लेखक – सिराज अंसारी
अक्सर जब हम सुबह का अखबार पढ़ते हैं या रात को टीवी पर बहस देखते हैं, तो हमें ऐसा लगता है जैसे सारे भारतीय मुसलमान एक ही जैसे हैं। सालों से इन बड़े-बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने मुस्लिम समाज को एक सांचे (Monolithic Community) में ढालकर दिखाया है, जैसे उनके बीच कोई फर्क, कोई विविधता या कोई सामाजिक विभाजन है ही नहीं। पारंपरिक मीडिया और उसके कर्ताधर्ताओं ने यह मान लिया है कि मुसलमानों का बस एक ही चेहरा है और उनकी समस्याएं भी एक जैसी ही हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। इन मीडिया घरानों ने इस बड़ी हकीकत को पूरी तरह से ओझल कर दिया कि मुस्लिम समाज के भीतर भी अगड़े (अशराफ़) और पिछड़े (पसमांदा) का बहुत बड़ा और गहरा भेद है।
सच्चर कमेटी (2006) की रिपोर्ट चीख-चीख कर यह गवाही देती है कि भारतीय मुस्लिम आबादी का लगभग 85% हिस्सा पसमांदा (पिछड़े, दलित और आदिवासी) मुसलमानों का है। इसके बावजूद, मुख्यधारा के मीडिया में पसमांदा समाज की समस्याओं, उनके श्रम, उनके रोज़मर्रा के संघर्षों और उनकी सामाजिक पहचान को कभी कोई जगह नहीं दी गई।
पहले के समय में अगर किसी पसमांदा इंसान को अपनी बात रखनी होती थी या अपने हकों पर कोई लेख छपवाना होता था, तो उसे बड़े-बड़े संपादकों के चक्कर काटने पड़ते थे। ये संपादक एक तरह से ‘गेटकीपर्स’ (Gatekeepers) या पहरेदार का काम करते थे। ये अशराफ़ मानसिकता से ग्रसित गेटकीपर ही तय करते थे कि कौन सा विमर्श (Narrative) जनता तक पहुंचेगा और कौन सी बात फाइलों में दबकर रह जाएगी। जाहिर है, ऐसे में 85% आबादी वाले पसमांदा समाज की आवाज़ कभी मुख्यधारा में आ ही नहीं पाई और हमारी असली पहचान को एक छद्म एकरूपी (Monolithic) छवि के नीचे दबा दिया गया।
लेकिन अब वक्त बदल रहा है। आज पसमांदा युवा, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता इस स्थापित भ्रम को पूरी तरह से ध्वस्त कर रहे हैं कि मुस्लिम समाज में कोई ऊंच-नीच या जाति-पाति नहीं है। मैं खुद इस बदलाव का एक छोटा सा हिस्सा हूँ। मैं एक बहुत ही साधारण सा लड़का हूँ। मेरी शिक्षा भी किसी बहुत बड़े, नामी-गिरामी स्कूल या विश्वविद्यालय से नहीं हुई है। लेकिन मुझे राजनीति और समाज को समझने में बहुत पहले से दिलचस्पी थी। इसी दिलचस्पी के कारण मैं अपने विचारों को टूटे-फूटे शब्दों में कुछ न कुछ लिखता रहता था। मेरी ज़िंदगी आम ढर्रे पर चल रही थी, लेकिन फिर एक दिन मेरा सामना ‘पसमांदा विमर्श’ से हुआ। जैसे-जैसे मैंने पसमांदा आंदोलन के बारे में पढ़ना और सुनना शुरू किया, मेरे भीतर एक अजीब सी हलचल और बहुत अच्छा महसूस होने लगा। मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे ही दिल की बात कह दी हो। मुझे वह सब जानने और समझने को मिला जो मेरी अपनी ज़िंदगी में, मेरे आस-पास, मेरे मोहल्ले में बीत चुका था, लेकिन जिस पर कभी कोई खुलकर बात नहीं करता था।
मेरी इस वैचारिक यात्रा में डिजिटल मीडिया ने एक गुरु की भूमिका निभाई। मुझे यूट्यूब पर ‘Pasmanda Democracy’ (पसमांदा डेमोक्रेसी) जैसे चैनल के बारे में पता चला। मैंने वहाँ से बहुत कुछ सीखा। मैंने फैयाज अहमद फैज़ी जैसे इंटेलेक्चुअल (बुद्धिजीवी) को सुना, जिनकी तर्कों पर आधारित बातों ने मेरी आँखें खोल दीं। इसके बाद मैंने अली अनवर साहब की किताब ‘मसावात की जंग’ और मसूद आलम फलाही साहब की किताब ‘हिंदुस्तान में जात-पात और मुसलमान’ के बारे में जाना और उन्हें पढ़ा। इन किताबों और विचारों ने मुझे वह वैचारिक हथियार दिया, जिसकी मुझे तलाश थी। मुझे समझ आ गया कि राईन, मंसूरी, सैफी, कुरैशी, अंसारी, जुलाहा, या हलालखोर जैसे पसमांदा समाज के साथ मस्जिदों की कमेटियों से लेकर राजनीति तक में जो भेदभाव होता है, वह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित जातिवाद है।
जब मेरी समझ गहरी हुई, तो मैंने फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पसमांदा हकों के बारे में लिखना शुरू किया। मुझे वहां से बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। लोग मेरे लेख पढ़ रहे हैं, मुझसे जुड़ रहे हैं। मैं ‘ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़’ से भी जुड़ा हूँ, जहाँ ज़मीनी स्तर पर काम करने और बहुत कुछ नया सीखने का मौका मिल रहा है। लेकिन, यह रास्ता इतना आसान नहीं है। जैसे-जैसे मेरी आवाज़ लोगों तक पहुँच रही है, वैसे-वैसे समस्याएं भी आ रही हैं। लोग सोशल मीडिया पर बदतमीज़ी करते हैं, गालियां देते हैं, तरह-तरह के इल्ज़ाम लगाते हैं। मुझे और मेरे जैसे लिखने वालों को अक्सर ‘B-Team’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। लेकिन इन सबके बावजूद, हम नन्हे-नन्हे कदमों से आगे बढ़ रहे हैं। सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन ने यूट्यूब, पॉडकास्ट, X (ट्विटर), फेसबुक और इंस्टाग्राम को पसमांदा समाज के लिए एक स्वतंत्र हथियार बना दिया है। आज हमें किसी अखबार के दफ्तर का मोहताज नहीं होना पड़ता। लेकिन, यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आम पसमांदा अभी भी खुलकर बात करने से कतरा रहा है।
इसके पीछे अशराफ़ (अगड़े मुसलमानों) का वह नैरेटिव (विमर्श) है, जिसे उन्होंने बड़ी चालाकी से बुना है। अशराफ़ वर्ग का पूरा नैरेटिव सिर्फ और सिर्फ ‘हिन्दू-मुसलमान’ के इर्द-गिर्द घूमता है। वे पूरे मुस्लिम समाज को इसी डर और ध्रुवीकरण में फंसा कर रखते हैं। जब समाज हिन्दू-मुस्लिम के जाल में उलझा रहता है, तो आम पसमांदा मुसलमान अपने अधिकारों, अपनी गरीबी, अपनी शिक्षा और सत्ता व संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी की बात ही नहीं कर पाता।
अशराफ़ वर्ग जानबूझकर ऐसे मुद्दों को हवा देता है जो भावनात्मक हों— जैसे बाबरी मस्जिद, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) का अल्पसंख्यक दर्जा, उर्दू भाषा का मुद्दा या पर्सनल लॉ। इन बड़े-बड़े भावनात्मक और हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव में लोग इतने फंसे रहते हैं कि एक आम पसमांदा मुसलमान को लगने लगता है कि अपने हक (पसमांदा की हिस्सेदारी) की बात करना गलत है। उसे लगने लगता है कि अगर वह अपनी जाति या पिछड़ेपन की बात करेगा, तो इससे ‘मुस्लिम एकता’ टूट जाएगी या इस्लाम खतरे में आ जाएगा। अशराफ़ वर्ग आम पसमांदा के दिमाग में यह भर देता है कि पसमांदा आंदोलन किसी और (सरकार या बहुसंख्यक वर्ग) के इशारों पर हो रहा है। इन इल्ज़ामों और मनोवैज्ञानिक दबाव का नतीजा यह होता है कि एक आम पसमांदा युवा, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में जातिवाद का दंश झेलता है, वह हमारी सोशल मीडिया पोस्ट को लाइक, शेयर, सब्सक्राइब या उस पर कमेंट करने से भी डरता है। उसे लगता है कि ऐसा करने से समाज उसे गद्दार घोषित कर देगा।
समाधान और भविष्य की राह
लेकिन कोई भी आंदोलन सिर्फ डर और चुनौतियों का रोना रोकर नहीं जीता जा सकता। डिजिटल मीडिया ने पसमांदा समाज को अपनी आवाज़ खुद बनने का मौका ज़रूर दिया है। सालों से जो दर्द और सच्चाई बंद कमरों में दबी पड़ी थी, वो अब इंटरनेट के ज़रिए हर दरवाज़े तक पहुँच रही है। लेकिन, एक परिपक्व समाज और एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते, हमारी बात केवल समस्या गिनाने और डिजिटल क्रांति का जश्न मनाने तक नहीं रुकनी चाहिए।
अगर पसमांदा समाज 85% है, तो हमारा लक्ष्य महज़ सोशल मीडिया पर लाइक और शेयर बटोरना नहीं है, बल्कि ज़मीनी हकीकत को बदलना है। इसके लिए ठोस नीतियों की ज़रूरत है। सरकार जो भी योजनाएं ‘अल्पसंख्यकों’ (Minorities) के नाम पर निकालती है, उनका सबसे बड़ा फायदा आज भी अल्पसंख्यक समाज का अगड़ा तबका (अशराफ़) ही उठा ले जाता है, क्योंकि वे पहले से ही संसाधनों और शिक्षा में आगे हैं।
भविष्य की राह यही है कि सरकार की अल्पसंख्यक योजनाओं में पसमांदा मुसलमानों के लिए स्पष्ट हिस्सेदारी तय होनी चाहिए। जब तक पसमांदा मुसलमानों को उनके पिछड़ेपन के आधार पर अल्पसंख्यक कोटे के भीतर या अलग से उनका हक़ और सीधा लाभ नहीं मिलेगा, तब तक सामाजिक न्याय की यह लड़ाई अधूरी रहेगी। पसमांदा समाज की मांग किसी से भीख मांगने की नहीं है, बल्कि आबादी के हिसाब से अपनी जायज़ हिस्सेदारी की है। डिजिटल मीडिया ने हमें जगा दिया है, अब वक्त आ गया है कि इस जागृति को हम अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सत्ता की चाबी बनाएं। यह लड़ाई लंबी है, लेकिन अब हम चुप नहीं बैठेंगे।
~ सिराज अंसारी