लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
भारत के इतिहास में कई बड़े जन-आंदोलन हुए हैं, लेकिन मेडिकल और अन्य सरकारी भर्ती परीक्षाओं (विशेषकर NEET-UG 2026) के कथित पेपर लीक के बाद उभरा यह छात्र आंदोलन अपने आप में बेहद अनूठा और ऐतिहासिक था। लाखों युवाओं की मेहनत, उम्मीदों और उनके परिवारों के सपनों पर जब पानी फिरा, तो देश भर में गहरी निराशा और आक्रोश फैल गया। इस तनावपूर्ण माहौल में आग में घी डालने का काम सुप्रीम कोर्ट (CJI) की उस मौखिक टिप्पणी ने किया, जिसमें उन्होंने बेरोजगार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ यानी तिलचट्टों से कर दी। भारतीय युवाओं ने इस अपमानजनक बयान के आगे घुटने टेकने के बजाय इसे ही अपनी ताकत और विरोध का सबसे बड़ा प्रतीक बना लिया। युवा कार्यकर्ता अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाकर कि “क्या होगा यदि देश के सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं?”, मई 2026 में व्यंग्य के रूप में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की स्थापना की। जो शुरुआत में महज़ एक ऑनलाइन मज़ाक लग रहा था, वह देखते ही देखते देश का सबसे बेबाक और बड़ा छात्र आंदोलन बन गया।
CJP के एक आह्वान पर देश के कोने-कोने से युवाओं का हुजूम सड़कों पर उतर आया और दिल्ली के जंतर-मंतर पर 36-37 दिनों का अनिश्चितकालीन धरना शुरू हो गया। ऑनलाइन व्यंग्य से शुरू हुआ यह आंदोलन केवल प्रभावित छात्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें पेशेवर लोग, माता-पिता और आम नागरिक भी जुड़ते चले गए। इस आंदोलन को तब और अधिक नैतिक ताकत मिली जब जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक खुद को “मानद कॉकरोच” घोषित करते हुए 26 दिनों की भूख हड़ताल पर बैठ गए। जंतर-मंतर की भीषण गर्मी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बावजूद युवाओं के लिए यह संघर्ष केवल एक जगह जमा होने का क्षण नहीं था, बल्कि नागरिक के रूप में उनके खुद के विकास और राजनीतिक सीख की एक महान यात्रा बन गया। CJP की केंद्रीय मांगें बहुत साफ थीं। पेपर लीक की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तुरंत इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार, प्रभावित छात्रों को मुआवजा और छात्रों पर दर्ज मुकदमे वापस लेना।
इस पूरे आंदोलन की सबसे दिलचस्प और मजबूत कड़ी Gen Z की अपनी अनोखी कार्यशैली रही। पारंपरिक आंदोलनों के विपरीत यहाँ कोई उबाऊ भाषण या गंभीर चेहरे नहीं थे; Gen Z ने इस लड़ाई को लड़ने के लिए इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉट्स और मीम्स को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता किसी भी तर्क या बहस का जवाब दे सकती है, लेकिन हास्य, व्यंग्य और उपहास पर काबू पाना नामुमकिन होता है। मुख्यधारा मीडिया की उपेक्षा को दरकिनार करते हुए युवाओं ने अपने स्मार्टफोन के कैमरे से हर सच्चाई को सीधे लाइव पब्लिश किया।
जब सरकार के इशारे पर पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और बर्बरता का सहारा लिया विशेषकर 20 जुलाई की हिंसा में कई युवा छात्राएं घायल हुईं तो आंदोलन कुचलने के बजाय और अधिक मजबूत हो गया। पुलिस वैन में बंद होने के बावजूद युवाओं ने “पुलिस अंकल…” जैसे तंजिया गीत गाकर प्रशासनिक क्रूरता को पूरे देश के सामने हास्यास्पद बना दिया। हर लाठीचार्ज ने युवाओं का हौसला बुलंद किया और अधिक प्रदर्शनकारी पैदा किए।
इस आंदोलन की एक और सबसे खास बात युवा महिलाओं की अभूतपूर्व और स्वतंत्र भागीदारी रही। वे केवल सांकेतिक उपस्थिति दर्ज कराने नहीं आई थीं, बल्कि अग्रिम पंक्ति में रहकर नेतृत्व कर रही थीं। जंतर-मंतर का विरोध स्थल इन युवा महिलाओं के लिए एक ऐसा सुरक्षित और मुक्त वातावरण बन गया जहाँ उन्होंने अपने पहनावे या शैली की परवाह किए बिना निडर होकर तीखे नारों और पोस्टरों से व्यवस्था को सीधे चुनौती दी। इसके साथ ही, बॉलीवुड की प्रमुख हस्तियों जैसे आमिर खान, प्रियंका चोपड़ा और सलमान खान ने छात्रों की हिम्मत की सराहना की, वहीं संसद के मानसून सत्र में विपक्षी नेताओं राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने भी CJP की मांगों को ज़ोर-शोर से उठाया। जनता के व्यापक दबाव को देखते हुए आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विवाद पर प्रतिक्रिया दी और दोषियों पर कार्रवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का आश्वासन दिया।
यह आंदोलन सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं था, बल्कि यह भारत के बदहाल संस्थागत ढाँचे और लगातार बढ़ते अविश्वास पर एक सीधा प्रहार था। Gen Z का मुख्य निशाना देश की वे प्रमुख संस्थाएं स्कूल/शिक्षा बोर्ड, न्यायपालिका, नौकरशाही और मुख्यधारा मीडिया थीं जो अपनी निष्पक्षता खो चुकी हैं। युवाओं में यह गहरी निराशा है कि देश का अभिजात वर्ग अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ाता है, जबकि आम परिवारों को ज़मीन गिरवी रखकर अंतहीन प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग सेंटरों के शोषण में झोंक दिया जाता है। Gen Z ने स्पष्ट कर दिया कि वे अब इस प्रक्रियात्मक सजा और संस्थागत अविश्वास को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी साबित किया कि भारत का यह CJP आंदोलन बांग्लादेश (2024), श्रीलंका (2022) या नेपाल के Gen Z आंदोलनों से काफी अलग और परिपक्व था। जहाँ पड़ोसी देशों में आंदोलन हिंसक होकर सीधे तख्तापलट और पूरी सत्ता को उखाड़ फेंकने की तरफ चले गए, वहीं भारतीय युवाओं ने पूरी तरह संवैधानिक मर्यादा, अहिंसा, लोकतांत्रिक अधिकारों और केंद्रित संस्थागत सुधारों पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखा।
37 दिनों तक चले इस ऐतिहासिक संघर्ष के बाद आखिरकार ‘युवा कॉकरोचों’ की अभूतपूर्व जीत हुई। अपनी दृढ़ता और सार्वजनिक आलोचना की अनदेखी के लिए जानी जाने वाली सरकार को झुकना पड़ा और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा। मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासन में यह केवल दूसरा मौका था जब उसने किसी सामाजिक आंदोलन के आगे घुटने टेके, और किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा लिया जाना अपने आप में ऐतिहासिक मोड़ बन गया।
सरकार ने व्यावहारिक और संवेदनशील रवैया अपनाते हुए सीजेपी प्रवक्ताओं के साथ तीन दौर की सीधी बातचीत की, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और पीड़ितों के लिए मुआवजे पर सहमति जताई। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस आंदोलन ने ‘चुनावी जीत’ और ‘नैतिक साख’ के अंतर को स्पष्ट कर दिया है। Gen Z ने अपनी नई सोच और लोकतांत्रिक ताक़त से यह साबित कर दिया कि जब संस्थाओं से भरोसा उठता है, तो एक ऑनलाइन मीम से शुरू हुआ आंदोलन भी सत्ता के अहंकार को झुकाने की ताकत रखता है।
अब्दुल्लाह मंसूर स्वतंत्र लेखक और शिक्षक हैं। वे सामाजिक मुद्दों और पसमांदा विमर्श पर लगातार लिखते रहे हैं।