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अशराफों ने भारत में लागू नहीं होने दिया हजरत मुहम्मद (स.अ.) का आखिरी पैगाम

हज़रत मुहम्मद (स.अ.) का अंतिम खुतबा समानता, भाईचारे और सामाजिक न्याय का स्पष्ट संदेश देता है। लेकिन भारतीय मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव और सामाजिक वर्चस्व ने इस संदेश को कमजोर किया। पसमांदा समाज की शिक्षा, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सीमाओं के पीछे यही असमान संरचना दिखाई देती है। यह लेख पैगंबर के आदर्श और मुस्लिम समाज की वास्तविकता के बीच के इसी विरोधाभास को सामने रखते हुए सामाजिक बराबरी और न्याय के लिए पसमांदा संघर्ष की जरूरत को रेखांकित करता है।

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