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अशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’:...
Posted by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
समीक्षा : ‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’-मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद
by Arif Aziz | Feb 16, 2026 | Book Review, Education and Empowerment, Pasmanda Caste | 0 |
पसमांदा जन आंदोलन 1998 सिर्फ आत्मकथा नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर दबे उस सच का दस्तावेज़ है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। 1998 में पसमांदा आंदोलन की शुरुआत से लेकर उसके राजनीतिक विस्तार तक, यह किताब बताती है कि बराबरी की लड़ाई मजहबी नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ से तय होती है।
मुख्तार अंसारी अपने निजी जीवन के अनुभवों, जातिगत भेदभाव की घटनाओं और राजनीतिक संघर्षों के जरिए यह प्रश्न उठाते हैं कि जब इस्लाम बराबरी की बात करता है तो समाज में ऊँच-नीच क्यों कायम है। यह कृति पसमांदा चेतना, हिस्सेदारी और सम्मान की मांग का सशक्त बयान है—एक ऐसी आवाज़, जो अब खामोश नहीं रहेगी।
Read Moreअशराफ़िया अदब को चुनौती देती ‘तश्तरी’: पसमांदा यथार्थ की कहानियाँ
by Arif Aziz | Oct 29, 2025 | Book Review, Casteism, Culture and Heritage, Education and Empowerment | 0 |
सुहैल वहीद द्वारा संपादित ‘तश्तरी’ उर्दू साहित्य में पसमांदा समाज की आवाज़ को सामने लाने वाला ऐतिहासिक संग्रह है। यह पुस्तक मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे जातिगत भेदभाव और उर्दू साहित्य की चुप्पी को चुनौती देती है। अब्दुल्लाह मंसूर बताते हैं कि प्रगतिशील और अशराफ़ लेखक अपने वर्गीय हितों के कारण इस अन्याय पर मौन रहे। ‘तश्तरी’ उन कहानियों का संग्रह है जो इस मौन को तोड़ती हैं, मुस्लिम समाज के भीतर छुआछूत और सामाजिक पाखंड को उजागर करती हैं। यह किताब पसमांदा साहित्यिक आंदोलन की शुरुआत और आत्मसम्मान की लड़ाई का प्रतीक बनती है।
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