नाजिर अली गुनमाम स्वतंत्रता सेनानी हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं दी गयी। आज उनका परिवार दर-बदर ठोकर खाने एवं मुफलिसी में जीने को मजबूर है।।

‘चौरी चौरा शताब्दी समारोह दिनांक 4 फरवरी 2021’ राजकीय अभिलेखागार संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों की सूची प्रकाशित की गई है जिनमें इनका विवरण 128 नं. पर दिया गया है- नाजिर अली पुत्र झिंगई, धुनिया, उम्र 48, बहरामपुर टोला, कुस्मही।

बहरामपुर (बहरामपुर टोला) गोरखपुर जिले के कुसम्ही क्षेत्र और चौरी-चौरा विधानसभा के अंतर्गत आने वाला एक प्रमुख ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाका है। यह कुसम्ही बाजार व जंगल क्षेत्र के पास स्थित है।

इस टोले को गोरखपुर के मियाँ साहब ने बसाया था। यहाँ ज्यादातर धुनिया परिवार के लोग हैं जिनका मूल पेशा रजाई गद्दा सिलना रहा है। लेकिन इस पेशे में काम नहीं मिलने के कारण आज ये परिवार मजदूरी कर रहे हैं या किसी दूसरे व्यवसाय में लगे हुए हैं।

चौरी-चौरा विद्रोह 225 लोगों को अभियुक्त बनाया गया। 24 मार्च 1922 को लोअर कोर्ट द्वारा 40 अभियुक्तों को रिहा कर दिया गया। 9 जनवरी, 1923 को सेशन कोर्ट द्वारा 172 अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई गई। उन्हें गोरखपुर जिला कारागार से प्रांत के विभिन्न कारागारों में स्थानांतरित कर दिया गया था।

नाजिर अली को जिला कारागार अलीगढ़ में भेजा गया था। साथ में भगवान, बीरजा, अली हसन और बद्री थे।

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने अपनी किताब ‘ चौरी चौरा विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन ‘ में लिखा है — “सेशन कोर्ट द्वारा 9 जनवरी 1923 को 172 किसानों को फांसी की सजा सुना देने पर पूरी दुनिया में उबाल आया हुआ था। वैसे समय में आजादी के संघर्ष का चोला पहनी हुई देशी शक्तियां मूक बधिर बनी रहीं। विदेशी धरती से महान वामपंथी एम.एन. राय से लेकर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल तक ने आवाज उठाई लेकिन भारत भूमि पर भूचाल नहीं आया।

आगे चलकर इसमें से 19 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। कुल 157 अभियुक्तों के बारे में जानकारी उपलब्ध हो पायी है।
नाजिर अली को जिला कारागार अलीगढ़ में भेजा गया था, जिसमें 57 लोग थे। इन्हें 5 साल तक की कैद की सजा सुनाई गई थी।

नाजिर अली की न उस समय सुधि ली गई और न ही आज इनके नाम की मूर्ति या कोई स्मारक बनाया गया। हालत ये है कि इनके परिवार के लोग भी नाजिर अली के क्रांतिकारी संघर्ष से नावाकिफ हैं।

नाजिर अली के परिवारजन

4 जनवरी 2024 को इनके परिवार से मिलना हुआ। साथ में गोरखपुर के सामाजिक कार्यकर्ता संतोष यादव भी थे। नाजिर अली के पोते बिस्मिल्ला से हमारी बात हुई। उन्होंने बताया कि नाजिर अली के दो बेटे हुए अब्दुल (सोजेदीन) और वली मुहम्मद (चिथरू) थे। अब्दुल सोजेदीन के दो पुत्र हुए बिस्मिलाह और आलम (भोला)। मेरे (बिस्मिल्लाह) दो पुत्र सलाम और कलाम हैं एक सउदी में काम करता है और दूसरा माली का काम करता है एवं पाँच पुत्रियाँ हैं- अतरुन, सजरून, तौरुन, आना और साहिना है।

बहरामपुर के हबीब मंसूरी, अलीमुद्दीन और रामनाथ ने बताया कि इस गाँव से बड़ी संख्या में लोग स्वाधीनता आंदोलन में शामिल हुए थे।

अलीमुद्दीन मंसूरी ने बताया कि यह कस्बा लगभग लगभग 100 साल पहले से है जिसे गोरखपुर के मियाँ साहब ने बसाया था। यहाँ के लोग रजाई-गद्दा तोशक तकिया तैयार करते थे।

इसी क्रम में गाँव के एक अन्य स्वतंत्रता सेनानी तपसी का भी नाम ज्ञात हुआ इनका उल्लेख 244 नं. पर इस प्रकार है-

तपसी s/o पदारथ, भर, उम्र 21, बहरामपुर टोला, कुस्मही।

चौरी चौरा के संग्राम में पसमांदा समाज ने बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी लिया था। तीन लोगों की फांसी भी हुई।

1. अब्दुल्ला उर्फ़ सुकई पुत्र गोबर, चुड़िहार, उम्र 40।

2. नजर अली, पुत्र जीअन, चुड़िहार, उम्र 30।

3. लाल मोहम्मद पुत्र हाकिम शाह, सैन।

फांसी के सजा से मुक्त हुए 225 अभियुक्तों में से पसमांदा समाज के नाम का उल्लेख इस प्रकार है-

1. बड़कू पुत्र वजीर, हज्जाम, उम्र 17, बाढ़न

2. ईदन पुत्र मोहिउद्दीन, जुलाहा, उम्र 17, बिशुनपुरा।

3. महाबत पुत्र बादल, जुलाहा, उम्र 38, डुमरी खुर्द

4. नाजिर अली पुत्र झिंगई, धुनिया, उम्र 48, बहरामपुर

5. परहु पुत्र इमामुद्दीन, जुलाहा, उम्र 60, अजोध्या चौक

6. रसूल पुत्र इलाही, जुलाहा, पिपराइच, उम्र 22

7. शहादत पुत्र बदाई, जुलाहा, उम्र 30, डुमरी खुर्द

8. बशीर पुत्र चुनरार, चकिया, चौरा।

9. तेग अली पुत्र सुक्खू जुलाहा, रकबा छावनी, चौरा।

10. दीना पुत्र इमामुद्दीन जुलाहा, बिशुनपुर गौरी।

अशफाक उल्ल खाँ ने कहा है-

शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।

अशफाक उल्ला खाँ की यह उक्ति हमारे सभी आजादी के जश्न मनाने वालों से सुनी जाती है लेकिन ऐसा समाज में घटित होता हुआ नहीं दिखाई देता है। तमाम शोधकर्ताओं एवं तरक्कीपसंद तबके को इस पर विचार करना चाहिए। हमारे आजादी के सिपाहियों की स्मृतियों को उजागर करने में जाति-पाति का भेद-भाव अक्षम्य है। सुभाष चन्द्र कुशवाहा जैसे कुछेक बुद्धिजीवी एवं साहित्यकार हैं जिन्होंने गुमनाम स्वतन्त्रता सेनानियों के इतिहास को उजागर करने का जरूर प्रशंसनीय कार्य किया है। लेकिन अभी भी हमें इससे ज्यादा करने की जरूरत है खासकर पसमांदा समाज को भी।

( इमानुद्दीन पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। सावित्रीबाई फुले जन साहित्य केन्द्र नाम से प्रकाशन भी है। वर्तमान समय में वे गोरखपुर में रहते हैं। संपर्क-मो.नं. 7071 487 233)