Category: Political

गांधी को समझे बिना गांधी की प्रासंगिकता नहीं समझी जा सकती

महात्मा गांधी को याद करना और गांधी को समझना दो अलग बातें हैं। आज तकनीक, AI, आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और नफरत भरी भाषा के दौर में उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज, सर्वोदय और साधन-साध्य के विचार नए सवाल खड़े करते हैं। गांधी हर आधुनिक समस्या का तैयार समाधान नहीं देते, लेकिन वे हमें अपने उद्देश्य, साधनों और व्यवहार की नैतिक जांच करने के लिए प्रेरित करते हैं।

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की भूमिका और भारत की विदेश नीति को लेकर कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने रखा। लेख में ब्रिक्स के विस्तार, भारत के ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ दृष्टिकोण, आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों की चर्चा की गई है। साथ ही, बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की कूटनीतिक भूमिका का विश्लेषण किया गया है।

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10 अगस्त: अरजाल और गैर-हिंदू दलितों के लिए क्यों है काला दिवस

यह लेख अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति के दर्जे पर लगी धार्मिक पाबंदी और उसके अरजाल (दलित मुसलमानों) व अन्य गैर-हिंदू दलितों पर प्रभाव की पड़ताल करता है। इसमें डॉ. आंबेडकर के विचारों, मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव, विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों और सामाजिक संगठनों के संघर्ष के संदर्भ में समान अधिकार और धार्मिक पाबंदी हटाने की मांग को सामने रखा गया है।

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Challenging the Grand Mufti: Defending Women’s Public Agency

A recent controversy over regressive statements about women’s public participation highlights a deeper struggle within Muslim society over gender justice, religious interpretation, and constitutional rights. Drawing on Quranic principles, Islamic history, and contemporary examples, this article challenges patriarchal readings that confine women to domestic spaces. It also centers Pasmanda women, whose struggles with gender, caste, and economic inequality demand grassroots empowerment, education, dignity, and economic independence within India’s constitutional framework.

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जंतर-मंतर पर ‘गाली’ देती लड़कियाँ: “गुमराह बच्चे” या गहरा आक्रोश?

जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन केवल परीक्षा-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल नहीं, बल्कि युवाओं के बढ़ते असंतोष, भाषा की राजनीति और बदलती सामाजिक चेतना का आईना है। आक्रामक भाषा को महज अभद्रता मानने के बजाय उसके पीछे छिपे तनाव, निराशा और व्यवस्थागत अविश्वास को समझना जरूरी है। यह घटनाक्रम सवाल उठाता है कि सरकार युवाओं की आवाज़ को दबाएगी या उनके गुस्से के मूल कारणों को समझकर शिक्षा और शासन व्यवस्था में जरूरी बदलाव करेगी।

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भाग-एक: द्विराष्ट्र सिद्धांत और पसमांदा प्रतिरोध

मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत और साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे संगठित विरोध पसमांदा नेतृत्व वाली मोमिन कॉन्फ्रेंस ने किया। आसिम बिहारी, अब्दुल कय्यूम अंसारी और अन्य नेताओं ने देश-विभाजन, जाति छिपाने की अपील तथा अशराफ वर्चस्व का विरोध करते हुए भारतीय एकता, पसमांदा पहचान और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वकालत की। उनके अनुसार पाकिस्तान की अवधारणा इस्लामी मूल्यों और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत दोनों के विपरीत थी, जबकि मुस्लिम लीग बहुसंख्यक पसमांदा मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

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Gen Z का ऐतिहासिक आंदोलन: अपमान से उठी चिंगारी और सत्ता की जवाबदेही

NEET-UG 2026 के कथित पेपर लीक के बाद शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ आंदोलन भारत के छात्र इतिहास का एक अनोखा अध्याय बन गया। व्यंग्य से शुरू हुई यह मुहिम लाखों युवाओं की आवाज़ बनकर परीक्षा सुधार, जवाबदेही और संस्थागत पारदर्शिता की मांग तक पहुँची। 37 दिनों के लोकतांत्रिक संघर्ष ने दिखाया कि Gen Z मीम्स, सोशल मीडिया और अहिंसक प्रतिरोध के ज़रिए भी सत्ता को जवाबदेह बनाने की क्षमता रखती है।

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डिजिटल मीडिया और पसमांदा आंदोलन: पारंपरिक मीडिया का भ्रम, मेरा सफर और भविष्य की राह

**Excerpt (80 words):**
मुख्यधारा के मीडिया ने लंबे समय तक भारतीय मुसलमानों को एकरूपी समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि सच्चाई यह है कि लगभग 85% आबादी पसमांदा मुसलमानों की है, जिनकी आवाज़ और समस्याएँ लगातार हाशिए पर रहीं। डिजिटल मीडिया ने इस मौन को तोड़ते हुए पसमांदा समाज को अपनी बात रखने का मंच दिया है। अब यह संघर्ष केवल पहचान का नहीं, बल्कि शिक्षा, सामाजिक न्याय, संसाधनों में हिस्सेदारी और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की लोकतांत्रिक लड़ाई बन चुका है।

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डिजिटल बनाम ज़मीन: क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भी अगली ‘आप’ बनेगी?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का उभार केवल एक डिजिटल मज़ाक नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर बढ़ते असंतोष, बेरोज़गारी और संस्थागत उपेक्षा का प्रतीक है। जंतर-मंतर पर सीमित भीड़ ने इसकी संगठनात्मक कमजोरी उजागर की, लेकिन इसके पीछे मौजूद आक्रोश को नकारा नहीं जा सकता। यह घटनाक्रम बताता है कि सोशल मीडिया की ताकत और ज़मीनी राजनीति के बीच बड़ा अंतर है, फिर भी युवाओं की आकांक्षाओं और सामाजिक न्याय की मांगों को गंभीरता से समझना आवश्यक है।

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मई दिवस: पसमांदा मज़दूरों के संघर्ष की अनकही कहानी

मई दिवस के संघर्ष से लेकर आज के भारत तक, मजदूरों की लड़ाई सिर्फ मजदूरी की नहीं बल्कि इज्जत, बराबरी और पहचान की भी रही है। यह लेख खास तौर पर पसमांदा मजदूरों की उस अनदेखी दुनिया को सामने लाता है, जहाँ जाति, पेशा और गरीबी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। बदलती अर्थव्यवस्था में पुराने हुनर खत्म हो रहे हैं, लेकिन नए मौके अब भी इन तबकों की पहुँच से दूर हैं।

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तालिबान का शरीयत ‘कोड’ या मनुवाद का नया रूप? इस्लामी न्याय और महिला अधिकारों की कसौटी

तालिबान द्वारा लागू नया कानून न्याय नहीं, बल्कि एक संकुचित सोच का प्रतिबिंब है जो महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है। घरेलू हिंसा की सीमित परिभाषा और न्यायिक प्रक्रियाओं में भेदभाव, इस्लामी मूल्यों—अदल (न्याय) और रहमत (दया)—के विपरीत है। यह स्पष्ट करता है कि कठोर कबीलाई परंपराओं को धर्म का रूप देकर समाज में असमानता को वैध ठहराया जा रहा है।

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तेहरान: सिनेमा के परदे पर कूटनीति और नैरेटिव का खेल

फिल्म ‘तेहरान’ केवल एक जासूसी थ्रिलर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और नैरेटिव की जटिल परतों को उजागर करने का माध्यम बनती है। यह दिल्ली 2012 धमाके को आधार बनाकर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के रिश्तों को एक खास नजरिए से प्रस्तुत करती है, जहाँ सिनेमा ‘सॉफ्ट पावर’ बनकर दर्शकों की सोच को प्रभावित करता है। ऐसे में जरूरी है कि दर्शक मनोरंजन के साथ इसके वैचारिक पक्ष को भी समझें।

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