— दिल्ली के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक की डायरी से
लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
शिक्षक दिवस आते ही हमारे चारों तरफ औपचारिक बधाइयों, सजे-धजे मंचों, ताज़े गुलदस्तों और शिक्षक की त्याग-तपस्या पर लिखे जाने वाले रस्मी कसीदों की बाढ़ सी आ जाती है। समाज कुछ घंटों के लिए गुरु-शिष्य परंपरा के पुराने सुनहरे दिनों को याद करने लगता है। लेकिन सुबह 8 बजे जब मैं हाथ में चाक की खड़िया और पुरानी हाजिरी का रजिस्टर लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अपने सरकारी स्कूल की कक्षा में दाखिल होता हूँ, तो यह सारी चमक-दमक स्कूल के मुख्य लोहे के फाटक पर ही छूट जाती है। मेरे सामने खिड़कियों से छनकर आती धूप में उन मासूमों की आँखें चमक रही होती हैं, जो पसीना बहाते दिहाड़ी मजदूरों, गलियों में रेहड़ी-पटरी लगाने वालों, ऑटो चालकों, बुनकरों और सीलमपुर व मुस्तफाबाद की तंग बस्तियों से आते हैं। उनकी आँखें केवल ब्लैकबोर्ड पर लिखे जाने वाले बेजान लफ़्ज़ों को नहीं तकतीं, बल्कि उनमें अपने आने वाले कल को संवारने की एक ख़ामोश छटपटाहट होती है। हर साल पाँच सितंबर को जब मेरे हाथों में फूल थमाए जाते हैं, तो एक शिक्षक के दिल में यह कशमकश जाग उठती है कि क्या यह दिन महज़ मीठी-मीठी रस्में निभाने का है, या फिर उस ज़मीनी सच्चाई से दो-चार होने का, जिसका सामना हम साल के बाकी 364 दिन करते हैं।
आज जब भारतीय शिक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक कमियों, बाज़ारीकरण, अनियंत्रित कोचिंग कल्चर और रट्टामार तोतों की फौज तैयार करने पर संजीदा सवाल उठ रहे हैं, तो एक शिक्षक के तौर पर मुझे यह बहस कतई डराती नहीं है। सच कहूँ तो मुझे इन तीखे सवालों में एक गहरी उम्मीद नज़र आती है। किसी व्यवस्था पर उठते सवाल उसके बिखरने का मातम नहीं होते, बल्कि वे इस बात का पक्का सबूत हैं कि हमारा समाज अपनी कमियों को तस्लीम कर एक बड़े बदलाव की ज़मीन तैयार कर रहा है। हमारी कक्षाओं के मौजूदा संकट को समझने के लिए हमें उस पुराने ऐतिहासिक दौर को भी याद करना होगा, जिसे हम आज़ादी के इतने सालों बाद तक ढोने को मजबूर रहे। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ी हुकूमत के दौरान थॉमस बबिंगटन मैकोले ने 1835 के अपने संस्मरण में जिस तालीम की बुनियाद रखी थी, उसका मक़सद आज़ाद ख्याल सोचने वाले या साइंसदां बनाना नहीं था, बल्कि दफ़्तरों की फाइलों को संभालने वाले फरमाबरदार क्लर्क तैयार करना था। अंग्रेज़ी को रसूख और सत्ता की ज़बान बनाकर अपनी देसी ज़बानों और आज़ाद सोच पर ऐसी पाबंदी लगाई गई कि समाज में एक गहरी खाई खुद गई। इस भेदकारी निज़ाम के बरक्स जब 1848 में राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने पुणे की धरती पर दबे-कुचले अवाम और बच्चियों के लिए पहला स्कूल खोला, तो वह सिर्फ़ अक्षर सिखाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि इंसान को उसकी इंसानी गरिमा और हक़ दिलाने की एक तारीखी जंग थी।
आज़ादी के बाद 1964 में बने डॉ. दौलत सिंह कोठारी कमीशन ने 1966 की अपनी रिपोर्ट में ‘समान स्कूल प्रणाली’ (Common School System) और पड़ोस के उम्दा स्कूलों का ख्वाब देखा था, जहाँ अमीर और गरीब का फ़र्क मिट जाए, लेकिन वह नीति-निर्माताओं के वर्ग-अहंकार की भेंट चढ़ गया। कमीशन की यह सिफारिश भी ठंडे बस्ते में चली गई कि देश को अपनी कुल आमदनी (जीडीपी) का कम से कम छह फीसदी हिस्सा तालीम पर खर्च करना चाहिए।
1991 के खुले बाज़ार के दौर के बाद शिक्षा धीरे-धीरे सेवा के बजाय एक मुनाफेदार बाज़ार बन गई और खाते-पीते घरों के लोग महंगे प्राइवेट स्कूलों की तरफ चले गए। नतीजतन, सरकारी स्कूल सिर्फ़ सबसे गरीब और बेबस तबकों की मजबूरी बनकर रह गए। शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act 2009) और दोपहर के खाने (मिड-डे मील) की वजह से बच्चों के नाम तो स्कूलों में दर्ज हो गए, लेकिन कक्षाओं के भीतर पढ़ाई-लिखाई का असल मयार गिरता चला गया। ‘असर’ (ASER) सर्वे और दुनिया भर की रिपोर्ट्स में उठाई गई ‘लर्निंग पॉवर्टी’ का दर्द हम रोज़ देखते हैं, जहाँ बुनियादी समझ न होने के कारण बच्चे अगली जमात में तो पहुँच गए, लेकिन उनका सीखना वहीं का वहीं रुक गया। कई सूबों में बच्चों की घटती तादाद का बहाना बनाकर हज़ारों सरकारी स्कूलों पर ताले लटका दिए गए या उन्हें आपस में मिला दिया गया, जिससे गरीब बच्चों के लिए स्कूल और दूर हो गया। वहीं दूसरी तरफ, कागज़ों पर फ़र्ज़ी और दोहरे नाम दर्ज कराकर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की बंदरबाँट की जाती थी। दसवीं के बाद लाखों नौजवानों का ‘डमी स्कूलों’ और कोचिंग के शिकंजे में फँस जाना इसी बिगड़े हुए ढर्रे का नतीजा था, जहाँ समझ की कोई जगह नहीं बची थी।
समस्याओं के सामने समाधान की नई राह: नीतियाँ और दिल्ली का मॉडल
इस पुरानी जड़ता, रटंत ढर्रे और प्रशासनिक खामियों को मिटाने के लिए अब जो ठोस कदम उठाए गए हैं, वे सिर्फ़ कागज़ों की शोभा नहीं बढ़ा रहे, बल्कि ज़मीन पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। सबसे पहले अगर हम निज़ाम की सफाई और पारदर्शिता की बात करें, तो केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के ‘यूडाइस प्लस’ (UDISE+) पोर्टल ने एक बहुत बड़ा इंकलाब खड़ा किया है। इस डिजिटल इंतज़ाम के तहत हर तालिब-इल्म को एक मुस्तक़िल पहचान संख्या (PEN – Permanent Education Number) दी गई है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि एक ही बच्चे का नाम दो-दो स्कूलों में दिखाकर सरकारी स्कीमों का नाजायज़ फायदा उठाने वाले फ़र्ज़ी दाखिलों (Ghost Enrolments) का जड़ से खात्मा हो गया। अब वजीफ़ा, मुफ्त किताबें, कपड़े और मिड-डे मील का हक बिचौलियों के बजाय सीधे उस बच्चे तक पहुँच रहा है जिसका वह हक़दार है। जहाँ देश के कई राज्यों में बच्चों की कमी बताकर हज़ारों स्कूल बंद कर दिए गए, वहीं दिल्ली ने अपनी सियासी और प्रशासनिक सूझबूझ से यह मिसाल पेश की कि यहाँ का एक भी सरकारी स्कूल बंद नहीं होने दिया गया, बल्कि उन्हें शानदार इमारतों और नई सहूलियतों से संवारा गया।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने पुरानी 10+2 व्यवस्था को बदलकर 5+3+3+4 के जिस नए ढांचे को पेश किया है, उसे हर आम इंसान बड़ी आसानी से समझ सकता है। इसका पहला पाँच साल का दौर ‘फाउंडेशनल स्टेज’ है, जिसमें तीन साल की बालवाटिका और पहली-दूसरी जमात शामिल है। जहनी साइंस का मानना है कि बच्चे के दिमाग का 85 फीसदी विकास छह साल की उम्र तक हो जाता है, इसलिए यहाँ भारी बस्ते को हटाकर खेल-कूद और दिलचस्प तौर-तरीकों से सिखाने पर ज़ोर है।
इसके बाद के तीन साल ‘प्रिपरेटरी स्टेज’ (तीसरी से पाँचवीं जमात) के हैं, जहाँ ‘निपुण भारत’ (NIPUN) मिशन के तहत यह पक्का किया जा रहा है कि तीसरी जमात तक आते-आते हर बच्चा समझ के साथ पढ़ना-लिखना और बुनियादी हिसाब-किताब (FLN) सीख जाए। इसके बाद ‘मिडिल स्टेज’ (छठी से आठवीं जमात) में किताबी तालीम के साथ-साथ ’10 बस्ता-रहित दिवस’ (Bagless Days) के ज़रिए स्थानीय दस्तकारी और हुनर की अमली तरबीयत दी जा रही है। आखिरी चार साल ‘सेकेंडरी स्टेज’ (नौवीं से बारहवीं जमात) के हैं, जहाँ साइंस, आर्ट्स और कॉमर्स की दीवारों को गिरा दिया गया है; अब साइंस का विद्यार्थी भी अपनी पसंद से इतिहास या संगीत पढ़ सकता है।
मेरे लिए इस नई नीति का सबसे कीमती पहलू सामाजिक इंसाफ (सोशल जस्टिस) है। नीति में शामिल ‘सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समूह’ (SEDGs) और ‘विशेष शिक्षा क्षेत्र’ (SEZs) उन पिछड़ी बस्तियों में अतिरिक्त मदद पहुँचाने की ज़मानत देते हैं जहाँ पसमांदा और कमजोर अवाम बसता है। सबसे बड़ा बदलाव ”श्रम की गरिमा” (Dignity of Labour) और ‘लोक विद्या’ को अपनाए जाने से आया है। पसमांदा समाज का एक बड़ा तबका दस्तकारी, कशीदाकारी, सिलाई, बढ़ईगीरी और लोहारगिरी जैसे हुनरमंद पेशों से अपनी रोज़ी-रोटी चलाता है। पुरानी संभ्रांत मानसिकता इन दस्तकारों को हेय नज़र से देखती थी, लेकिन अब मिडिल स्कूल से ही हुनर सिखाने को लाज़मी करने से बच्चों के दिलों से अपने ख़ानदानी काम को लेकर हीनभावना खत्म हो रही है और उनमें एक नया आत्मसम्मान पैदा हो रहा है। इसके साथ ही, कम से कम पाँचवीं तक अपनी मातृभाषा में पढ़ाने की बात उन बच्चों के लिए नेमत साबित हो रही है, जो ज़बान के खौफ़ की वजह से क्लास में सहमे रहते थे।
दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने इस पूरी सोच को हकीकत का जामा पहनाकर पूरे मुल्क के सामने एक कामयाब मॉडल रखा है। दिल्ली ने 1997 के प्रतिभा विकास विद्यालय (RPVV) और 2021 के स्कूल ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सीलेंस (ASOSE) के तजुर्बों को जोड़कर ‘सीएम श्री’ (CM Shri) स्कूल मॉडल के लिए ₹100 करोड़ के खास बजट की ठोस बुनियाद रखी। इस व्यवस्था की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इन बेहतरीन स्कूलों में 50 फीसदी सीटें सरकारी स्कूलों के आम और गरीब बच्चों के लिए आरक्षित की गई हैं। यहाँ पढ़ाई को चार बड़े क्षेत्रों, साइंस-तकनीक (STEM), मानविकी (Humanities), फन व ललित कला (PVA), और 21वीं सदी के हुनर व फाइनेंस में बाँटा गया है। जब एक ऑटो ड्राइवर या बढ़ई का बेटा स्मार्ट बोर्ड्स, 3D प्रिंटर्स और रोबोटिक्स लैब्स में कोडिंग करता है, तो वह मैकोले के उस दो सौ साल पुराने संभ्रांत तिलिस्म पर सीधा वार होता है।
इस नए तालीमी माहौल को कानूनी हिफ़ाज़त देने के लिए दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम (DSEA 1973) और 2026 के त्रि-वर्षीय फीस नियमन के विधिक आदेश (SLFRC/DFAC) ने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस वसूली और मुनाफाखोरी पर सख्त लगाम कसी है, जिससे अवाम का भरोसा सरकारी स्कूलों पर और गहरा हुआ है। ज़मीनी स्तर पर दिल्ली SCERT ने पहली जमात में दाखिले के लिए 6 साल से ज्यादा की उम्र तय की है, ‘निपुण संकल्प’ के ज़रिए बुनियादी पढ़ाई का अभियान छेड़ा है, और 11 से ज़्यादा नए वोकेशनल कोर्सेज शुरू किए हैं। बच्चों की दिमागी सेहत और अख़लाक़ी तरबियत के लिए ‘नीव’ (NEEEV), ‘राष्ट्रनीति’ और ‘जीवन विज्ञान’ जैसे दिलकश सिलेबस जोड़े गए हैं। इम्तिहान के डर को निकालने के लिए राष्ट्रीय मूल्यांकन नियामक ‘परख’ (PARAKH) के तहत 360-डिग्री समग्र प्रगति पत्र (HPC) लाया गया है, जहाँ सिर्फ़ मास्टर साहब के नंबर नहीं चलते, बल्कि बच्चा खुद भी अपनी परख करता है और उसके साथी भी उसकी हौसला-अफज़ाई करते हैं। इसके साथ ही, ‘दीक्षा’ (DIKSHA) पोर्टल की डिजिटल लैब्स, पीएम ई-विद्या के 200 टीवी चैनल्स, और आईआईटी कानपुर के बनाए मुफ्त एआई पोर्टल ‘साथी’ (SATHEE) ने स्कूल के भीतर ही नीट और जेईई जैसी मुश्किल प्रतियोगिताओं की तैयारी कराकर महंगे कोचिंग माफिया के दबाव को काफी हद तक हल्का कर दिया है।
कक्षा की ज़मीनी दास्तान और शिक्षक की धड़कन
नीतियाँ और कानून भले ही दफ़्तरों के कमरों में बनते हों, लेकिन उन कागज़ों में जान फूँकने का काम क्लासरूम में खड़ा शिक्षक ही करता है। शिक्षक ही वह पुल है जो सरकारी आदेशों की स्याही को किसी मासूम के चेहरे की मुस्कुराहट में बदल देता है। आज हमारे स्कूलों में तैनात ‘NEP नोडल शिक्षक’ और अपनी सलाहियत निखारने के लिए बने ‘रिफ्लेक्टिव हब्स’ (Reflective Hubs) इस बात का सुबूत हैं कि टीचर अब सिर्फ़ हुक्म बजाने वाला मुलाज़िम नहीं, बल्कि सीखने-सिखाने के तौर-तरीकों को तराशने वाला फनकार बन चुका है। जब हम शिक्षक इन हब्स में बैठकर चर्चा करते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि हर बच्चे के सीखने का अंदाज़ जुदा होता है। रटे-रटाए लंबे भाषणों की जगह जब हम ‘फ़्लिप्ड क्लासरूम’ जैसी तकनीक अपनाते हैं जहाँ बच्चा घर पर आसान वीडियो देखकर बुनियादी सबक समझ लेता है और क्लास में तजुर्बे व सवालात करता है तो आखिरी बेंच पर दुबक कर बैठने वाला बच्चा भी महफ़िल की जान बन जाता है।
मुझे अपनी ही क्लास का एक छात्र ‘दानिश’ (बदला हुआ नाम) याद आता है। मुस्तफाबाद की पतली गलियों से आने वाले दानिश के वालिद लकड़ी के नक्काशीदार काम और बढ़ईगीरी से जुड़े थे। दानिश क्लास में हमेशा नज़रें चुराए रहता था और किताबी बातों के सामने खुद को कमतर और बेगाना समझता था। उसके ख़ानदानी हुनर को समाज कभी ‘पढ़ा-लिखा होना’ मानता ही नहीं था। लेकिन जब दिल्ली के स्कूलों में ‘जीवन विज्ञान’ और वोकेशनल पढ़ाई शुरू हुई, तो मैंने दानिश को मुख्यधारा से जोड़ने की ठानी। 10 बस्ता-रहित दिनों के दौरान जब बच्चों को ज्यामिति (ज्योमेट्री) और लकड़ी के खिलौनों के मॉडल बनाने का काम दिया गया, तो जिस दानिश को गणित के फार्मूलों से डर लगता था, उसने कोणों, अनुपातों और लकड़ी की संधियों को अपनी उंगलियों के फन से पलक झपकते ही दुरुस्त बिठा दिया।
दानिश की ही तरह मुझे हमारी ग्यारहवीं जमात के एक छात्र ‘अरबाज़’ (बदला हुआ नाम) का वाकया याद आता है। दिल्ली के स्कूलों में ‘नीव’ (NEEEV) और उद्यमिता की सोच के तहत जब छात्रों को सीड मनी (शुरुआती पूँजी) देकर खुद का छोटा प्रोजेक्ट शुरू करने का मौका मिला, तो उसने अपनी बस्ती के पुराने दर्ज़ियों और फैब्रिकेटर्स के काम से प्रेरणा ली। अरबाज़ ने कतरनों और बचे हुए कपड़ों को जोड़कर टिकाऊ कैरी बैग्स और लैपटॉप स्लीव्स बनाने का एक छोटा सा प्रोजेक्ट शुरू किया। जिस लड़के के परिवार ने कभी दफ़्तरों में छोटी-मोटी नौकरियों की तलाश के सिवा कुछ सोचा न था, उसने स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अपने मोहल्ले के दो कारीगरों को भी काम से जोड़ लिया। जब अरबाज़ ने अपनी प्रेजेंटेशन के दौरान पूरी क्लास के सामने गर्व से कहा, “सर, अब मुझे नौकरी की लाइन में नहीं लगना, मुझे तो अपने जैसे और लड़कों को काम देने वाला बनना है,” तो मुझे लगा कि नई शिक्षा नीति और दिल्ली के पाठ्यक्रमों का मक़सद पूरा हो रहा है। हमारी कक्षाएँ अब केवल डिग्री लेकर नौकरी तलाशने वाले नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होकर ‘जॉब क्रिएटर’ (रोज़गार पैदा करने वाले) नौजवान तैयार कर रही हैं।
क्लास के ये तजुर्बे बार-बार यही सिखाते हैं कि कोई भी बच्चा कमजोर या बेहुनर नहीं होता; कमी दरअसल हमारे उस पुराने संकीर्ण नज़रिए में थी जो हर प्रतिभा को इम्तिहान की एक ही संकरी छलनी से छानना चाहता था। शिक्षक दिवस के इस मौके पर हमें मुल्क की सतह पर यह अहद करना होगा कि हम अपनी तालीम को बाज़ार के दबावों और अंधी होड़ से आज़ाद कराकर एक पुरसुकून, इंसाफपसंद और संवेदनशील महफ़िल बनाएंगे। चुनौतियाँ आज भी बड़ी हैं, देश भर में शिक्षकों की खाली जगहों और बुनियादी कमियों को पूरी तरह दूर करना अभी बाकी है। लेकिन यूडाइस प्लस की प्रशासनिक सफाई, दिल्ली के सरकारी स्कूलों का यह नीतिगत तजुर्बा, शिक्षकों का पेशेवर स्वाभिमान और कक्षाओं में खिलती बच्चों की नई उम्मीद हमें यह यकीन दिलाती है कि हम सही रास्ते पर चल पड़े हैं। भारत के कल की असली तकदीर किसी वातानुकूलित थिंक-टैंक या कॉर्पोरेट मीनारों में नहीं, बल्कि हमारे इन्हीं आम सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में चाक की खड़िया से लिखी जा रही है, जहाँ हर सुबह एक खुशहाल, बराबर और खुददार भारत जन्म ले रहा होता है।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं।