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पुस्तक समीक्षा: इस्लाम का जन्म और विकास

मशहूर पाकिस्तानी इतिहासकार मुबारक अली लिखते हैं कि इस्लाम से पहले की तारीख़ दरअसल अरब क़बीलों का इतिहास माना जाता था। इस में हर क़बीले की तारीख़ और इस के रस्म-ओ-रिवाज का बयान किया जाता था। जो व्यक्ति तारीख़ को महफ़ूज़ रखने और फिर इसे बयान करने का काम करते थे उन्हें रावी या अख़बारी कहा जाता था। कुछ इतिहासकार इस्लाम और मुसलमान में फ़र्क़ करते हैं।

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हॉलीवुड, पश्चिमी मीडिया और ईरान: छवि निर्माण की राजनीति

**100 शब्दों में सारांश (हिंदी में):** आज की दुनिया में युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि छवियों, फिल्मों और मीडिया के ज़रिए भी लड़े जाते हैं। हॉलीवुड और पश्चिमी मीडिया ने एक वैचारिक "छवि युद्ध" छेड़ा है, जिसमें ईरान जैसे देशों को खलनायक, पिछड़ा और असहिष्णु दिखाया जाता है। *Argo*, *Homeland* जैसी फ़िल्में इस छवि को मज़बूत करती हैं। यह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि अमेरिकी सॉफ्ट पावर और वैश्विक जनमत निर्माण की रणनीति है। एडवर्ड सईद के "ओरिएंटलिज़्म" सिद्धांत के अनुसार, पश्चिम अक्सर पूर्व को नीचा दिखाता है। इसलिए जरूरी है कि दर्शक फिल्मों और मीडिया को आलोचनात्मक नजरिए से देखें और सच व प्रचार में फर्क करना सीखें।

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मुस्लिम स्वायत्तता या अशराफ़ नेतृत्व? शरजील इमाम के विचारों का पसमांदा जवाब

शरजील इमाम की मुस्लिम सियासी स्वायत्तता और आनुपातिक नुमाइंदगी की बहस पर पसमांदा नज़रिये से एक अहम सवाल उठता है—स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व का फ़ायदा समाज के किन तबक़ों तक पहुँचेगा? केवल मुस्लिम नुमाइंदगी बढ़ाना पर्याप्त नहीं; पसमांदा तबक़ों की बराबर हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करनी होगी। ऐसी स्वायत्तता, जिसमें फैसलों और संस्थानों पर प्रभावशाली अशराफ़ तबक़ों का दबदबा कायम रहे, सामाजिक इंसाफ़ और बराबरी की गारंटी नहीं दे सकती।

मुस्लिम स्वायत्तता या अशराफ़ नेतृत्व? शरजील इमाम के विचारों का पसमांदा जवाब

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आलस नहीं, परेशानी का संकेत भी हो सकती है ‘बेड-रोटिंग’

‘बेड-रोटिंग’ यानी लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना और फोन, रील्स या ऑनलाइन कंटेंट में समय बिताना आजकल चर्चा में है। आराम और बेड-रोटिंग में फर्क समझना ज़रूरी है। जब यह आदत जिम्मेदारियों से बचने, काम टालने या रोज़मर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो यह चिंता का कारण बन सकती है। जानिए बेड-रोटिंग की वजहें, सोशल मीडिया की भूमिका और इससे बाहर निकलने के आसान तरीके।

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गांधी को समझे बिना गांधी की प्रासंगिकता नहीं समझी जा सकती

महात्मा गांधी को याद करना और गांधी को समझना दो अलग बातें हैं। आज तकनीक, AI, आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और नफरत भरी भाषा के दौर में उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज, सर्वोदय और साधन-साध्य के विचार नए सवाल खड़े करते हैं। गांधी हर आधुनिक समस्या का तैयार समाधान नहीं देते, लेकिन वे हमें अपने उद्देश्य, साधनों और व्यवहार की नैतिक जांच करने के लिए प्रेरित करते हैं।

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत

नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, ग्लोबल साउथ की भूमिका और भारत की विदेश नीति को लेकर कई महत्वपूर्ण सवालों को सामने रखा। लेख में ब्रिक्स के विस्तार, भारत के ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ दृष्टिकोण, आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों की चर्चा की गई है। साथ ही, बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत की कूटनीतिक भूमिका का विश्लेषण किया गया है।

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भावनाओं से आगे बढ़कर शिक्षा और प्रतिनिधित्व पर ध्यान दे पसमांदा समाज।

सामाजिक न्याय और समान अवसर की बहस में पसमांदा समाज की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी अहम सवाल हैं। लंबे समय से सीमित अवसरों का सामना कर रहे इस समाज के लिए शिक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। छात्रवृत्ति, करियर मार्गदर्शन और उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के साथ युवाओं की प्रशासनिक, पेशेवर और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भागीदारी मजबूत करनी होगी। शिक्षा, जागरूकता और प्रतिनिधित्व ही आत्मनिर्भरता, सम्मान और सामाजिक बदलाव की मजबूत नींव बन सकते हैं।

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10 अगस्त: अरजाल और गैर-हिंदू दलितों के लिए क्यों है काला दिवस

यह लेख अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जाति के दर्जे पर लगी धार्मिक पाबंदी और उसके अरजाल (दलित मुसलमानों) व अन्य गैर-हिंदू दलितों पर प्रभाव की पड़ताल करता है। इसमें डॉ. आंबेडकर के विचारों, मुस्लिम समाज में जातिगत भेदभाव, विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों और सामाजिक संगठनों के संघर्ष के संदर्भ में समान अधिकार और धार्मिक पाबंदी हटाने की मांग को सामने रखा गया है।

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