लेखक -अब्दुल्लाह मंसूर

द क्विंट को दिए गए एक इंटरव्यू में शरजील इमाम ने भारतीय मुसलमानों की सियासी स्वायत्तता, आनुपातिक नुमाइंदगी, मज़हबी और तालीमी संस्थानों के अधिकारों तथा धर्मनिरपेक्षता की सीमाओं पर अपने विचार रखे। उनकी दलील है कि मुसलमानों को अपनी सियासी और सामूहिक ज़िंदगी के फ़ैसले ख़ुद लेने का अधिकार मिलना चाहिए। वह मौजूदा चुनावी व्यवस्था में मुसलमानों की कमज़ोर नुमाइंदगी, धर्मनिरपेक्ष सियासत की सीमाओं और मुस्लिम समाज की सियासी ताक़त को संगठित करने की ज़रूरत पर सवाल उठाते हैं। वह मुस्लिम संस्थानों की स्वायत्तता और क़ुरआन में मौजूद इस्लामी विचारों की नए सिरे से व्याख्या की भी बात करते हैं।

यहाँ पसमांदा (मुस्लिम समाज के पिछड़े, दलित और वंचित तबक़े/समुदाय) नज़रिये से एक बुनियादी सवाल उठता है: मुस्लिम स्वायत्तता का अधिकार किसके हाथ में होगा और उसका फ़ायदा समाज के किन तबक़ों को मिलेगा? अगर पूरे मुस्लिम समाज की तरफ़ से बोलने और फ़ैसले लेने का अधिकार पहले से प्रभावशाली अशराफ़ (मुस्लिम समाज के सवर्ण या उच्च माने जाने वाले तबक़े) तबक़ों के पास ही रहे, तो स्वायत्तता से पसमांदा समाज की हालत कैसे बदलेगी? मुस्लिम समाज कोई एक जैसा (मोनोलिथिक) समूह नहीं है। उसमें जाति, बिरादरी, पेशे, दौलत, तालीम और सामाजिक सम्मान के आधार पर गहरी गैर-बराबरी है। मज़हबी संस्थानों, सामाजिक संगठनों और सियासत में अशराफ़ तबक़ों की नुमाइंदगी ऐतिहासिक तौर पर हमेशा ज़्यादा रही है। इसलिए मुसलमानों के सामूहिक अधिकारों की माँग करते समय समाज के भीतर अधिकारों और संसाधनों की तक़सीम का सवाल नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

औपनिवेशिक दौर में जनगणना और चुनावी सुधारों ने मुसलमानों को एक अलग सियासी पहचान के तहत संगठित करने में भूमिका निभाई। 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के तहत अलग निर्वाचन व्यवस्था भी इसी इतिहास का हिस्सा थी। लेकिन एक सामूहिक पहचान बनने से समाज के भीतर की गैर-बराबरी ख़त्म नहीं हुई। मुस्लिम लीग ने पूरे मुस्लिम समाज को एक इकाई के रूप में पेश किया और उसका प्रतिनिधित्व करने का दावा किया, लेकिन मोमिन कॉन्फ़्रेंस जैसे पसमांदा संगठनों ने मुस्लिम लीग के इस दावे को चुनौती दी। असीम बिहारी और अब्दुल क़य्यूम अंसारी ने बुनकरों और दूसरे मेहनतकश तबक़ों के सवाल उठाए और लीग के अलगाववाद तथा मज़हब के सियासी इस्तेमाल का खुलकर विरोध किया। 1940 के दशक में, जब मुस्लिम लीग ने ‘पाकिस्तान का प्रस्ताव’ पास किया, तब पसमांदा नेताओं ने 40,000 बुनकरों के साथ मिलकर इसका विरोध किया। यह इतिहास बताता है कि मुस्लिम समाज की सियासी दिशा और नेतृत्व को लेकर पसमांदा समाज की राय एक जैसी नहीं थी।

शरजील की आनुपातिक नुमाइंदगी की माँग इस लिहाज़ से अहम है कि वह चुनावी व्यवस्था में मुस्लिम हिस्सेदारी का सवाल सामने लाती है। लेकिन पसमांदा नज़रिये से केवल आबादी के अनुपात में नुमाइंदगी की माँग काफ़ी नहीं है; यह ख़तरनाक भी हो सकती है। हमने मुस्लिम लीग के रूप में इस सोच का असर देखा है। साथ ही, पसमांदा आंदोलन यह सवाल उठाता है कि मुस्लिम नुमाइंदगी में पसमांदा तबक़ों की हिस्सेदारी कितनी होगी। हमारा नारा रहा है ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ अगर उम्मीदवार चुनने, संस्थाओं का नेतृत्व करने और संसाधनों के बारे में फ़ैसले लेने का अधिकार उन्हीं अशराफ़ समूहों के पास रहा, जो पहले से प्रभावशाली हैं, तो कुल मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ने के बावजूद पसमांदा समाज हाशिये पर रह सकता है। एकता का मतलब सिर्फ़ एक पहचान के तहत इकट्ठा होना नहीं, बल्कि बराबरी के साथ फ़ैसले लेने का हक़ भी है।

यहाँ एक घटना का ज़िक्र करना चाहूँगा, जो 15 अप्रैल 2018 को पटना के गांधी मैदान में हुई थी। वहाँ ‘दीन बचाओ, देश बचाओ’ सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसे इमारत-ए-शरिया और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में बड़ी तादाद में पसमांदा लोगों ने हिस्सा लिया। अगले दिन सम्मेलन के संयोजक ख़ालिद अनवर को जेडीयू के एमएलसी उम्मीदवार के रूप में सामने लाया गया। सवाल यह है कि किसी सम्मेलन में पसमांदा लोगों की बड़ी भागीदारी और उसके बाद होने वाले सियासी फ़ायदों के बीच उनका रिश्ता क्या है? पसमांदा समाज आज़ादी से पहले से ही मज़हबी नारों में फँसा रहा और अशराफ़ मज़हब के नाम पर अपनी सियासत की रोटियाँ सेंकते रहे। आज भी कुछ लोग नागरिकता की भाषा में बात नहीं करते, बल्कि हिंदू और मुस्लिम की भाषा में बात करते हैं। इसलिए मुस्लिम स्वायत्तता की बहस में पसमांदा नज़रिये को केंद्रीय जगह देना ज़रूरी है।

संसदीय नुमाइंदगी के आँकड़े इस गैर-बराबरी को समझने में मदद करते हैं। पूर्व सांसद अशफ़ाक़ हुसैन अंसारी की 2004 में प्रकाशित किताब पिछड़े मुसलमानों के बुनियादी मसाइल के मुताबिक़, पहली से चौदहवीं लोकसभा तक चुने गए 7,500 प्रतिनिधियों में 400 मुस्लिम थे, जिनमें 340 अशराफ़ और 60 पसमांदा बताए गए हैं। लेख में उद्धृत 2001 की जनगणना पर आधारित आँकड़ों के मुताबिक़, देश की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 13.4 प्रतिशत थी। अशराफ़ की आबादी का अनुमान 2.01 प्रतिशत, यानी मुस्लिम आबादी का 15 प्रतिशत, बताया गया था। इसके बावजूद उनकी संसदीय नुमाइंदगी 4.5 प्रतिशत थी। इसके मुक़ाबले पसमांदा आबादी 11.4 प्रतिशत और उनकी नुमाइंदगी 0.8 प्रतिशत बताई गई। ये आँकड़े जिस गैर-बराबरी की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं, वह सिर्फ़ मुस्लिम समाज की कुल नुमाइंदगी बढ़ाने से दूर नहीं होगी। समाज के भीतर भी बराबरी सुनिश्चित करनी होगी।

शरजील धर्मनिरपेक्ष सियासत की सीमाओं और मुस्लिम सियासी स्वायत्तता पर भी सवाल उठाते हैं। वह मुस्लिम सियासी इतिहास, बँटवारे और मुस्लिम नेतृत्व के अनुभवों को नए सिरे से देखने की बात करते हैं। पसमांदा आंदोलन भी विभाजन और मुस्लिम राजनीति को धर्म के चश्मे से नहीं बल्कि जाति के नजरिए देखने की वकालत करता है। पसमांदा आंदोलन यह सवाल उठाता है कि मुस्लिम लीग के सारे पदाधिकारी किस जाति से थे और वह किस वर्ग के सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा कर रहे थे। किसी भी ऐतिहासिक या सियासी परियोजना को केवल इस आधार पर नहीं परखना चाहिए कि उसने मुसलमानों को एक सामूहिक पहचान दी या नहीं। यह भी देखना होगा कि उस पहचान के भीतर अलग-अलग तबक़ों की आवाज़ कितनी सुनी गई। पसमांदा आंदोलन का इतिहास बताता है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी नेतृत्व और नुमाइंदगी को लेकर संघर्ष रहा है।

पसमांदा मुसलमानों का इतिहास, उनकी संस्कृति और उनकी भाषा, सब कुछ भारतीय रहा है, जबकि अशराफ़ अपनी जड़ें और अपना मूल हमेशा भारत के बाहर देखते रहे हैं। सांस्कृतिक पहचान के सवाल पर भी यही बहस मौजूद है। बक्खो के गीत, जुलाहों के करघे, पमरिया का नाच और मिरशिकारों की कहानियाँ भी क्या मुस्लिम समाज की सांस्कृतिक दुनिया का हिस्सा हैं? इतिहास में सर सैयद और इक़बाल जैसे नामों को जितनी जगह मिली, असीम बिहारी और अब्दुल क़य्यूम अंसारी जैसे नेताओं को उतनी पहचान नहीं मिली। यह केवल कुछ नामों को याद करने का सवाल नहीं है, बल्कि इस बात का सवाल है कि समाज की कहानी कौन लिखता है और किसके अनुभवों को अहमियत दी जाती है। 

शरजील इस्लामी विचारों की नए सिरे से व्याख्या की ज़रूरत भी बताते हैं। मगर यहाँ भी सवाल है कि इस्लाम की व्याख्या कौन करेगा और उसका सामाजिक असर क्या होगा? सैयदवाद, यानी नसब और ख़ानदानी पहचान के आधार पर ऊँच-नीच का दावा,मुस्लिम समाज की आंतरिक गैर-बराबरी को समझने का एक अहम पहलू है। मसूद आलम फ़लाही की किताब हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान इस सवाल को गंभीरता से सामने लाती है। अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी और अशरफ़ अली थानवी की बहिश्ती ज़ेवर जैसी किताबों में निकाह के संदर्भ में कफ़ू यानी शादी में बराबरी या उपयुक्तता का सवाल भी इस बहस से जुड़ता है। अगर मज़हबी अवधारणाओं की व्याख्या का इस्तेमाल सामाजिक दर्जे और जातियों के बीच दूरी को बनाए रखने के लिए हो, तो केवल धार्मिक स्वायत्तता हासिल करना सामाजिक इंसाफ़ की गारंटी नहीं बन सकता क्योंकि जो भी धार्मिक संस्थाएं बनेंगी वह सामाजिक गैर-बराबरी पर बनेंगी।

यह सवाल धार्मिक संस्थानों में नुमाइंदगी से भी जुड़ा है। किन तबक़ों के लोग फ़ैसले लेते हैं, किनकी आवाज़ सुनी जाती है और महिलाओं की भागीदारी कितनी है-इन सवालों का जवाब दिए बिना संस्थागत स्वायत्तता की बात अधूरी रहती है। किसी संस्था को बाहरी दख़ल से आज़ादी मिलना एक बात है और उस संस्था के भीतर सबको बराबरी का हक़ मिलना दूसरी बात। आज भी कुछ लोग नागरिकता की भाषा में बात नहीं करते, बल्कि हिंदू और मुस्लिम की भाषा में बात करते हैं। इसलिए मुस्लिम स्वायत्तता की बहस में पसमांदा नज़रिये को केंद्रीय जगह देना ज़रूरी है।

पसमांदा आंदोलन मुस्लिम समाज के साझा सवालों को नकारता नहीं है। उसका एतराज़ यह है कि साझा पहचान के नाम पर आंतरिक गैर-बराबरी को छिपाया न जाए। जज़्बाती सियासत और ‘पहचान के ख़तरे’ का डर दिखाकर अक्सर समाज के भीतर मौजूद शोषण और गैर-बराबरी को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। धार्मिक स्वायत्तता या पुरानी परंपराएँ कभी भी व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकतीं। मुस्लिम पर्सनल लॉ और सामाजिक व्यवस्थाओं में अशराफ़िया नेतृत्व को जवाबदेही से परे नहीं रखा जा सकता।

यही शरजील इमाम की स्वायत्तता की सोच पर पसमांदा नज़रिये का बुनियादी सवाल है। मुस्लिम समाज को अधिकार मिलना ज़रूरी है, लेकिन उन अधिकारों, संस्थानों और संसाधनों में पसमांदा तबक़ों की बराबर हिस्सेदारी का सवाल भी उतना ही ज़रूरी है। जिस स्वायत्तता में नेतृत्व और फ़ैसलों पर पुराने प्रभावशाली अशराफ तबक़ों का दबदबा बना रहे, वह पूरे समाज की आज़ादी नहीं हो सकती। सामाजिक इंसाफ़, बराबरी और पसमांदा नुमाइंदगी के बिना मुस्लिम स्वायत्तता का दावा अधूरा रहेगा।

डिस्क्लेमर: यह लेख मूल रूप से Firstpost English में प्रकाशित हुआ था। इसे यहां पाठकों की जानकारी और संदर्भ के लिए पुनः प्रकाशित किया जा रहा है। लेख में व्यक्त विचार एवं दावे मूल लेखक के हैं और उन्हें उसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।

Abdullah Mansoor
About the Author: Abdullah Mansoor

एक शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं, जो मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय और पसमांदा मुद्दों पर लिखते-बोलते हैं।