लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर घटित छात्र आंदोलनों ने हमारे समाज, राजनीति और शासन व्यवस्था के समक्ष कई गंभीर और बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विरोध प्रदर्शन केवल परीक्षा में धांधली, पेपर लीक या प्रशासनिक जवाबदेही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन की भाषा, संवाद के तौर-तरीकों और विरोध की शैली को लेकर एक राष्ट्रव्यापी बहस में बदल गया। पूरे घटनाक्रम के सिलसिलेवार क्रम को देखें तो जंतर-मंतर पर आपत्तिजनक बयानबाज़ी और गालियों का वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन तथा पुलिस ने त्वरित और सख्त कानूनी कार्यवाही की। इसके तहत गाजियाबाद निवासी स्मृति सिंह की शिकायत पर प्रदर्शनकारी युवती रुचिका सिंह के खिलाफ शांति भंग और मानहानि जैसी धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई। इस पुलिस कार्यवाही और प्रशासनिक सख्ती के ठीक बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने प्रदर्शनकारी युवाओं को “गुमराह बच्चे” मानते हुए माफ करने की बात कही और स्पष्ट किया कि गुस्से में बोले गए कड़वे शब्दों पर व्यवस्था को संयम और बड़प्पन से काम लेना चाहिए।
प्रदर्शन के दौरान बोली गई तीखी भाषा को केवल “नैतिक पतन”, “संस्कारों की कमी” या “अपराधिक आचरण” कहकर खारिज कर देना बहुत जल्दबाजी होगी। गालियों को समझने के लिए उन्हें केवल ‘बुरे शब्द’ नहीं, बल्कि एक ‘सामाजिक क्रिया’ के रूप में देखना होगा। ये शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक हिंसा करती हैं और सत्ता के ढाँचे को टिकाए रखती हैं। जब हम मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के चश्मे से गहराई में उतरते हैं, तो यह बात साफ नजर आती है कि जंतर-मंतर पर उभरी आक्रामक शब्दावली केवल किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तिगत बिगाड़ नहीं है। इसके पीछे सालों से जमा हो रहा असंतोष, प्रशासनिक तंत्र की अनदेखी, व्यवस्थागत प्रताड़ना और एक पूरी नई पीढ़ी (Gen Z) के भाषाई प्रतिरोध का गहरा ताना-बाना काम कर रहा है।
भारत में जन आंदोलनों की विरासत
भारत में छात्र और जन आंदोलनों का एक बहुत ही समृद्ध और ऐतिहासिक आधार रहा है। 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन हो, 1990 का मंडल आयोग विरोधी प्रदर्शन, 2011 का अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, 2012 का निर्भया कांड विरोधी जन-आक्रोश, या फिर हालिया वर्षों का ऐतिहासिक किसान आंदोलन और युवाओं का डिजिटल आंदोलन इन सभी ने समय-समय पर भारतीय राजनीति और सामाजिक चेतना को एक नया मोड़ दिया है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत हर नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) जैसे कई मील के पत्थर फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार असीमित नहीं हो सकता और लोक व्यवस्था (Public Order) तथा आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘युक्तियुक्त निर्बंधन’ (Reasonable Restrictions) लागू होते हैं।
लेकिन जब हम कानून से इतर युवाओं की मानसिक स्थिति का विश्लेषण करते हैं, तो मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यधिक तनाव, निराशा और अन्याय के माहौल में आक्रामक या वर्जित भाषा का इस्तेमाल केवल असभ्यता नहीं होता। मनोविज्ञान में इसे ‘कैथार्सिस’ (Catharsis) यानी भावनात्मक शुद्धि का माध्यम माना जाता है। प्रसिद्ध ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीवन्स के अध्ययनों ने भी यह साबित किया है कि तीव्र मानसिक पीड़ा, हताशा या तनाव के समय वर्जित शब्दों का प्रयोग व्यक्ति की सहनशक्ति को बढ़ाता है और उसके अंदर पनप रहे आक्रोश को सीधे शारीरिक हिंसा में बदलने से रोकने के लिए एक अहिंसक निकास द्वार का काम करता है। करोल बाग,मुखर्जी नगर जैसे दिल्ली के प्रतियोगी माहौल में छोटे-छोटे कमरों में रहकर सालों-साल दिन-रात तैयारी करने वाले, बार-बार पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने की मार झेलने वाले और अपने साथियों को अवसाद या आत्महत्या के गर्त में गिरते देखने वाले युवाओं का जब व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है, तो उनका यह ‘सिस्टमैटिक रेज’ (Systemic Rage) तीखी जुबां बनकर बाहर निकलता है। जब सोनम वांगचुक जैसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया जाता है और सरकार से सीधे संवाद के सारे रास्ते बंद महसूस होते हैं, तो छात्र भी सब्र का बांध टूटने पर सीमा लांघने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
इस पूरे आंदोलन का सबसे अनूठा और हैरान करने वाला समाजशास्त्रीय पहलू जंतर-मंतर पर युवा महिलाओं द्वारा खुलेआम और बिना किसी हिचकिचाहट के तीखे और वर्जित शब्दों का प्रयोग करना रहा, जैसा कि रुचिका सिंह के मामले में देखा गया। पारंपरिक पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों द्वारा बोली जाने वाली कड़वी भाषा को “सड़क की जुबां”, “रफ टॉक” या राजनीति का सामान्य लहजा मानकर स्वीकार कर लिया जाता है, जबकि महिलाओं की भाषा पर हमेशा संयम, शालीनता और नैतिकता का कड़ा सामाजिक पहरा रहता है। जंतर-मंतर पर जब लड़कियों ने राजनेताओं, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ उन्हीं आक्रामक शब्दों का इस्तेमाल किया, तो उन्होंने अपनी तय जेंडर भूमिका के लिए निर्धारित ‘सीमित बोली कोड’ (Restricted Speech Code) को मानने से साफ इंकार कर दिया। यहाँ गाली का ‘वि-लिंगीकरण’ (Degenderisation) देखने को मिला, जहाँ आक्रामक भाषा अब सिर्फ पुरुषों की बपौती नहीं रही, बल्कि वह सत्ता के सामने न झुकने वाले किसी भी व्यक्ति की अभिव्यक्ति का एक राजनीतिक औजार बन गई।
भाषा की राजनीति
हालाँकि, इस भाषाई बदलाव का एक दूसरा और बेहद सूक्ष्म पहलू भी है। समाजशास्त्र के अनुसार, मर्दों द्वारा औरतों और वंचितों के लिए बनाई गई गालियाँ वास्तव में पितृसत्ता और सत्ता-ढाँचे का भाषाई रूप हैं। लगभग हर भाषा की आम गालियाँ स्त्री-देह या जातिगत पहचान से जुड़ी होती हैं। दार्शनिक मिशेल फ़ूको के अनुसार, सत्ता सबसे प्रभावी तब होती है जब शोषित लोग उसे स्वेच्छा से स्वीकार कर लें। जब औरतें या उत्पीड़ित वर्ग उन्हीं गालियों को अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति या “सशक्तिकरण” मानकर दोहराने लगते हैं, तो इसे समाजशास्त्र में ‘इंटरनलाइज़्ड ऑप्रेसन’ (Internalized Oppression) या ‘आंतरिक दमन’ कहा जाता है। वे जाने-अनजाने उसी ढाँचे का हिस्सा बनी रहती हैं जो मूलतः उनका दमन करता है। यह भाषाई हिंसा केवल लिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जातिगत और सामाजिक व्यवस्था की नींव भी है। यही भाषाई हिंसा जातिगत ताने-बाने में ‘प्रतीकात्मक हिंसा’ (Symbolic Violence) और ‘स्टिग्मा’ के रूप में दिखाई देती है, जहाँ पसमांदा व दलित समुदायों को अपमानित करने वाले शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं जैसे ‘जोलाहा’, ‘धुनिया’, ‘भंगी’ या ‘कुंजड़ा’ आदि का इस्तेमाल करता है, तो यह व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे समुदाय के आत्मसम्मान पर प्रहार होता है।
आज का Gen Z युवा इस भाषाई दमन और सामाजिक बदलाव को एक नए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देख रहा है। इस पूरी घटना में इंस्टाग्राम रील्स और सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। रील्स पर मिलने वाले लाखों व्यूज, वायरल होने की होड़ और डिजिटल अटेंशन (Attention Economy) युवाओं को आक्रामक बयानों की तरफ प्रेरित करती है। जब किसी आक्रामक बयान का वीडियो लाखों व्यूज बटोरने लगता है, तो एल्गोरिदम उस व्यवहार को और बढ़ावा देता है। इसके साथ ही, ओटीटी (OTT) सिनेमा, वेब सीरीज और स्टैंडअप कॉमेडी की दुनिया में गालियों और अभद्र भाषा को ‘कूल’, ‘रियलिस्टिक’ और ‘बोल्ड फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ बनाकर पेश किया जा रहा है। युवा रोज़ इस पॉपुलर कल्चर को देखते हैं और अनजाने में इसे अपनी आम बोलचाल की भाषा का स्वाभाविक हिस्सा मान लेते हैं।
इसके अलावा, युवाओं के भीतर यह भाषा शून्य से पैदा नहीं हुई है। वे अपने देश के राजनेताओं को देख रहे हैं। मुख्यधारा की राजनीति में चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संसद से लेकर चुनावी रैलियों तक जिस तरह से एक-दूसरे के प्रति अमर्यादित और अशिष्ट शब्दावली का प्रयोग सामान्य हो चुका है, उसने देश के युवाओं के सामने बहुत गलत मिसाल पेश की है। कई बार जब सत्ता और विपक्ष के शीर्ष प्रतिनिधि ही भाषाई गरिमा खो देते हैं, तो युवाओं से संयम की अपेक्षा करना बेमानी हो जाता है। ऐसे में केवल पुलिस कार्यवाहियों या एफआईआर दर्ज करने से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी सलाह दी थी कि हर अभद्र बात पर अदालती कार्रवाई करने से वह मामला शांत होने के बजाय और ज्यादा फैल जाता है। जब पुलिस की सख्त कार्यवाही के बाद देश का शीर्ष नेतृत्व युवाओं को आक्रोशित बच्चे मानकर क्षमा करने का संदेश देता है, तो वह एक सकारात्मक रुख दिखाता है। लेकिन इस क्षमादान के साथ-साथ व्यवस्था को अपनी भीतर छिपी कमियों पर भी आत्ममंथन करना होगा।
जंतर-मंतर पर गूँजी आक्रामक आवाज़ें केवल एक तात्कालिक विरोध का रंग नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे समाज का पुराना भाषाई और सामाजिक व्याकरण टूट रहा है। लेकिन असली मुक्ति तब होगी जब भाषा केवल पुरानी हिंसा या रील्स के व्यूज बटोरने का जरिया न बनकर प्रतिरोध और नए अर्थ गढ़ने का साधन बने जैसा कि दलित और पसमांदा आंदोलनों ने हीनता सूचक शब्दों को सम्मान के प्रतीक में बदलकर किया है। यह घटनाक्रम हमारे समाज और शासन तंत्र के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ता है: क्या हम एक ऐसे समाज की दिशा में बढ़ रहे हैं जहाँ भाषा का लिंग और जातिगत भेद खत्म होकर एक समतावादी सार्वजनिक क्षेत्र बनेगा, या फिर हम अपने सार्वजनिक जीवन को और अधिक रूखा बना रहे हैं? इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि हमारी सरकारें छात्रों के इस गुस्से को केवल “अभद्रता” कहकर दबाती हैं, या फिर इसके पीछे छिपे गहरे सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दर्द को समझकर शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार लाती हैं।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।