनी ज़मीन खोने के लिए मजबूर हो जाएंगी।
यही कहानी हमने बांग्लादेश और श्रीलंका में भी देखी है। बांग्लादेश में आंदोलन की शुरुआत बहुत ही सामान्य और जायज मांग नौकरियों में कोटा सिस्टम में सुधार को लेकर हुई थी। शुरुआत में वहाँ की सत्ता ने भी छात्रों की इस मांग को बहुत हल्के में लिया, उनका अपमान किया और आंदोलन को दबाने के लिए इंटरनेट बंद करने से लेकर कड़े प्रशासनिक दमन का सहारा लिया। लेकिन नतीजा क्या हुआ? युवाओं का वह असंगठित और डिजिटल रूप से एकजुट हुआ गुस्सा देखते ही देखते पूरी सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले एक सैलाब में बदल गया।
ठीक इसी तरह, श्रीलंका के ‘अरागलया’ आंदोलन में आर्थिक बदहाली, बेतहाशा महंगाई और नौजवानों के भविष्य से किए गए खिलवाड़ ने जनता के भीतर वो बारूद भरा कि सोशल मीडिया पर शुरू हुई एक डिजिटल मुहिम (#GoHomeGota) देखते ही देखते ज़मीनी सुनामी बन गई। जब बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते युवाओं ने पुलिसिया दमन और कर्फ्यू को धता बताया, तो लाखों की अवाम राष्ट्रप्रमुख के आलीशान महल में जा घुसी। सरकारें जब युवाओं की जायज मांगों और उनके अस्तित्व की लड़ाई को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ या ‘विदेशी साजिश’ बताने लगती हैं, तो वे असल में अपनी नाकामियों को छिपाने का प्रयास कर रही होती हैं।
नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका में जो क्रांतियां और उलटफेर हुए, उन्होंने पुरानी राजनैतिक व्यवस्थाओं को चुनौती तो दी, लेकिन उनके पास भविष्य का कोई ठोस, वैकल्पिक और समावेशी ढांचा मौजूद नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि सत्ता बदलने के बाद भी वहाँ का आम युवा, विशेषकर जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा शोषित और वंचित बहुजन-पसमांदा तबका है, आज भी अपनी बुनियादी दिक्कतों से जूझ रहा है। क्रांति कर देना या सत्ता पलट देना एक बात है, लेकिन एक ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण करना जहाँ जाति, वर्ग या मज़हब के आधार पर किसी का शोषण न हो, बिल्कुल दूसरी बात है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के महज़ एक डिजिटल मीम से लेकर एक औपचारिक राजनैतिक दल बनने तक के इस पूरे प्रकरण से भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, अदालत और सरकार को बहुत बड़ा सबक सीखने की ज़रूरत है। हमारे आस-पास के देशों की घटनाएं एक चेतावनी की तरह हैं कि जब एक पूरी पीढ़ी को यह लगने लगे कि यह व्यवस्था उन्हें इंसान ही नहीं समझती, उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करती है, तो वह गुस्सा किसी भी दिन दीवारों को तोड़कर बाहर आ सकता है। गणतंत्र की भलाई इसी में है कि वह पड़ोस की इन आहटों को सुने, समझे और युवाओं के इस डिजिटल और राजनैतिक आक्रोश को दबाने के बजाय उनके वास्तविक मुद्दों जैसे परीक्षा पारदर्शिता, रोज़गार की संवैधानिक गारंटी, आंतरिक सामाजिक समानता और सामाजिक न्याय का एक स्थाई, न्यायपूर्ण और गरिमापूर्ण समाधान निकाले, ताकि आने वाली पीढ़ी का लोकतंत्र पर भरोसा हमेशा के लिए सुरक्षित रह सके।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।