~ अब्दुल्लाह मंसूर
सुबह आँख खुलती है। आप फोन उठाते हैं और सोचते हैं कि बस पाँच मिनट रील्स देखकर उठ जाएंगे। लेकिन पाँच मिनट कब आधे घंटे में बदल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। सामने कई काम पड़े हैं, फिर भी बिस्तर से उठने का मन नहीं करता। आप जानते हैं कि काम टालने से परेशानी बढ़ेगी, लेकिन उठने की इच्छा ही नहीं होती। कभी मन में अपराधबोध होता है, तो कभी लगता है कि आज सब कुछ छोड़कर बिस्तर पर ही पड़े रहें। अगर आपने भी कभी ऐसा महसूस किया है, तो संभव है कि आप ‘बेड-रोटिंग’ नाम की एक आदत से परिचित हों।
आजकल सोशल मीडिया पर ‘बेड-रोटिंग’ शब्द काफी चर्चा में है। इसका मतलब है लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना और इस दौरान फोन चलाना, रील्स देखना, फिल्में देखना या दूसरी ऑनलाइन गतिविधियों में समय बिताना। इस शब्द में ‘रोटिंग’ का अर्थ सड़ने से जुड़ा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बिस्तर पर आराम करने वाला हर व्यक्ति किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहा है। कई बार शरीर और मन को आराम की सचमुच ज़रूरत होती है। परेशानी तब शुरू हो सकती है, जब बिस्तर पर पड़े रहना आराम करने के बजाय ज़िम्मेदारियों, मुश्किलों और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से बचने का तरीका बन जाए।
आखिर बेड-रोटिंग की आदत क्यों पड़ती है?
आज की ज़िंदगी में पढ़ाई, नौकरी, भविष्य और परिवार की ज़िम्मेदारियों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। सोशल मीडिया ने इस दबाव में एक और चीज़ जोड़ दी है। वहाँ हम दूसरों की कामयाबी, खुशहाल ज़िंदगी और उपलब्धियाँ देखते हैं। धीरे-धीरे हमें लगने लगता है कि दूसरे लोग हमसे आगे निकल रहे हैं और हमें भी हर समय कुछ न कुछ हासिल करते रहना चाहिए। जब अपनी ज़िंदगी उम्मीदों के मुताबिक आगे बढ़ती हुई नहीं दिखती, तो निराशा और बेचैनी महसूस हो सकती है।
ऐसी स्थिति में कुछ लोग अपनी परेशानियों का सामना करने के बजाय उनसे कुछ समय के लिए दूर भागना चाहते हैं। बिस्तर उन्हें एक ऐसी जगह लगता है जहाँ फिलहाल किसी सवाल का जवाब नहीं देना, किसी काम को पूरा नहीं करना और किसी से कुछ साबित नहीं करना है। फोन इस दूरी को और आसान बना देता है। व्यक्ति बिस्तर पर लेटे-लेटे वीडियो देखता रहता है और कुछ समय के लिए अपनी परेशानियों को भूल जाता है। लेकिन वीडियो बंद होने के बाद वही अधूरे काम और चिंताएँ फिर सामने आ जाती हैं।
यहाँ एक बात समझना ज़रूरी है। हर व्यक्ति बेड-रोटिंग की ओर एक ही वजह से नहीं जाता। किसी को काम का बहुत दबाव हो सकता है, कोई अकेलापन महसूस कर सकता है, किसी की नींद पूरी नहीं हो रही हो सकती है और कोई लंबे समय से उदासी या चिंता से परेशान हो सकता है। कुछ लोगों को शारीरिक बीमारी या लगातार थकान के कारण भी बिस्तर से उठना मुश्किल लग सकता है। इसलिए हर स्थिति को आलस्य या इच्छाशक्ति की कमी कहना सही नहीं होगा।
कई बार यह आदत एक चक्र बन जाती है। मान लीजिए, आपको कोई ज़रूरी काम पूरा करना है, लेकिन वह मुश्किल लगता है। आप सोचते हैं कि थोड़ी देर फोन देखकर मन हल्का कर लेते हैं। कुछ समय के लिए ध्यान काम से हट जाता है और राहत महसूस होती है। लेकिन जब आप दोबारा फोन देखते हैं, तब तक काफी समय निकल चुका होता है। काम अधूरा रहने पर चिंता बढ़ती है। फिर उस चिंता से बचने के लिए आप दोबारा बिस्तर पर पड़े रहते हैं। इस तरह जिस आदत से आप कुछ समय के लिए राहत पाना चाहते थे, वही आगे चलकर परेशानी बढ़ा सकती है।
इसमें सोशल मीडिया की भूमिका को भी समझना चाहिए। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लगातार नई सामग्री मिलती रहती है। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा सामने आ जाता है। इस वजह से कई बार व्यक्ति जितनी देर फोन चलाने का सोचता है, उससे कहीं अधिक समय बिता देता है। उसे लगता है कि वह आराम कर रहा है, लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन देखते रहने से उसका ध्यान लगातार नई सामग्री में उलझा रह सकता है। फोन बंद करने के बाद भी मन शांत न हो, तो यह समझना ज़रूरी है कि स्क्रीन पर समय बिताना और वास्तव में आराम महसूस करना एक ही बात नहीं है।
हालाँकि, बेड-रोटिंग को केवल सोशल मीडिया का नतीजा मानना भी ठीक नहीं होगा। अगर किसी व्यक्ति के मन में पहले से परेशानी है, तो वह फोन का अधिक इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी ओर, अगर वह लगातार अपने काम टालता रहे और लोगों से मिलना-जुलना कम कर दे, तो उसकी परेशानी और बढ़ सकती है। यानी हर बार फोन समस्या की जड़ नहीं होता; कभी-कभी वह पहले से मौजूद परेशानी से बचने का एक रास्ता भी बन जाता है।
यही वजह है कि बेड-रोटिंग और सामान्य आराम के बीच फर्क समझना ज़रूरी है। पूरे सप्ताह काम करने के बाद छुट्टी के दिन कुछ घंटे बिस्तर पर बिताना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। लेकिन अगर बार-बार ऐसा होने लगे कि नहाने, खाने, पढ़ने, काम पर जाने या लोगों से मिलने का मन न करे और रोज़मर्रा की ज़िंदगी प्रभावित होने लगे, तो इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। लंबे समय तक उदासी, थकान, नींद में बदलाव या किसी काम में मन न लगने जैसी परेशानियाँ बनी रहें, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार हो सकता है। हर परेशानी का हल केवल खुद को समझाने या इच्छाशक्ति बढ़ाने में नहीं होता।
बेड-रोटिंग से बाहर निकलने की शुरुआत कैसे करें?
अगर आपको लगता है कि आप भी इस आदत में फँसते जा रहे हैं, तो सबसे पहले खुद को आलसी कहकर कोसना बंद करें। अपने व्यवहार को समझने की कोशिश करें। खुद से पूछें कि मैं बिस्तर पर क्यों पड़ा रहना चाहता हूँ? क्या मैं सचमुच थका हुआ हूँ? क्या किसी काम को लेकर डर या चिंता है? क्या मैं अकेलापन महसूस कर रहा हूँ? या फिर फोन चलाने की आदत इतनी बढ़ गई है कि उसे रोकना मुश्किल हो रहा है? इन सवालों के जवाब आपको अपनी परेशानी की वजह समझने में मदद कर सकते हैं।
इसके बाद बदलाव की शुरुआत छोटे कदमों से करें। अगर सुबह उठना मुश्किल लगता है, तो पहले पूरे दिन की योजना बनाने के बजाय पर्दे खोलें, कमरे में धूप आने दें और थोड़ा पानी पिएँ। इसके बाद बिस्तर से उठकर कुछ देर कमरे में चलें या खिड़की के पास बैठें। शुरुआत में इतना करना भी पर्याप्त हो सकता है। आपको पहले ही दिन अपनी पूरी दिनचर्या बदलने की ज़रूरत नहीं है।
फोन के इस्तेमाल में भी छोटे बदलाव किए जा सकते हैं। अगर सुबह आँख खुलते ही फोन देखने की आदत है, तो कोशिश करें कि उठने के बाद कुछ मिनट फोन न देखें। रात को सोते समय फोन को बिस्तर से थोड़ी दूर रखें। सोशल मीडिया के लिए एक समय तय करें और बीच-बीच में स्क्रीन से विराम लें। इन बदलावों का उद्देश्य फोन को पूरी तरह छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल पर अपना नियंत्रण बढ़ाना है।
एक और उपयोगी तरीका है बड़े काम को छोटे हिस्सों में बाँटना। अगर पढ़ाई करनी है, तो यह मत सोचिए कि आज कई घंटे पढ़ना है। पहले किताब खोलिए और एक पन्ना पढ़ने का लक्ष्य रखिए। अगर कमरा साफ करना है, तो शुरुआत केवल बिस्तर ठीक करने से कीजिए। अगर बाहर जाने का मन नहीं करता, तो कुछ मिनट टहलने से शुरुआत करें। छोटे काम पूरे होने पर व्यक्ति को आगे बढ़ने का एक मौका मिलता है। धीरे-धीरे वह अपनी दिनचर्या में दूसरी गतिविधियाँ भी शामिल कर सकता है।
अपने जीवन में ऐसे कामों के लिए भी समय निकालें जिनमें फोन की ज़रूरत न हो। परिवार के साथ बैठकर बात करना, किसी दोस्त से मिलना, टहलना, खेलना या अपनी पसंद का कोई काम करना मन को राहत दे सकता है। लेकिन इन गतिविधियों को भी अपने ऊपर एक नया दबाव न बनाएँ। अगर किसी दिन आप तय योजना पूरी नहीं कर पाते, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपकी सारी कोशिश बेकार हो गई। अगले दिन फिर से शुरुआत की जा सकती है।
परिवार और दोस्तों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति लगातार बिस्तर पर पड़ा रहता है, तो उसे आलसी, निकम्मा या गैर-जिम्मेदार कहने से वह और अकेला महसूस कर सकता है। इसके बजाय उससे शांति से बात करें और समझने की कोशिश करें कि वह किस परेशानी से गुजर रहा है। मदद का अर्थ हर काम उसके लिए कर देना नहीं, बल्कि उसे अपनी क्षमता के अनुसार छोटे कदम उठाने में सहयोग देना है। और अगर परेशानी लंबे समय तक बनी रहती है, तो उसे पेशेवर मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
बेड-रोटिंग से बाहर निकलने का मतलब यह नहीं कि हम कभी आराम न करें या हर समय काम में लगे रहें। आराम भी हमारी ज़िंदगी की ज़रूरत है। असली बात यह समझना है कि हम अपनी मर्ज़ी से आराम कर रहे हैं या किसी परेशानी से बचने के लिए लगातार बिस्तर पर पड़े रह रहे हैं। अगर बिस्तर से उठना मुश्किल होता जा रहा है, तो खुद को दोष देने के बजाय अपनी स्थिति को समझिए। ज़रूरत हो तो दूसरों की मदद लीजिए और छोटे कदमों से शुरुआत कीजिए। बदलाव हमेशा एक बड़े फैसले से नहीं आता। कभी-कभी इसकी शुरुआत सिर्फ फोन को एक तरफ रखने, बिस्तर से उठने और अपने दिन का पहला छोटा काम करने से होती है।