लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर

आज के दौर में बच्चों की तरबियत हमारे बचपन जितनी सीधी और आसान नहीं रही। मेरी पाँच साल की बेटी जब अपनी छोटी बहन के साथ बैठती है, तो खिलौनों से ज़्यादा उसका ध्यान उन चीज़ों पर होता है जो उसने यूट्यूब के वीडियोज़ में देखी हैं या जो उसके स्कूल के साथी लेकर आते हैं। एक शिक्षक की सीमित आमदनी में दो बच्चियों की परवरिश करते हुए मैं अक्सर खुद से एक सवाल पूछता हूँ। जब किसी फरमाइश पर ‘ना’ कहना पड़े, तो वह बात किस सलीके से कही जाए? वह ‘ना’ ऐसा होना चाहिए जो उसे सब्र, ज़ब्त और पैसे की कद्र तो सिखाए, लेकिन उसके खुद्दारी और एहसास-ए-कमतरी पर गुरबत का कोई ज़ख्म न छोड़े।

इस पूरी कशमकश में मुझे अक्सर अपने बचपन का एक बेहद कड़वा और जज़्बाती अनुभव याद आता है। मेरे वालिदैन भी शिक्षक थे और उनका महीने का बजट भी बहुत सीमित था। जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था, तो मेरी क्लास का एक  बच्चा स्कूल में जापानी तकनीक वाला ‘पायलट पेन’ लेकर आया। उस ज़माने में वह पेन हम जैसे बच्चों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था और उसकी कीमत भी ज़्यादा थी। उस खूबसूरत पेन को देखकर मेरा मन मचल गया और मैंने घर आते ही अपनी अम्मी से ज़िद पकड़ ली कि मुझे वही पेन चाहिए। मेरी अम्मी मुझे हकीकत समझाने के बजाय उस वक्त टालने के अंदाज़ में प्यार से कह दिया कि बेटा, अभी घर में पैसे नहीं हैं, लेकिन जैसे ही सरकार से तनख्वाह आएगी, हम तुम्हें वह पेन ज़रूर दिला देंगे।

उस नन्हीं उम्र में मुझे ‘तनख्वाह’ या बजट का कोई हिसाब-किताब समझ नहीं आता था। मेरे मासूम ज़ेहन में बस यह बात पक्की हो गई कि जिस दिन सरकार अम्मी-अब्बू को पैसा भेजेगी, उसी दिन मुझे वह शानदार पायलट पेन मिल जाएगा। मैं पूरे यकीन और फख्र के साथ रोज़ स्कूल में अपने दोस्तों से कहता रहा कि अभी हमारे घर में पैसे नहीं हैं, लेकिन बहुत जल्द सरकार पैसे देगी और मेरे पास भी पायलट पेन होगा। इस झूठी उम्मीद के सहारे दिन, हफ्ते और महीने गुज़रते गए और देखते ही देखते पूरा एक साल बीत गया। एक दिन मेरे दोस्तों ने मिलकर मेरा मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया कि सरकार ने अभी तक इसके घर पैसे नहीं दी है। उस दिन पहली बार मेरे नन्हे ज़ेहन पर एक गहरी चोट लगी। मेरे अंदर यह एहसास-ए-कमतरी घर कर गई कि मेरा घराना बहुत तंगहाल है और मैं अपने बाकी साथियों के मुकाबले गरीब हूँ। उस एक वाकये ने बरसों तक मेरे एतमाद को दबाए रखा।

आज जब मैं खुद दो बेटियों का बाप और एक शिक्षक हूँ, तो मैं समझता हूँ कि उस दिन मेरी अम्मी की नीयत में कोई खोट नहीं था। वे बस अपने बच्चे का दिल नहीं तोड़ना चाहती थीं और उस घड़ी की परेशानी से बचना चाहती थीं। लेकिन किसी बच्चे को झूठी उम्मीद देकर अनिश्चित इंतज़ार में रखना और ‘लाचारी की ज़बान’ बोलना उसकी खुद्दारी के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होता है। माँ  बाप को यह समझना होगा कि बच्चे को टालने के लिए झूठी तसल्ली देने से कहीं बेहतर है कि उसे एक साफ, संजीदा और बा-वक़ार हद समझाई जाए। जब हम बच्चे से कहते हैं कि ‘हमारे पास पैसे नहीं हैं’, तो बच्चा बेबस और डरा हुआ महसूस करता है। इसके विपरीत, जब हम आत्मविश्वास से कहते हैं कि ‘यह चीज़ बहुत अच्छी है लेकिन यह हमारे इस महीने के प्लान में शामिल नहीं है’, तो बच्चे को यह भरोसा मिलता है कि उसके माता-पिता सक्षम हैं और वे सोच-समझकर अपने फैसले ले रहे हैं।

बाल मनोविज्ञान और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के आधुनिक शोध यह साबित करते हैं कि तीन से सात साल की उम्र के बीच बच्चों की आर्थिक आदतें, आत्म-नियंत्रण और पैसे के प्रति दृष्टिकोण तय होने लगता है। विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी का अध्ययन बताता है कि तीन साल का बच्चा भी लेन-देन और मूल्य के अंतर को समझने की संज्ञानात्मक क्षमता रखता है। इसलिए इस उम्र में बच्चों को जटिल वित्तीय आंकड़े सिखाने के बजाय ‘ज़रूरत’ और ‘चाहत’ के बुनियादी अंतर को सिखाना सबसे जरूरी है। इसलिए इस उम्र में बच्चों को पेचीदा आंकड़े सिखाने के बजाय ‘ज़रूरत’ और ‘ख्वाहिश’ के बुनियादी फर्क की पहचान कराना सबसे लाज़मी है। जब भी आप अपनी बेटियों के साथ बाज़ार या दुकान पर जाएं, तो इसे एक दिलचस्प खेल बना लें। उन्हें समझाएं कि दूध, ताज़ा फल, सब्ज़ियाँ, दाल-चावल और स्कूल की कॉपियाँ हमारी बुनियादी ज़रूरतें हैं, क्योंकि इनके बिना सेहत और ज़िंदगी नहीं चल सकती। वहीं दूसरी तरफ, पैकेट वाले चिप्स, टॉफियाँ और हर हफ्ते नए खिलौने हमारी महज़ ख्वाहिशें हैं। बच्चों को यह उसूल साफ होना चाहिए कि घर में पहले ज़रूरतों को पूरा किया जाता है, और जब गुंजाइश बचती है, तब कभी-कभार हम अपनी ख्वाहिशों को पूरा करते हैं।

आज के दौर में बच्चों की बेहिसाब फरमाइशों की सबसे बड़ी वजह यूट्यूब, कार्टून और सोशल मीडिया का असर है। बच्चे स्क्रीन पर दिखने वाले अनबॉक्सिंग वीडियोज़ और इश्तिहारों को ही अपनी असली दुनिया समझ बैठते हैं। बतौर अभिभावक हमारा यह फ़र्ज़ है कि हम बच्चों को यह समझाएं कि स्क्रीन पर दिखने वाली चमक-दमक दरअसल चीज़ें बेचने के लिए बनाई गई एक दुकान है, वह किसी की हकीकी ज़िंदगी नहीं है। जब भी आपकी बेटी स्क्रीन देखकर किसी नए खिलौने की ज़िद करे, तो उस पर गुस्सा करने या फौरन बाज़ार दौड़ने के बजाय घर में ‘विश-लिस्ट डायरी’ का तरीका अपनाएं। उससे कहें कि इस खिलौने का नाम हम अपनी डायरी में दर्ज कर लेते हैं। अगर अगले एक हफ्ते या दस दिन तक भी तुम्हें यह खिलौना उतना ही पसंद रहा, तो हम इस पर संजीदगी से सोचेंगे। प्रसिद्ध ‘मार्शमैलो प्रयोग’ यह सिखाता है कि जो बच्चे अपनी तात्कालिक इच्छा पर नियंत्रण रखना यानी सब्र करना सीख जाते हैं, वे बड़े होकर अधिक सफल, खुशहाल और आर्थिक रूप से अनुशासित नागरिक बनते हैं। मनोविज्ञान के अनुसार, अधिकांश मामलों में बच्चे दो से तीन दिन बाद उस खिलौने के आकर्षण को पूरी तरह भूल जाते हैं।

अगला कदम जो हम अपनी बेटियों के लिए आने वाले वक्त में उठाने जा रहे हैं, वह है पैसे की असली कीमत समझाने के लिए घर में पारदर्शी यानी आर-पार दिखने वाले डिब्बों का ‘तीन-जार नियम’ शुरू करना। यह बहुत ही आसान और असरदार तरीका है। हम अपनी दोनों बेटियों के लिए प्लास्टिक या शीशे के तीन डिब्बे रखेंगे पहला रोज़मर्रा के छोटे खर्च के लिए, दूसरा बचत यानी सेविंग के लिए, और तीसरा दूसरों की मदद या साझा करने के लिए। जब भी त्योहारों पर या रिश्तेदारों से उन्हें प्यार या ईदी के पैसे मिलेंगे, तो हम उन पैसों को इन तीनों डिब्बों में बराबर बँटवाएंगे। पारदर्शी डिब्बे में धीरे-धीरे जमा होते सिक्कों को देखकर बच्ची को अपनी आँखों से यह समझ आएगा कि बचत कोई हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि यह सब्र और लगन से धीरे-धीरे बढ़ने वाली चीज़ है। ​इस पूरी तरकीब में सबसे खास ‘मदद वाला डिब्बा’ है। इस डिब्बे में जमा पैसों से हम अपनी बच्चियों को किसी ज़रूरतमंद बच्चे के लिए पेंसिल, रंग या खाने की कोई चीज़ दिलाने के लिए कहेंगे। जब एक सीमित आमदनी वाले परिवार का बच्चा किसी दूसरे की मदद करता है, तो उसके दिल से तंगी और गरीबी का डर हमेशा के लिए गायब हो जाता है। उसे अंदर से यह सच्चा फख्र और हौसला मिलता है कि हमारे पास इतना तो ज़रूर है कि हम दूसरों के साथ भी अपनी खुशियाँ बाँट सकते हैं।

यहाँ एक और गंभीर बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि कभी भी घर के रोज़ के कामों या पढ़ाई के बदले बच्चों को पैसे देने की गलती न करें। हार्वर्ड और मिनेसोटा यूनिवर्सिटी की कई रिसर्च बताती हैं कि अपने खिलौने समेटने, अपनी थाली सही जगह रखने, बिस्तर ठीक करने या परीक्षा में अच्छे नंबर लाने के लिए बच्चों को पैसे देना उनकी अंदर की लगन को खत्म कर देता है। परिवार कोई बाज़ार नहीं है जहाँ हर छोटी मदद की कीमत लगाई जाए। बच्चों के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठनी चाहिए कि वे इस परिवार रूपी टीम के बराबर के हिस्सेदार हैं और घर की व्यवस्था में हाथ बंटाना उनका स्वाभाविक फ़र्ज़ है। अच्छे काम और मेहनत की तारीफ़ हमेशा अपनी बातों, दुआओं और प्यार से की जानी चाहिए, न कि नकद रुपयों से। जब घर में दो बहनें होती हैं, तो चीज़ों के बँटवारे और प्राथमिकताओं की समझ देना और भी आसान हो जाता है। उन्हें यह सिखाना ज़रूरी है कि दोनों के लिए सब कुछ एक ही वक्त पर खरीद पाना मुमकिन नहीं होता, लेकिन दोनों की सही ज़रूरतों को बारी-बारी से और पूरी निष्पक्षता के साथ पूरा किया जाएगा।

माता-पिता को अपनी आर्थिक तंगी, क़र्ज़ या तनख्वाह के सही हिसाब-किताब की चर्चा कभी भी छोटे बच्चों के सामने नहीं करनी चाहिए। पाँच साल के बच्चे के पास हज़ारों या लाखों के हिसाब को समझने की कोई समझ नहीं होती, लेकिन वे अपने माँ-बाप के चेहरे की चिंता और घर में होने वाली पैसों की बहसों को फौरन भांप लेते हैं। जब भी आपकी बेटी अपने किसी अमीर दोस्त के बड़े मकान या महँगी गाड़ी से अपनी तुलना करे, तो उसे समझाएं कि हर परिवार के जीने के तौर-तरीके और प्राथमिकताएं अलग होती हैं। हमारे परिवार की प्राथमिकता हमारी शिक्षा, किताबें, आपस का प्यार और साथ बिताया हुआ वक्त है। पैसे का महत्व ज़िंदगी में कभी कम नहीं होता; यह अच्छी सेहत, तालीम, सुरक्षा और बुनियादी ज़रूरतों के लिए बेहद ज़रूरी साधन है। लेकिन जीवन की असली गुणवत्ता (Quality of Life) सिर्फ़ इस बात से तय नहीं होती कि बैंक में कितना पैसा है, बल्कि इस बात से तय होती है कि हम उस पैसे का इस्तेमाल किस समझदारी से करते हैं। जब माता-पिता गरिमा, सब्र और अनुशासन के साथ सीमित साधनों में भी बेहतर तालीम, साफ़-सुथरे माहौल और अच्छी आदतों को चुनते हैं, तो बच्चे यह समझ जाते हैं कि पैसे का मक़सद दिखावा नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक और गरिमापूर्ण बनाना है।

अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।