लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
दक्षिण एशिया में मुसलमानों की राजनीति के इतिहास को जब भी देखा जाता है, तो ‘आइडिया ऑफ पाकिस्तान’ यानी पाकिस्तान के विचार को अक्सर एक ऐसी घटना की तरह पेश किया जाता है जो अपने आप होनी ही थी। लेकिन अगर हम एक पसमांदा चिंतक और शोषित मुस्लिम जातियों के नज़रिए से इसे देखें, तो यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि पाकिस्तान का निर्माण किसी आम जनता का आंदोलन नहीं था। असल में यह मुस्लिम समाज के उच्च वर्ग, जिसे अशराफ़ एलीट कहा जाता है, उसके अपने सियासी, सामाजिक और आर्थिक फायदों को बचाने का एक सोचा-समझा उपक्रम था। इस पूरी राजनीति की सबसे चिंताजनक बात यह रही कि सैयद, शेख, मुग़ल और पठान जैसे अशराफ़ तबके के नेताओं ने अपने वर्गीय और जातिगत स्वार्थों जैसे सरकारी नौकरियों में एकाधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के कोटे और ज़मींदारी अधिकारों की सुरक्षा को छिपाने के लिए इस्लाम धर्म का सहारा लिया। बहुसंख्यक पसमांदा समाज, जिसमें पिछड़े, दलित और कारीगर तबके के मुसलमान आते हैं, उनके दिलों में यह झूठा डर बैठाया गया कि उनका धर्म और पहचान खतरे में है। इस डर का इस्तेमाल करके पसमांदा मुसलमानों को अशराफ़ राजनीति के ईंधन की तरह इस्तेमाल किया गया। इस ऐतिहासिक भटकाव और सियासी धोखे की जड़ें कहाँ थीं, इसे समझने के लिए हमें उस दौर का अध्ययन करना होगा जहाँ से भारतीय मुस्लिम राजनीति का रास्ता पूरी तरह बदल गया था। पाकिस्तान के प्रसिद्ध समाजशास्त्री हमज़ा अलवी के मशहूर शोध-निबंध ‘आयरनीज़ ऑफ हिस्ट्री: कॉन्ट्रैडिक्शन्स ऑफ द खिलाफत मूवमेंट’ से यह साफ जाहिर होता है कि 1919 से 1924 के बीच चला खिलाफत आंदोलन ही वह पहला बड़ा ऐतिहासिक मोड़ था, जिसने आगे चलकर पाकिस्तान के विचार की वैचारिक और दिमागी ज़मीन तैयार की थी।
यहाँ इस ऐतिहासिक सच्चाई को भी बेबाकी से समझना होगा कि भारतीय राजनीति में उस समय दो मुख्य धाराएँ दिखाई दे रही थीं। एक तरफ कांग्रेस के भीतर मौजूद तथाकथित ‘राष्ट्रवादी अशराफ़’ (जैसे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अली बंधु) और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग के ‘अलगाववादी अशराफ़’ (जैसे मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली खान)। ऊपरी तौर पर ये दोनों खेमे एक-दूसरे के धुर विरोधी नज़र आते थे, लेकिन वर्ग-चरित्र और सामाजिक आधार के मामले में दोनों का डीएनए एक ही था। दोनों ही खेमे अशराफ़ उच्च वर्ग के उस संभ्रांत तबके से आते थे जिनका आम पसमांदा समाज के दैनिक संघर्षों, जातिगत अपमान और भुखमरी से कोई वास्तविक वास्ता नहीं था। दोनों ही धाराओं ने अपने-अपने तरीके से पसमांदा मुसलमानों को केवल एक ‘धार्मिक भीड़’ और ‘वोट-बैंक’ के रूप में इस्तेमाल किया। किसी भी अशराफ़ खेमे ने पसमांदा समाज को सत्ता की हिस्सेदारी, नीति-निर्माण और सामाजिक बराबरी देने का कभी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।
खिलाफत आंदोलन शुरू होने से पहले भारत के मुसलमानों की राजनीति का मिज़ाज बिल्कुल अलग और काफी हद तक धर्मनिरपेक्ष था। उस दौर में राजनीति का केंद्र मुख्य रूप से संयुक्त प्रांत (यूपी), बिहार और पंजाब के पढ़े-लिखे अशराफ़ मुसलमानों तक सीमित था। 1916 के ऐतिहासिक लखनऊ समझौते के समय तक ऑल इंडिया मुस्लिम लीग केवल सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पृथक निर्वाचन जैसी संवैधानिक मांगों के इर्द-गिर्द काम कर रही थी।
मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर इश्तियाक़ अहमद अपनी किताब ‘जिन्ना: हिज़ सक्सेसेज़, फेलियर्स एंड रोल इन हिस्ट्री’ में लिखते हैं कि उस ज़माने में मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नेता एक कानून-पसंद और उदारवादी राजनीति कर रहे थे। साल 1915 के बंबई अधिवेशन में जिन्ना के ही खास प्रयासों से मुस्लिम लीग और कांग्रेस के सालाना जलसे एक साथ एक ही जगह आयोजित किए गए थे। उस बैठक की अध्यक्षता मजहरुल हक कर रहे थे, जो पृथक निर्वाचन के सख्त खिलाफ थे और कांग्रेस के साथ निकट सहयोग के पक्षधर थे। इस शुरुआती दौर तक मस्जिद और मदरसों के पारंपरिक धार्मिक मौलवियों यानी उलेमा का मुख्यधारा की राजनीति में कोई सीधा दखल या असर नहीं था।

लेकिन पहले विश्व युद्ध के बाद हालात तेजी से बदलने लगे। जब 1918 में युद्ध खत्म हुआ और यह तय हो गया कि ब्रिटेन और उसके साथी देश तुर्की के विशाल उस्मानी साम्राज्य को तोड़कर खत्म करने जा रहे हैं, तो भारतीय मुसलमानों में बेचैनी फैल गई। सुन्नी मुसलमान तुर्की के उस्मानी सुल्तान को रस्म के तौर पर अपना खलीफा यानी पूरी दुनिया के मुसलमानों का मुखिया मानते थे। हकीकत यह थी कि उन्नीसवीं सदी में बाल्कन की लड़ाइयों में लगातार हारने के बाद उस्मानी सल्तनत बिल्कुल खोखली हो चुकी थी और उसे यूरोप में ‘यूरोप का बीमार आदमी’ कहा जाता था। अपनी गिरती ताकत के बावजूद तुर्की के युद्ध मंत्री अनवर पाशा ने अपने देश को जर्मनी की तरफ से ब्रिटेन के खिलाफ जंग में झोंक दिया था। भारत में जब जंग के बाद उस्मानी सल्तनत पर संकट आया, तो मौलाना मोहम्मद अली, शौकत अली और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे आधुनिक पढ़े-लिखे अशराफ़ नेताओं ने इस विदेशी मुद्दे को भारतीय राजनीति के बिल्कुल बीच में लाकर खड़ा कर दिया। खिलाफत आंदोलन के नेताओं ने पूरे देश में यह बात फैला दी कि तुर्की का सुल्तान ही दुनिया के तमाम मुसलमानों का अकेला खलीफा है और यह कोई मामूली जंग नहीं, बल्कि इस्लाम और ईसाइयत के बीच का एक बहुत बड़ा मजहबी टकराव है। उन्होंने यह भी प्रचारित किया कि अंग्रेजों ने खलीफा को इस्तांबुल में कैदी बना रखा है और अगर खलीफा नहीं बचा, तो इस्लाम भी खतरे में पड़ जाएगा।
अगर हम ऐतिहासिक दस्तावेजों की रोशनी में देखें, तो उस्मानी सुल्तानों का पूरी दुनिया की खिलाफत का यह दावा खुद एक झूठी और मनगढ़ंत कहानी पर टिका हुआ था। हमज़ा अलवी अपने शोध में बताते हैं कि उस्मानी हुकूमत ने उन्नीसवीं सदी में यह फर्जी कहानी फैलाई थी कि 1517 ईस्वी में मिस्र के अंतिम अब्बासी खलीफा मुतवक्किल ने अपनी मर्जी से सुल्तान सलीम प्रथम को खिलाफत की गद्दी सौंपी थी। आज के आधुनिक इतिहासकार इस बात को पूरी तरह खारिज करते हैं, क्योंकि मुतवक्किल उस समय मिस्र के ममलुक सुल्तानों का एक मजबूर और लाचार कैदी था, जिसके पास न तो कोई अपनी ज़मीन थी और न ही किसी को खलीफा बनाने का कोई कानूनी हक। इतना ही नहीं, 1517 के बाद ढाई सौ सालों तक किसी भी उस्मानी सुल्तान ने खुद को आधिकारिक तौर पर खलीफा नहीं कहा था। पहली बार 1774 ईस्वी में रूस के साथ हुई ‘कुचुक कैनार्जी की संधि’ के दौरान उस्मानी प्रतिनिधियों ने एक कूटनीतिक चाल के तौर पर यह दावा किया था, ताकि रूस के ईसाई ज़ार के सामने वे रूसी इलाकों के मुसलमानों के मजहबी रहनुमा बन सकें। बाद में उन्नीसवीं सदी में खुद ब्रिटिश साम्राज्य ने भी इस दावे को खूब बढ़ावा दिया, क्योंकि अंग्रेजों को लगता था कि अगर भारतीय मुसलमान तुर्की के सुल्तान को अपना खलीफा मानेंगे, तो सुल्तान के जरिए भारत के करोड़ों मुसलमानों को आसानी से काबू में रखा जा सकेगा। इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखने को मिला। जब भारत में हिंदू और मुसलमान मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की हुकूमत के खिलाफ हथियार उठा रहे थे, तब अंग्रेजों ने कूटनीतिक चाल चलते हुए उस्मानी खलीफा सुल्तान अब्दुल मजीद प्रथम से संपर्क साधा। अंग्रेजों के अनुरोध पर खलीफा ने एक आधिकारिक ‘फरमान’ जारी किया, जिसमें भारतीय मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ बगावत न करने, विद्रोह से दूर रहने और ब्रिटिश हुकूमत के प्रति वफादार रहने का हुक्म दिया गया था। इस फरमान को भारत की प्रमुख मस्जिदों में पढ़वाया और प्रचारित कराया गया ताकि मुसलमानों के भीतर उठ रही आजादी और बगावत की भावना को धर्म के नाम पर कुचला जा सके।
इतना ही नहीं, 1867 में जब उस्मानी सुल्तान अब्दुल अज़ीज़ ने लंदन का शाही दौरा किया, तो ब्रिटिश हुकूमत ने उनका अभूतपूर्व और भव्य स्वागत किया। अंग्रेजों ने इस पूरे राजकीय आयोजन का भारी-भरकम खर्च भारत के खजाने से वसूला और यह दलील दी कि खलीफा का यह सम्मान भारत की मुस्लिम प्रजा को ब्रिटिश ताज के प्रति वफादार बनाए रखने के लिए जरूरी है। इससे पहले 1798 में भी जब टीपू सुल्तान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे, तब लॉर्ड वेलेस्ली के कहने पर उस्मानी खलीफा ने टीपू सुल्तान को पत्र लिखकर अंग्रेजों से युद्ध न करने की सलाह दी थी। ये सभी ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करते हैं कि अंग्रेजों ने अपनी औपनिवेशिक सत्ता को मजबूत करने और भारतीय अवाम के प्रतिरोध को कमजोर करने के लिए ही खिलाफत के विचार और उस्मानी प्रभाव का एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था।
1850 के बाद जब भारत में नस्तलीक़ छपाई के लिए सस्ती उर्दू लीथोग्राफिक प्रेस (Lithographic Press) और रोटरी मशीनों का विस्तार हुआ, तो अखबारों और प्रकाशकों ने अपनी लोकप्रियता और बिक्री बढ़ाने के लिए तुर्की व खिलाफत की इस भावुक कहानी को भारतीय मुसलमानों के ज़ेहन में गहराई से उतार दिया। इस दौर में मुंशी नवल किशोर प्रेस (लखनऊ) और मतबा-ए-मुजतबाई (दिल्ली) जैसे बड़े प्रिंटिंग प्रेसों ने पैन-इस्लामिक और तुर्की-समर्थक साहित्य को बहुत सस्ते दामों पर घर-घर पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
प्रसिद्ध लेखक मौलाना शिब्ली नोमानी ने अपनी चर्चित यात्रा-वृत्तांत पुस्तक ‘सफ़रनामा-ए-रोम-ओ-मिस्र-ओ-शाम’ (1894) में उस्मानी तुर्की का बेहद महिमामंडित और भावुक चित्रण किया, जिसने पढ़े-लिखे अशराफ़ और शहरी मध्यम वर्ग को तुर्की की सल्तनत के प्रति मानसिक रूप से जोड़ दिया। इसी तरह, मौलवी अब्दुल हलीम ‘शरार’ ने अपने ऐतिहासिक उपन्यासों जैसे ‘मलिकुल अज़ीज़ वर्जिना’ और ‘फ़िरदौस-ए-बरीं’ तथा अपनी पत्रिका ‘दिलगुदाज़’ के माध्यम से इस्लामी अतीत और खिलाफत के दौर की एक काल्पनिक रूमानी तस्वीर पेश की। अखबारों के स्तर पर, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के कलकत्ता से निकलने वाले उर्दू साप्ताहिक ‘अल-हिलाल’ (Al-Hilal) और ‘अल-बलाग़’, मौलाना ज़फ़र अली ख़ान के लाहौर से प्रकाशित ‘ज़मींदार’ (Zamindar), तथा मौलाना मोहम्मद अली जौहर के अखबार ‘हमदर्द’ और अंग्रेजी पत्र ‘द कॉमरेड’ (The Comrade) ने लीथोग्राफिक प्रेस की तकनीकी सुलभता का पूरा फायदा उठाया। इन अखबारों ने बाल्कन युद्धों और तुर्की के संकट को ‘इस्लाम पर ईसाइयत का हमला’ बताकर अत्यंत आलंकारिक, उत्तेजक और भावुक भाषा में छापा। इस व्यापक और संगठित प्रोपेगैंडा के कारण भारत का आम और अशिक्षित मुसलमान बिना किसी ऐतिहासिक जांच-पड़ताल के तुर्की के पतनशील साम्राज्य को अपनी धार्मिक अस्मिता का केंद्र मान बैठा।

इस आंदोलन के दौरान ‘खलीफा’ शब्द के असली मतलब और उसके इतिहास को भी पूरी तरह तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। अरबी ज़बान में खलीफा शब्द ‘ख-ल-फ’ से निकला है, जिसका सीधा मतलब केवल ‘पीछे आने वाला’ या किसी के बाद उसका ‘उत्तराधिकारी’ होना होता है। पैगंबर हज़रत मोहम्मद के बाद जब पहले चार ख़लीफ़ाओं (हज़रत अबू बक्र, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान और हज़रत अली) का दौर था, तब खलीफा सिर्फ एक चुना हुआ प्रशासनिक और दुनियावी प्रमुख होता था, जिसके पास कोई ईश्वरीय शक्ति या ईसाई पोप जैसा आध्यात्मिक दर्जा नहीं था। लेकिन बाद में जब उमय्यद और अब्बासी खानदानों ने राजशाही कायम की, तो मौलाना मौदूदी के शब्दों में यह इस्लामी व्यवस्था के खिलाफ एक ‘विपरीत क्रांति’ थी। शासकों ने अपनी निरंकुश तानाशाही को धर्म का चोला पहनाने के लिए खुद को ‘खलीफतउल्लाह’ यानी ‘ज़मीन पर खुदा का नुमाइंदा’ और ‘ज़िल-अल्लाह’ (ईश्वर की छाया) कहना शुरू कर दिया। मशहूर इस्लामी विद्वान अल-मावर्दी ने उस दौर में भी इसका विरोध किया था और कहा था कि खुदा का कोई खलीफा नहीं हो सकता। सर सैयद अहमद ख़ान खुले तौर पर ब्रिटिश हुकूमत के हिमायती और वफ़ादार थे, और उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेज़ी राज का निष्ठावान बनाने के लिए ‘यूनाइटेड इंडियन पैट्रियॉटिक एसोसिएशन’ (United Indian Patriotic Association – 1888) और ‘मुहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल डिफेंस एसोसिएशन’ (Muhammadan Anglo-Oriental Defence Association – 1893) जैसे संगठनों की स्थापना की थी। उनका स्पष्ट तर्क था कि खलीफा का हुक्म केवल उसी ज़मीन पर चल सकता है जहाँ उसकी अपनी वास्तविक और प्रत्यक्ष हुकूमत हो; चूंकि भारत के मुसलमान ब्रिटिश राज के अधीन और उसकी प्रजा हैं, इसलिए तुर्की का उस्मानी सुल्तान किसी भी सूरत में उनका धार्मिक या राजनीतिक खलीफा नहीं हो सकता।
इसके विपरीत मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी भारी-भरकम और लच्छेदार उर्दू तकरीरों तथा फतवों के ज़रिए ‘खलीफा’ और ‘इमाम’ को मिलाकर एक कट्टर धार्मिक ढांचा तैयार कर दिया। 1920 में मौलाना आज़ाद ने बाकायदा ‘मसला-ए-खिलाफत व जज़ीरतुल अरब’ (Masala-e-Khilafat wa Jazirat-ul-Arab) जैसी विस्तृत किताब और धार्मिक दस्तावेज़ पेश किया, जिसमें उन्होंने कुरान और हदीस की चुनिंदा आयतों की व्याख्या करते हुए यह फतवा जारी किया कि खिलाफत को बचाना और उस्मानी सुल्तान की इताअत (आज्ञा पालन) करना हर मुसलमान का फर्ज़-ए-ऐन (अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य) है।
इसी कड़ी में आज़ाद ने अपना बहुचर्चित ‘फतवा-ए-हिजरत’ भी जारी किया, जिसमें उन्होंने हिंदुस्तान को ‘दारुल हरब’ करार देते हुए फतवा दिया कि जो मुसलमान भारत में अंग्रेजों के मातहत रह रहे हैं, उनका यहाँ सांस लेना भी गुनाह है और उन्हें दारुल इस्लाम (अफगानिस्तान) की ओर हिजरत कर जाना चाहिए। आज़ाद ने अपने साप्ताहिक ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाग़’ के ज़रिए भी इसी धार्मिक व्यवस्था को लगातार बढ़ावा दिया और खुद को भारत के मुसलमानों का ‘इमाम-उल-हिंद’ (सर्वोच्च मजहबी रहनुमा) स्थापित करने का प्रयास किया। इतिहासकार बॉसवर्थ के अनुसार इतिहास में एक ही समय में कम से कम 82 अलग-अलग खिलाफतें मौजूद रही थीं, लेकिन आज़ाद ने इस सच्चाई को पूरी तरह दरकिनार करके जनता के सामने एक काल्पनिक वैश्विक खिलाफत का सपना पेश किया और अपने फतवों से आम मुसलमानों को अंध-आस्था के रास्ते पर धकेल दिया।

खिलाफत आंदोलन के अंदर कई गंभीर अंतर्विरोध और दोहरे मापदंड मौजूद थे, जिन्हें उस समय जानबूझकर छिपाया गया। भारत के बहुसंख्यक सूफी और बरेलवी उलेमा ने शास्त्रीय इस्लामी नियमों का हवाला देते हुए तुर्की के सुल्तान को खलीफा मानने से इनकार कर दिया था। उनका कहना था कि हदीस और इस्लामी कानून के मुताबिक खलीफा का ‘कुरैश’ कबीले से होना ज़रूरी है, जबकि तुर्क लोग कुरैशी नहीं थे। प्रोफेसर इश्तियाक़ अहमद अपनी किताब में बताते हैं कि मौलाना अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने इस बारे में साफ फतवा दिया था कि उस्मानी शासक कुरैशी न होने के कारण खलीफा नहीं बन सकते, जिसके कारण पंजाब के ग्रामीण इलाकों में अंग्रेजों की फौज में भर्ती बिना किसी रुकावट के चलती रही। दूसरी तरफ क़ादियान के अहमदिया समुदाय ने तुर्की की हार पर खुशियाँ मनाईं क्योंकि वे अपने नेता मिर्ज़ा बशीरुद्दीन महमूद अहमद को खलीफा मानते थे। 1919 में मौलाना अब्दुल बारी ने जब यह फतवा दिया कि आज के ज़माने में खलीफा के लिए कुरैशी होना ज़रूरी नहीं है, तो कई बड़े देवबंदी मौलवियों ने भी उस पर दस्तखत करने से मना कर दिया था। लेकिन खिलाफत के अशराफ़ नेताओं ने आम जनता के बड़े हिस्से की इन बातों को पूरी तरह अनसुना कर दिया और अपने सियासी फायदे के लिए आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे।
इस आंदोलन का एक और बड़ा दोहरापन अरब देशों की आज़ादी को लेकर देखने को मिला। उस्मानी सुल्तानों ने सदियों से अरब देशों जैसे सीरिया, इराक, फिलिस्तीन और हिजाज़ पर अपना औपनिवेशिक कब्जा जमा रखा था और वहाँ की जनता पर जुल्म ढाते थे। जब पहले विश्व युद्ध के दौरान अरब मुसलमानों ने अपनी आज़ादी के लिए तुर्की के खिलाफ ‘अरब विद्रोह’ शुरू किया, तो भारत के खिलाफत नेताओं ने अरबों की आज़ादी का समर्थन करने के बजाय अंग्रेजों से यह मांग की कि अरबों पर तुर्की का पुराना कब्जा दोबारा बहाल किया जाए। एक तरफ भारत में अंग्रेजों से आज़ादी मांगना और दूसरी तरफ अरब मुसलमानों को तुर्कों का गुलाम बनाए रखने की वकालत करना, यह खिलाफत आंदोलन के नेताओं के छद्म साम्राज्यवाद-विरोधी चेहरे को बेनकाब करता है। इसके अलावा भारतीय नेता तुर्की के असली हालात से भी पूरी तरह अनजान थे। तुर्की का सुल्तान अंग्रेजों का कैदी नहीं था, बल्कि वह अपनी गद्दी बचाने के लिए अंग्रेजों का सबसे वफादार मददगार बन चुका था। असली जंग तो सुल्तान और मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में लड़ रहे देशभक्त तुर्की राष्ट्रवादियों के बीच थी। 16 मार्च 1920 को ब्रिटिश फौज ने इस्तांबुल पर कब्जा ही इसलिए किया था ताकि वे कमाल के राष्ट्रवादियों को दबा सकें और सुल्तान की रक्षा कर सकें। सुल्तान के मुख्य मुफ्ती अब्दुल्ला आफ़ंदी ने तो मुस्तफा कमाल को विद्रोही बताकर उनके कत्ल का फतवा तक जारी कर दिया था और अंग्रेजों की मदद से ‘कुवा-इ-इन्दिबातिया’ नामक सेना बनाई थी। कमाल ने 1927 के अपने भाषण में उजागर किया कि सुल्तान और वज़ीर-ए-आज़म दामाद फ़रीद पाशा ‘फ्रेंड्स ऑफ इंग्लैंड सोसाइटी’ बनाकर राष्ट्रवादियों के खिलाफ साजिश रच रहे थे। लेकिन भारत के खिलाफत नेता एक ही समय में कमाल पाशा को ‘गाज़ी’ भी कह रहे थे और अंग्रेजों के पिट्ठू बन चुके सुल्तान-खलीफा की शान में कसीदे भी पढ़ रहे थे। आखिरकार मार्च 1924 में मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की की संसद से कानून पास करवाकर खिलाफत को हमेशा के लिए खत्म कर दिया, मदरसों पर पाबंदी लगाई, शरीयत कानून हटाए और तुर्की को एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष मुल्क बना दिया।
पाकिस्तानी इतिहासकार डॉ. मुबारक अली अपने मशहूर लेख ‘खिलाफत आंदोलन: राजनीति का इस्लामीकरण’ में लिखते हैं कि इस पूरे आंदोलन ने भारतीय मुसलमानों के सोचने-समझने के राजनीतिक तरीके को पूरी तरह बर्बाद कर दिया। तर्क और असल मुद्दों पर बात करने के बजाय हर सियासी बात को मजहब के तराजू में तौला जाने लगा। इसके नतीजे में मौलवियों का असर बहुत बढ़ गया और ‘जमियत उलेमा-ए-हिंद’ जैसी तंजीमों ने उस अंग्रेजी-पढ़े लिखे मुस्लिम नेतृत्व को किनारे कर दिया जो कानून और संविधान की भाषा बोलता था। दिसंबर 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में जब महात्मा गांधी ने खिलाफत के मजहबी मुद्दे को असहयोग आंदोलन के साथ मिलाकर पेश किया, तो मोहम्मद अली जिन्ना ने साफ चेतावनी दी थी कि राजनीति में मौलवियों और मजहबी नारों को लाना पूरे मुस्लिम समाज के लिए बहुत खतरनाक साबित होगा। खिलाफत आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने तुर्की पर अपनी शर्तें थोपीं, तो भारत के अशराफ़ और उलेमा नेतृत्व ने एक बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक कदम उठाया। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना अब्दुल बारी और अली बंधुओं के असर में आकर पूरे हिंदुस्तान को ‘दारुल हरब’ यानी जंग का मुल्क घोषित कर दिया गया और यह फतवा जारी हुआ कि काफिरों के राज में रहना गुनाह है, इसलिए सच्चे मुसलमानों को किसी इस्लामी मुल्क यानी ‘दारुल इस्लाम’ में हिजरत (पलायन) कर जाना चाहिए। इसी मजहबी पागलपन के दौर में मौलाना मोहम्मद अली ने भारत पर हमला करने के लिए अफगानिस्तान के अमीर को दावत तक दे डाली, जिसका महात्मा गांधी ने भी अपने बयानों में यह कहकर समर्थन किया कि अगर अमीर अंग्रेजों के खिलाफ आते हैं तो वे उनका साथ देंगे। इस फतवे ने देश के पश्चिमोत्तर इलाकों में एक भयानक हिस्टीरिया पैदा कर दिया।
प्रसिद्ध शोधकर्ता डीट्रिच रीट्ज़ अपनी प्रामाणिक किताब ‘हिजरत: द फ्लाइट ऑफ द फेथफुल – अ ब्रिटिश फाइल ऑन द एक्सोडस ऑफ मुस्लिम पेजेंट्स फ्रॉम नॉर्थ इंडिया टू अफगानिस्तान इन 1920’ में इस दर्दनाक पलायन का रोंगटे खड़े करने वाला ब्यौरा देते हैं। रीट्ज़ के दस्तावेजों और ब्रिटिश रिकॉर्ड के अनुसार, इस फतवे के बहकावे में आकर लगभग 50,000 से 1,00,000 के करीब मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर काबुल के लिए निकल पड़े। लेकिन इस बर्बादी को झेलने वाले लोग कोई नवाब, जागीरदार, रईस या ऊंची जाति के अशराफ़ नहीं थे; वे मुख्य रूप से सिंध, पंजाब और सीमांत प्रांत के गरीब पसमांदा किसान, जुलाहे, दस्तकार और मजदूर थे। इन सीधे-सादे गरीब मुसलमानों ने नेताओं की भावुक तकरीरों पर भरोसा करके अपनी पुश्तैनी ज़मीनें, घर, बैलगाड़ियाँ और खेती के औज़ार कौड़ियों के भाव बेच दिए और भूखे-प्यासे अफगानिस्तान की तरफ पैदल चल पड़े। सबसे शर्मनाक बात यह थी कि फतवा देने वाले मौलाना आज़ाद, मौलाना अब्दुल बारी या अली बंधुओं में से किसी ने खुद कभी हिजरत नहीं की और न ही अपने बच्चों को वहाँ भेजा। वे भारत में अपने आरामदेह घरों और महफिलों में सुरक्षित बैठे रहे, जबकि गरीब पसमांदा जनता को इस मजहबी सियासत की भट्टी में झोंक दिया गया।
इस हिजरत का अंजाम एक बहुत बड़े मानवीय कत्लेआम जैसा साबित हुआ। जब हजारों बेहाल मुहाजिर खैबर दर्रे को पार करके अफगानिस्तान पहुंचे, तो वहां के अमीर अमानुल्लाह खान ने अपने मुल्क के कमजोर संसाधनों का बहाना बनाकर सीमाएं सील कर दीं और अफगान सैनिकों ने इन निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाकर उन्हें वापस खदेड़ दिया। रास्ते में कड़कड़ाती धूप, भुखमरी, हैजा और कबायलियों की लूटपाट की वजह से हजारों मासूम बच्चे, औरतें और बुजुर्ग तड़प-तड़प कर मर गए और पूरा खैबर दर्रा बेकसूरों की लावारिस लाशों से भर गया। जो मुट्ठी भर लोग किसी तरह बचकर भारत लौटे, उनका सब कुछ पहले ही लुट चुका था और वे अपने ही वतन में दर-दर की ठोकरें खाने वाले बेघर और कंगाल शरणार्थी बन गए।
धार्मिक उन्माद का ऐसा ही दूसरा खूनी नतीजा दक्षिण भारत में मालाबार के मोपला दंगों के रूप में देखने को मिला। बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर अपनी मशहूर किताब ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं कि मालाबार का मोपला विद्रोह खुद्दम-ए-काबा और सेंट्रल खिलाफत कमेटी के मजहबी प्रचार की वजह से भड़का था। इन संगठनों ने मोपलाओं के बीच यह प्रचार किया कि ब्रिटिश हुकूमत के तहत भारत दारुल हरब है और इसके खिलाफ जिहाद करना फर्ज है।
मोपला मूल रूप से शोषित और गरीब किसान थे जिनकी असली लड़ाई स्थानीय जमींदारों के आर्थिक जुल्म के खिलाफ थी। लेकिन खिलाफत के मजहबी नारों के असर में आकर इस आंदोलन ने भयानक सांप्रदायिक रूप ले लिया, जहाँ बड़े पैमाने पर कत्लेआम, जबरन धर्म-बदल और मंदिरों को नुकसान पहुँचाने की घटनाएं हुईं। जब ब्रिटिश सरकार ने इस बगावत को बेरहमी से कुचला, तो उसका सारा दर्द भी गरीब मोपला समाज को ही अपनी जान-माल देकर चुकाना पड़ा।
लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि पसमांदा समाज पूरी तरह खामोश था या उसने अशराफ़ों की इस घातक राजनीति को बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया था। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसी दौर में भारत के भीतर एक संगठित और वैचारिक पसमांदा प्रतिरोध का जन्म हुआ। 1920 और 1930 के दशकों में मौलाना असीम बिहारी और जनाब अब्दुल क़य्यूम अंसारी जैसे दूरदर्शी नेताओं ने ‘ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस’ (All India Momin Conference) के झंडे तले पसमांदा बुनकरों, कारीगरों और दस्तकारों को एकजुट किया। मोमिन कॉन्फ्रेंस ने अशराफ़-संचालित मुस्लिम लीग, उनके द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और मजहबी उन्माद की राजनीति को खुली चुनौती दी। बाद में पसमांदा विचारकों ने उस दौर में खुलकर यह ऐतिहासिक ऐलान किया था कि मुस्लिम लीग की अलगाववादी राजनीति और पाकिस्तान का विचार वास्तव में इस्लाम की खिदमत के लिए नहीं, बल्कि उत्तर भारत के अशराफ़ नवाबों और सामंतों की ज़मींदारियों तथा उनके विशेषाधिकारों को बचाने का एक षड़यंत्र है। मोमिन कॉन्फ्रेंस ने करोड़ों पसमांदा मुसलमानों का आह्वान करते हुए विभाजनकारी राजनीति का डटकर मुकाबला किया और एक साझा, लोकतांत्रिक भारत के पक्ष में मजबूती से आवाज़ उठाई। पसमांदा समाज ने यह साबित कर दिया कि वह अशराफ़ों के मजहबी नारों का अंधानुयायी नहीं है, बल्कि उसके पास अपनी स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक चेतना और प्रतिरोध का सामर्थ्य मौजूद है।
राजनीति में धर्म के इस खतरनाक इस्तेमाल का सबक केवल खिलाफत के नेताओं तक ही सीमित नहीं रहा। आगे चलकर खुद को आधुनिक, सूट-बूट पहनने वाला और धर्मनिरपेक्ष नेता कहने वाले मोहम्मद अली जिन्ना ने भी धर्म की इस अंधी ताकत को बहुत अच्छी तरह समझ लिया। 1920 के दशक में मौलवियों की राजनीति का विरोध करने वाले जिन्ना ने 1930 और 1940 के दशकों में जब यह देखा कि एक लोकतांत्रिक भारत में जहाँ हर इंसान को वोट का बराबर हक मिलेगा, वहाँ अशराफ़ एलीट के पुराने शाही विशेषाधिकार, ज़मींदारियाँ और सरकारी नौकरियों पर उनका पुराना कब्जा खत्म हो जाएगा, तो उन्होंने भी फौरन उसी धार्मिक भावुकता का सहारा ले लिया। जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने बहुसंख्यक पसमांदा मुसलमानों (जैसे अंसारी, कुरैशी, राईन, मंसूरी, सैफी और सलमानी) के रोटी, रोज़ी, सामाजिक बराबरी और जातिगत न्याय के असली मुद्दों को दबाने के लिए ‘इस्लाम खतरे में है’ और ‘मुस्लिम पहचान पर संकट’ का वही पुराना डर फैलाया जो कभी खिलाफत के दौर में गढ़ा गया था।
खिलाफत आंदोलन के खत्म होने के बाद देश के माहौल में जो मजहबी कड़वाहट और अविश्वास पैदा हुआ था, उसी की ज़मीन पर आगे चलकर मुस्लिम लीग ने ‘आइडिया ऑफ पाकिस्तान’ की पूरी इमारत खड़ी की। इस पूरी सियासी बाजीगरी का सबसे बड़ा नुकसान भारत के करोड़ों पसमांदा मुसलमानों को हुआ। पसमांदा समाज की बुनियादी मांगें ज़मीन के अधिकार, अच्छी शिक्षा, जातिगत भेदभाव से मुक्ति और बराबरी की थीं। लेकिन खिलाफत आंदोलन से लेकर 1947 के बंटवारे तक अशराफ़ राजनीति चाहे वह लीग का अलगाववादी रूप हो या कांग्रेस का राष्ट्रवादी मुखौटा ने पसमांदा अवाम को दूरदराज की मजहबी पहचानों और झूठे नारों के फेर में उलझाकर रखा। चाहे वह हिजरत की राह में गरीब पसमांदा किसानों का उजड़ना हो, मोपला दंगों में शोषितों का पिसना हो, या फिर देश के विभाजन के दौरान बहा बेकसूरों का खून हो अशराफ़ वर्ग ने सत्ता, कुर्सियां और अपने वर्ग-हित हासिल कर लिए, जबकि बहुसंख्यक पसमांदा मुसलमान अपने ही मुल्क में अधिकारों से महरूम और हाशियाकृत होकर रह गया।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।