Category: Political

जंतर-मंतर पर ‘गाली’ देती लड़कियाँ: “गुमराह बच्चे” या गहरा आक्रोश?

जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन केवल परीक्षा-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल नहीं, बल्कि युवाओं के बढ़ते असंतोष, भाषा की राजनीति और बदलती सामाजिक चेतना का आईना है। आक्रामक भाषा को महज अभद्रता मानने के बजाय उसके पीछे छिपे तनाव, निराशा और व्यवस्थागत अविश्वास को समझना जरूरी है। यह घटनाक्रम सवाल उठाता है कि सरकार युवाओं की आवाज़ को दबाएगी या उनके गुस्से के मूल कारणों को समझकर शिक्षा और शासन व्यवस्था में जरूरी बदलाव करेगी।

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भाग-एक: द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध

मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत और साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे संगठित विरोध पसमांदा नेतृत्व वाली मोमिन कॉन्फ्रेंस ने किया। आसिम बिहारी, अब्दुल कय्यूम अंसारी और अन्य नेताओं ने देश-विभाजन, जाति छिपाने की अपील तथा अशराफ वर्चस्व का विरोध करते हुए भारतीय एकता, पसमांदा पहचान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वकालत की। उनके अनुसार पाकिस्तान की अवधारणा इस्लामी मूल्यों और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत दोनों के विपरीत थी, जबकि मुस्लिम लीग बहुसंख्यक पसमांदा मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

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Gen Z का ऐतिहासिक आंदोलन: अपमान से उठी चिंगारी और सत्ता की जवाबदेही

NEET-UG 2026 के कथित पेपर लीक के बाद शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ आंदोलन भारत के छात्र इतिहास का एक अनोखा अध्याय बन गया। व्यंग्य से शुरू हुई यह मुहिम लाखों युवाओं की आवाज़ बनकर परीक्षा सुधार, जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता की मांग तक पहुँची। 37 दिनों के लोकतांत्रिक संघर्ष ने दिखाया कि Gen Z मीम्स, सोशल मीडिया और अहिंसक प्रतिरोध के ज़रिए भी सत्ता को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती है।

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डिजिटल मीडिया और पसमांदा आंदोलन: पारंपरिक मीडिया का भ्रम, मेरा सफर और भविष्य की राह

**Excerpt (80 words):**
मुख्यधारा के मीडिया ने लंबे समय तक भारतीय मुसलमानों को एकरूपी समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि सच्चाई यह है कि लगभग 85% आबादी पसमांदा मुसलमानों की है, जिनकी आवाज़ और समस्याएँ लगातार हाशिए पर रहीं। डिजिटल मीडिया ने इस मौन को तोड़ते हुए पसमांदा समाज को अपनी बात रखने का मंच दिया है। अब यह संघर्ष केवल पहचान का नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक न्याय, संसाधनों में हिस्सेदारी और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की लोकतांत्रिक लड़ाई बन चुका है।

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डिजिटल बनाम ज़मीन: क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भी अगली ‘आप’ बनेगी?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का उभार केवल एक डिजिटल मज़ाक नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर बढ़ते असंतोष, बेरोज़गारी और संस्थागत उपेक्षा का प्रतीक है। जंतर-मंतर पर सीमित भीड़ ने इसकी संगठनात्मक कमजोरी उजागर की, लेकिन इसके पीछे मौजूद आक्रोश को नकारा नहीं जा सकता। यह घटनाक्रम बताता है कि सोशल मीडिया की ताकत और ज़मीनी राजनीति के बीच बड़ा अंतर है, फिर भी युवाओं की आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय की मांगों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

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मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी

मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।

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तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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तेहरान: सिनेमा के परदे पर कूटनीति और नैरेटिव का खेल

फिल्म ‘तेहरान’ केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और नैरेटिव की जटिल परतों को उजागर करने का माध्यम बनती है। यह दिल्ली 2012 धमाके को आधार बनाकर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के रिश्तों को एक खास नजरिए से प्रस्तुत करती है, जहाँ सिनेमा ‘सॉफ्ट पावर’ बनकर दर्शकों की सोच को प्रभावित करता है। ऐसे में जरूरी है कि दर्शक मनोरंजन के साथ इसके वैचारिक पक्ष को भी समझें।

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ईरान टकराव को ‘धर्मयुद्ध’ में बदलने की कोशिश

2026 में ईरान–इजराइल–अमेरिका तनाव केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि धर्म, सत्ता और नैरेटिव का जटिल गठजोड़ बन चुका है। आधुनिक हथियारों के बावजूद संघर्ष को “प्रकाश बनाम अंधकार” या ‘अर्मागेडन’ जैसी धार्मिक अवधारणाओं में ढाला जा रहा है। यह खतरनाक प्रवृत्ति युद्ध को नैतिक वैधता देती है, जहाँ मानवाधिकार पीछे छूट जाते हैं और विनाश को ‘पवित्र’ बना दिया जाता है।

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ए हाउस ऑफ डायनामाइट: बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और अमेरिकी नैरेटिव

कैथरीन बिगेलो की A House of Dynamite एक रोमांचक थ्रिलर होते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थों से भरी फिल्म है। यह तकनीकी सटीकता और ‘रियल टाइम’ तनाव के जरिए दर्शक को बांधती है, लेकिन साथ ही अमेरिकी सुरक्षा नैरेटिव को वैध ठहराने का सूक्ष्म प्रयास करती है। फिल्म डर को एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करती है, जिससे युद्ध और आक्रामकता को नैतिक ठहराया जाता है, यही इसे महज सिनेमा नहीं बल्कि एक विचारधारात्मक बयान बनाता है।

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मध्य-पूर्व की राजनीति और पाकिस्तान का खेल

मध्य-पूर्व की राजनीति अक्सर “मुस्लिम उम्मत” के नारों में लिपटी दिखाई देती है, लेकिन हकीकत में यह राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा चिंताओं और सत्ता की कठोर राजनीति से संचालित होती है। खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था, पश्चिमी ताकतों पर उनकी निर्भरता और पाकिस्तान की “सैन्य सेवा” वाली भूमिका इसी यथार्थ को उजागर करती है। अगर पाकिस्तान ईरान के खिलाफ किसी युद्ध में उतरता है, तो यह केवल दो देशों का टकराव नहीं होगा, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता को झकझोर सकता है।

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थर्ड टेंपल और ग्रेटर इज़राइल

इज़राइल–फिलिस्तीन संघर्ष केवल भू-राजनीतिक विवाद नहीं बल्कि धार्मिक विचारधाराओं से भी प्रभावित है। क्रिश्चियन जायनिज्म, खासकर अमेरिका और यूरोप के कुछ इवेंजेलिकल ईसाइयों में प्रचलित, इज़राइल के अस्तित्व और विस्तार को बाइबिल की भविष्यवाणियों से जोड़कर देखता है। “ग्रेटर इज़राइल”, “थर्ड टेंपल” और मसीह के पुनरागमन जैसी अवधारणाएँ इस सोच का हिस्सा हैं, जिसने पश्चिमी राजनीति और मध्य-पूर्व की जटिल बहसों को गहराई से प्रभावित किया है।

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