डा . फैयाज़ अहमद फैजी

अखिल भारतीय मोमिन कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष जहीरुद्दीन ने रेखांकित किया कि संगठन वंचित मुस्लिम वर्गों(देशज पसमांदा) के लिए हिन्दू अनुसूचित जाति की तरह कुछ सुविधाएं प्राप्त कर लेगा.

दिल्ली में 26 अप्रैल 1943 ई हुए मोमिन कॉन्फ्रेंस के वर्किंग कमिटी मीटिंग में संघठन के अध्यक्ष मुहम्मद ज़हीरुद्दीन एडवोकेट ने मोमिन कांफ्रेंस को गरीब, पीड़ित और पसमांदा तबके के देश भक्ति की बेपनाह भावना का प्रतिबिंब, सांगठनिक प्रयास का प्रतीक और भारतीय मुसलमानों के वैभवशाली राजनैतिक क्रान्ति का सबूत बताते हुए मुस्लिम लीग पर तीखा प्रहार करते हुए इसे राजनीति में फर्जी और झूठी मजहबी एकता के नाम पर पसमांदा मुसलमानों के साथ सियासी अनाथों जैसा बर्ताव और खिलौने की तरह सत्ता के अधीन रखने की धोखाबाज सियासत का भी पोल खोला.उन्होंने जातिवादी विचाधारा से ग्रसित मुस्लिम लीडरशिप को भी लताड़ा.

मुस्लिम लीग के उपाध्यक्ष रजा अली ने कांग्रेस की पिछड़े वर्ग के भर्ती की नीति की आलोचना करते हुए मज़ाक उड़ाया कि, ‘वह सरकार कितनी महान और शक्तिशाली होगी जिसके फील्ड मार्शल, जनरल और कर्नल नट, कुंजड़ा, हलखोर और डोम हों.

जिसके विरोध में जमीयतुल राईन (राईन कॉन्फ्रेंस- पसमांदा कुंजडा जाति का संगठन) के अब्दुस-समद ने असर-ए-जदीद (आधुनिक काल) के संपादक को जिसमें यह रिपोर्ट छपी थी प्रतिउत्तर में लिखा कि यह मुस्लिम लीग के उस मानसिकता का सूचक है जिसमें वो पसमांदा मुसलमानों को उस विशेषाधिकार से बहिष्कृत करना चाहता है जिसका लाभ वह स्वयं उठा रहा है.

उस समय मुस्लिम लीग के विरोध में अधिकतर बुनकर(जुलाहा) जाति के देशज पसमांदा अग्रणी थे.इसीलिए मुस्लिम लीगी मानसिकता वाले अशराफ द्वारा मोमिन कॉन्फ्रेंस और इस के नेताओ पर तरह-तरह के आरोप, धार्मिक फतवो, लेख-लेखनी, पत्रिकाओं द्वारा बदनाम करना शुरू किया.

यहाँ तक कि बुनकर जाति के चरित्र हनन करने वाला “जुलाहा नामा”(लेखक-क़ाज़ी तलम्मुज हुसैन गोरखपुरी) एवं “फितना-ए-जुलाहा” (लेखक- हामिद हुसैन सिद्दीक़ी इलाहाबादी) भी प्रकाशित किया गया.

मोमिन कान्फ्रेंस ने कांग्रेस पार्टी से बराबर मांग कीकि जब भी मुसलमानों से संबंधित कोई फैसला हो तो मोमिन कान्फ्रेंस के प्रतिनिधियों को उसमें शामिल किया जाना चाहिए.आल इंडिया मोमिन कान्फ्रेंस के उपाध्यक्ष अब्दुल कय्यूम अंसारी ने आरा (बिहार) से 9 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद को टेलिग्राम भेजकर कहा, ‘मोमिन कान्फ्रेन्स अखबारों में प्रकाशित कांग्रेस-लीग समझौता सम्बन्धी खबरों के खिलाफ चेतावनी देती है,’ मोमिन कान्फ्रेंस मुस्लिम लीग को अपना नेतृत्व की मान्यता नहीं देता है.

डा. राजेन्द्र प्रसाद ने 13 अक्टूबर 1939 को वर्धा से उक्त टेलिग्राम का जवाब देते हुए लिखा- “किसी समझौते का प्रस्ताव नहीं है,इसलिए इसका सवाल नहीं उठता.”इसके बावजूद गांधी जी मुस्लिम लीग को मुसलमानों का सबसे शक्तिशाली संगठन और जिन्ना को सारे मुसलमानों की ओर से प्रतिनिधित्व मानते हुए उनसे मिले.बाद में हुई ऐतिहासिक कांग्रेस-लीग समझौता-वार्ता में मोमिन कान्फ्रेंस के प्रतिनिधियों को आमन्त्रित नहीं किया गया.

मोमिन कान्फ्रेंस की मांगों की उपेक्षा ने मुस्लिम लीग को राजनीतिक क्षितिज पर एक साम्प्रदायिक संगठन के रूप में उभरने का मौका दिया, जो देश की एकता के लिए घातक सिद्ध हुआ.”इन्ही संघर्ष के बीच 1946 का चुनाव आता है.

जो पृथक निर्वाचन के आधार पर होता है.इस चुनाव को पाकिस्तान के लिए जनमत संग्रह के रूप में देखा गया.इस चुनाव में आसिम बिहारी के नेतृत्व में मोमिन कॉन्फ्रेंस ने सर्व सम्मति से कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया.

यहां यह स्पष्ट रहे कि उस समय चुनाव में आज की तरह व्यस्कमताधिकार नहीं था,बल्कि शिक्षित  (किसी राज्य में आठवी पास, तो किसी राज्य में हाई स्कूल पास)वार्षिक टैक्स(किसी राज्य में 50 रुपए तो किसी राज्य में 60 रुपए और किसी में 150 रुपए) और सवा रुपया चौकीदारी टैक्स अदा करने वाले ही वोट देने के अधिकारी थे.

 इस प्रकार देश की कुल आबादी का केवल 13.4% भाग ही वोटर था.बिहार राज्य में यह संख्या मात्र 7.8 % के आस पास थी.इस प्रकार देशज पसमांदा समाज के पास अपने प्रतिद्वंदी अशराफ की अपेक्षा चुनाव लड़ने वाले और वोट देने वालो की संख्या बहुत कम थी.इस चुनाव में अन्य पसमांदा जातिगत संगठनों ने पूरी तरह मोमिन कॉन्फ्रेंस के नेतृत्व में चुनाव लडने का फैसला किया.

यह चुनाव भयानक साम्प्रदायिक दंगे के बाद का था जिसका सीधा फायदा मुस्लिम लीग को हुआ.चुनाव के दौरान मुस्लिम लीग ने पसमांदा समाज को अपने पक्ष में भ्रमित करने के लिए 12 पन्ने का एक बुकलेट निकाला था जिसमें प्रमुख बिंदु इस प्रकार थे..”मुस्लिम लीग से अलग होना, मोमिन आंदोलन(प्रथम पसमांदा आंदोलन) की दीन (मजहब) और दुनिया दोनो बरबाद कर देगा.हिन्दू कांग्रेस, और कांग्रेसी टोलियां हिन्दू रामराज्य के लिए काम कर रहीं हैं जिसमें सबसे पहले देहात के पसमांदा मुसलमानों की शुद्धि की जाएगी.

आपका पेशा बरबाद हो जाएगा.दस करोड़ मुसलमानों की पंचायत मुस्लिम लीग है और मुस्लिम लीग का समर्थन करना आपका धार्मिक कर्तव्य है.सवाल शैख, मोमिन, राईन आदि जाति का नहीं बल्कि इस्लाम की जिन्दगी और मौत का है.

भाईयो उठो मुस्लिम लीग का समर्थन करो, और अपने पूर्वजों अंसारे मदीना की सुन्नत जिन्दा कीजिए.उन्होंने दुनिया में पहला पाकिस्तान कायम किया और आप दूसरा पाकिस्तान कायम करें.
इसके जवाब में अब्दुल कय्यूम अंसारी अपने भाषणों में बगुला भगत वाला किस्सा सुनाकर द्विराष्ट्र सिद्धांत के खतरों से लोगों को आगह करते थे.

किस्सा यह कि एक बगुला था.उसने जंगल में स्थित एक तालाब की मछलियों को यह कहकर डराया कि जल्द इस तालाब का पानी सूखने वाला है इसलिए सभी मछलियों का बेमौत मारा जाना तय है.

उसने डरी हुई मछलियों को एक-एक कर पहाड़ पर स्थित एक तालाब में पहुंचा देने का आश्वासन दिया.मछलियों की राय से यह सिलसिला शुरू भी हो गया.इसी बीच तालाब के एक केकड़े को सन्देह हुआ.

उसने बगुला से कहा कि इस बार मेरा नम्बर है.मुझे पहाड़ पर चढ़ने दो.केकड़ा बगुले की पीठ पर सवार हुआ.बगुला केकड़े को लेकर पहाड़ पर उतरने ही वाला था कि कुछ ऊपर से ही केकड़े ने देखा कि यहां तो कोई तालाब नहीं है.

उसके उल्टा उसे पहाड़ की चट्टानों पर मछलियों के अस्थिपंजर दिखाई पड़े.उसे समझते देर नहीं लगी कि बगुला भगत मछलियों को मूर्ख बना रहे हैं और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की जगह उनका भक्षण कर रहे हैं.लिहाजा केकड़े ने फौरन बगुला भगत की गर्दन अपने पंजे से दबा दी, जिससे बगुला भगत छटपटा कर मर गया.यह किस्सा सुनाते हुए अंसारी साहब मुस्लिम लीग को बगुला भगत तथा मोमिन कान्फ्रेंस को केकड़े की संज्ञा देते थे.

यूं तो पूरे देश में मोमिन कांफ्रेंस ने मुस्लिम लीग को चुनौती दिया लेकिन बिहार प्रदेश में मोमिन कान्फ्रेंस का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा.पृथक निर्वाचन के तहत कुल 40 सीटें थी,जिसमें मोमिन कान्फ्रेंस ने 20 और कोंग्रेस ने 10 सीटों पर अपने अपने उम्मीदवार उतारे.

इस चुनाव में मुस्लिम लीग के विरोध वाली अन्य अशराफ पार्टियों का सूपड़ा साफ हो गया.अर्थात लगभग पूरे अशराफ वर्ग ने मुस्लिम लीग और पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया.मोमिन कान्फ्रेंस ने 6 सीटों पर कामयाबी हासिल कीऔर 11 सीटों पर द्वितीय स्थान पर रही और कांग्रेस केवल एक सीट ही जीत पाई, जबकि मुस्लिम लीग के हिस्से 33 सीटें आईं.

मोमिन कान्फ्रेंस के हाफिज मंजूर को पहले पराजित घोषित किया था, लेकिन बाद में उनकी शिकायत पर दुबारा मतगणना कराया गया जिसमें वो विजयी रहें.मुस्लिम लीग के भय के कारण हाफिज मंजूर का पोलिंग एजेंट बनने को कोई तैयार नहीं था ऐसी सूरत में एक हिन्दू नौजवान इंद्र कुमार आगे आएं और हाफिज जी के मजबूत पोलिंग एजेंट बने.

जिस पर मुस्लिम लीग ने अधिकारियों से शिकायत कीकि पृथक निर्वाचन के मुस्लिम सीट पर एक हिन्दू कैसे पोलिंग एजेंट बन सकता है.शिकायत खारिज कर दी गई.जिस पर मुस्लिम लीग ने व्यंग किया कि देखिए इनको एक मुसलमान तक पोलिंग एजेंट नहीं मिल रहा है.

गौर तलब है.जिस अशराफ वर्ग ने पाकिस्तान के समर्थन में वोट किया.उस समाज को कांग्रेस ने उसकी संख्या के अनुपात से कहीं अधिक सरकार में भागेदारी दिया.जिस पसमांदा समाज ने पूरी तरह द्विराष्ट्र सिद्धांत को नकार साधन विहीन होने के बावजूद भी चुनाव में जीत तक दर्ज किया उनका कांग्रेस के राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा उपेक्षा किया गया वो तो भला हो सरदार पटेल का जिनके प्रयास से बिहार राज्य में अब्दुल कयूम अंसारी कैबिनेट मंत्री और मुहम्मद नूर पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाए गए.

हालांकि यह पसमांदा के आबादी के हिसाब से कम प्रतिनिधित्व था लेकिन फिर भी यह एक सार्थक पहल थी.आसिम बिहारी के आंदोलन ने राष्ट्र जागरण के नाम पर मुस्लिम जमींदारों के संगठन मुस्लिम लीग का अंतिम समय तक पूरी शक्ति के साथ संघर्ष किया.

लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के पूंजीवादी नेताओ की परंपरागत समझौताबाजी ने आम लोगो के बजाय विदेशी साम्राज्यवादियों और जागीरदारों से समझौता करके जिस ऐतिहासिक अशिष्ठता का सबूत दिया है उसका फैसला आने वाली पीढ़ी करेगी.कोई भी ईमानदार इतिहासकार भारत की आजादी में आसिम बिहारी के मोमिन आंदोलन की स्वस्थ भूमिका को नजरअंदाज करने की हिम्मत नहीं कर सकता.

समाप्त…

(लेखक, अनुवादक, स्तंभकार, मीडिया पैनलिस्ट, पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता एवं पेशे से चिकित्सक हैं.यह लेखक के अपने विचार हैं)