लेखक ~ अब्दुल्लाह मंसूर
भारतीय समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान और समकालीन जन-विमर्श में मुस्लिम समुदाय को सदैव एक एकरूप, समरूप और अखंड सामाजिक इकाई के रूप में प्रस्तुत करने की एक गहरी और सोची-समझी बौद्धिक साजिश रही है। इस निर्मिति के पीछे अशराफी अभिजात वर्ग का वह वर्चस्ववादी और सामंती एजेंडा काम करता है, जो ‘मुस्लिम होमोजेनिटी’ और ‘इस्लामी समानता के सार्वभौमिक मिथक’ की चादर ओढ़कर समाज के भीतर मौजूद खौफनाक जातिगत खाई, छुआछूत और संस्थागत भेदभाव को छुपाए रखना चाहता है। यह निर्मित मिथक उस बुनियादी और ऐतिहासिक सवाल से टकराते ही ताश के पत्तों की तरह ध्वस्त हो जाता है कि: क्या भारत में धर्मांतरण ने दलितों और पिछड़ों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति या जातिगत दंश को बदला, अथवा केवल उनके उत्पीड़न का रूप, भाषा और नाम बदल दिया? ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय यथार्थ यह गवाही देता है कि इस्लामी समतावाद का सैद्धांतिक और रूहानी दावा भारतीय उपमहाद्वीप की कठोर, सामंती और जन्म-आधारित वर्ण व जातिवादी संरचना के सामने बेअसर साबित हुआ। डॉ. मो. अयुब राईन की दो खंडों में प्रकाशित, दोहरी अकादमिक और कानूनी समझ से समृद्ध शोध-पुस्तक ‘भारत के दलित मुसलमान’ इसी दबाए गए कड़वे सच का एक प्रामाणिक, साहसिक और ऐतिहासिक एक्स-रे प्रस्तुत करती है। पसमांदा विमर्श के समकालीन परिदृश्य में यह पुस्तक महज एक सामान्य अकादमिक अध्ययन या आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि पसमांदा आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ में भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर व्याप्त अशराफ़ी आधिपत्य, सामाजिक बहिष्कार, सांस्कृतिक बेदखली और आंतरिक औपनिवेशिकता के खिलाफ एक अत्यंत निर्णायक और क्रांतिकारी वैचारिक हस्तक्षेप है।
भारतीय मुस्लिम समाज के भीतर पेशों की ऊँच-नीच, सामाजिक प्रतिष्ठा और नस्ली श्रेष्ठता के आधार पर निर्मित अशराफ (विदेशी मूल के तथाकथित उच्च वर्गीय), अजलाफ (भारतीय मूल की पिछड़ी श्रमजीवी जातियां) और अरजाल (अति-दलित व अछूत जातियां) का यह त्रिस्तरीय सामाजिक ढांचा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा जो पसमांदा समाज (अजलाफ और अरजाल) है दोहरे और बहुस्तरीय उत्पीड़न की चक्की में पिस रहा है। एक तरफ राज्य, बहुसंख्यकवाद और दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा उनका सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हाशियाकरण किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के भीतर ही बैठा अशराफ़ी तबका उनके साथ घृणित सामाजिक छुआछूत, बस्तियों का अलगाव, वैवाहिक बेदखली और नसबी (रक्त-आधारित) श्रेष्ठतावाद का अमानवीय बर्ताव करता है। इस ऐतिहासिक उत्पीड़न में भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा संवैधानिक अन्याय 1950 का प्रेसिडेंशियल ऑर्डर (अनुच्छेद 341) बनकर सामने आता है। मुस्लिम और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति (SC) के संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण के दायरे से पूरी तरह बाहर कर दिया गया।
समाजशास्त्री खालिद अनीस अंसारी लिखते हैं कि अपने पूरे इतिहास में, अस्पृश्यता से प्रभावित समूहों ने अपने जीवन को बेहतर बनाने और कलंक से उबरने के लिए ऐतिहासिक रूप से उन सभी साधनों का उपयोग किया है जो उनके लिए उपलब्ध थे, जैसे धर्म परिवर्तन करना, संस्कृतिकरण करना, सार्वजनिक नीतियों पर जोर देना, शिक्षा प्राप्त करना और अपनी मतदान शक्ति का उपयोग करना। कभी-कभी ये प्रयास काम करते हैं, लेकिन अक्सर नहीं। जब लोग इस्लाम/ईसाई धर्म या सिख/बौद्ध धर्म जैसे अधिक समान माने जाने वाले धर्मों में परिवर्तित होते हैं, तो अक्सर यह कहा जाता है कि वे जाति को पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन हकीकत अक्सर अलग होती है। दलित मुस्लिम जातियां जैसे गधेरी (गधा पालने वाले), भंगी (मैला ढोने वाले), हलालखोर (सफाई करने वाले), लालबेगी (मैला ढोने वाले), भटियारा (सराय की देखभाल करने वाले), गोरकन (कब्र खोदने वाले), बक्खो (जिप्सी), नट (कलाबाज) जैसी अन्य जातियां अभी भी छुआछूत से उत्पन्न होने वाली अत्यधिक अक्षमताओं से संघर्ष का सामना कर रही हैं। इनमें से कई जातियां भी हिंदू धर्म का पालन करती हैं और एससी सूची में हैं, लेकिन समान रूप से स्थित मुस्लिम के साथ नहीं हैं। मस्जिदों, कब्रिस्तानों, मदरसों, सामुदायिक संगठनों और व्यापक नागरिक समाज जैसे धार्मिक-सामुदायिक स्थानों में उनकी जातियों से जुड़े कलंक के कारण भेदभाव के दस्तावेजी सबूत हैं। धर्मांतरण के बाद भी दलितपन आपके साथ रहता है। धर्म परिवर्तन करने पर भी दलित होने का कलंक लगा रहता है।
‘भारत के दलित मुसलमान’ किताब के पन्नों में दर्ज दर्जनों शोषित जातियों का ऐतिहासिक अध्ययन इस बात को उजागर करता है कि इन जातियों की मूल जड़ें भारतीय समाज के श्रमजीवी और दस्तकार ढांचे में फैली थीं। गद्दी या घोषी समाज मूलतः हिंदू ‘अहीर’ या ग्वाला बिरादरी से धर्मांतरित होकर मुस्लिम समाज का हिस्सा बना, जिनका काम मवेशी पालना और दूध बेचना था। बक्खो समाज एक पूरी तरह से भूमिहीन, घुमंतू और खानाबदोश आदिवासी पृष्ठभूमि का समुदाय है, जो नालों या जमींदारों की जमीन पर सिरकी (सरकंडे का तंबू) तानकर जीवन बिताता है।
मुकेरी जाति की जड़ें राजस्थान के मकराना या गल्ला व्यापार से जुड़ी थीं, जबकि मीरशिकार जंगलों के बहेलिया और फौजी दस्तों के अंग थे। परंतु धर्म परिवर्तन के बाद भी इनकी उत्पत्ति और पेशे को अशराफो ने ‘कमतर’ माना। हलालखोर, धोबी और फकीर जैसी अछूत मानी जाने वाली जातियों के साथ अशराफ मुसलमानों द्वारा आज भी ऐसी अघोषित अस्पृश्यता बरती जाती है कि उन्हें गांवों और मुस्लिम मोहल्लों के मुख्य दायरे से बाहर, कब्रिस्तानों, नालों या मजारों के किनारे अपनी बस्तियां गढ़ने पर मजबूर होना पड़ता है। अशराफ समूह मुस्लिम धोबी को भी अपने घरों के अन्दर नहीं आने देता है। “डोम घर खैबो, धोब घर न खैबो” जैसी घृणास्पद और जातिवादी कहावतों से धोबी समाज के मानवीय सम्मान को रोज कुचला गया। “सब जात से हारा, नाम पड़ा भठियारा” या “आगे नाथ न पीछे पगहा, बीच बाजार में नाचे गदहा” जैसे जातिवादी तंज कसकर गदहेड़ी (ईंटपज) और भठियारा समाज का सार्वजनिक उपहास उड़ाया गया। चूड़ीहार और लहेरियों का मज़ाक उड़ाते हुए अशराफ ताना मारते थे कि “तीन लहेड़ी तेरह हुक्का, फिर भी आपस में धक्कम धुक्का” या “लहेरी के लाह की तरह ऐंठता है”।

यह छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार केवल कहावतों तक सीमित नहीं है, बल्कि किताब में इसके भयानक और जीवंत सामाजिक साक्ष्य दर्ज हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के लोमा गाँव का ऐतिहासिक वाकया इस आंतरिक छुआछूत का नग्न उदाहरण है, जहाँ शेख जाति के अशराफों द्वारा मुस्लिम धोबी को मस्जिद के मोअज्जीन (अज़ान देने वाले) पद से महज़ उनकी जाति के कारण बेदखल कर दिया गया। इसी तरह, बैकवर्ड कमीशन के सामने मसौढ़ी रेलवे स्टेशन पर सवर्ण मुसलमानों का बयान पसमांदा-विरोधी मानसिकता की पराकाष्ठा को दिखाता है; जब जस्टिस सरवर अली के कमीशन ने पूछा कि क्या अछूत मानी जाने वाली ‘बक्खो’ जाति के लोग मस्जिद जाते हैं, तो अशरफों ने बेशर्मी से कहा कि “मस्जिद अल्लाह का घर है, वहाँ कौन रोकेगा, लेकिन हम इन्हें अपनी शादियों और दावतों में नहीं बुलाते; खाना बच जाता है तो दे देते हैं, क्योंकि ये झोपड़ियों में रहते हैं और इनके बर्तनों में सूअर-कुत्ते की गंदगी होती है, हम इनके साथ बैठना भी पसंद नहीं करते।” वहीं, बदलते तकनीकी युग, आधुनिक बाजार के एकाधिकार, 80 के दशक के एनिमल एक्ट जैसे कड़े कानूनों और सरकारी उपेक्षा ने मीरशिकार, शिकलगर, नालबन्द और गदहेड़ी जैसी हुनरमंद जातियों की पुश्तैनी आर्थिक रीढ़ को पूरी तरह तोड़ दिया। वे श्रमजीवी जातियां जो कभी उत्पादन व्यवस्था का केंद्र थीं और अपनी मेहनत पर खुद्दारी से जीती थीं, आज महज भूमिहीन दिहाड़ी मजदूरी, कबाड़ बीनने और घोर बदहाली के दलदल में फंसकर रह गई हैं। इसके साथ ही, मिरासी, मनिहार या बक्खो जैसे खानाबदोश समुदायों की औरतें न केवल परिवार की आर्थिक रीढ़ संभालती हैं, बल्कि वे समाज के भीतर और बाहर जाति, वर्ग और लिंग के स्तर पर ‘तिहरे दमन’ की भयावह शिकार होती हैं। अशरफ़ी और पुरुषवादी नजरिए ने उनकी मेहनत को वाजिब सम्मान देने के बजाय उन्हें हमेशा सामाजिक कलंक, उपहास और संदिग्ध चरित्र की दृष्टि से देखा।
लेखक डॉ. राईन के इस समाजशास्त्रीय विश्लेषण की सबसे गहरी, सूक्ष्म और मारक परत वह है, जहां वे ‘अशरफ़ीकरण’ और ‘अरबीकरण’ के उस वर्चस्ववादी सांस्कृतिक खेल को पूरी तरह नंगा करते हैं, जिसने पसमांदा जातियों को आत्म-हीनता के गर्त में धकेला है। ‘अशराफ़ीकरण’ मुस्लिम समाज में संस्कृतिकरण की ही तरह काम करती है। जहाँ पसमांदा जातियां खुद को अशराफ दिखाने के लिए उनके जैसा दिखने की कोशिश करती हैं। इस आत्मघाती प्रक्रिया के तहत पसमांदा समाज ने अपनी वास्तविक भारतीय श्रमजीवी पहचान, ऐतिहासिक कला और हुनर से लज्जित होकर समाज में सम्मान और बराबरी पाने की अंधी आस में अपने उपनाम बदले जैसे बुनकरों ने खुद को ‘अंसारी’, धुनियों ने ‘मंसूरी’, कुंजड़ों ने ‘राईन’, हज्जामों ने ‘सलमानी’, धोबियों ने ‘हवारी/साफी’, दर्जियों ने ‘इदरिसी’, दफालियों ने ‘हाशमी’, भठियारों ने ‘फारुकी’, गदहेड़ियों ने ‘इब्राहिमी’ और बक्खो समाज ने ‘अय्युबी’ कहना शुरू किया। परंतु डॉ. राईन की यह पुस्तक अपने समाजशास्त्रीय साक्ष्यों से सिद्ध करती है कि महज अरबी या अशरफ़ी उपनाम अपना लेने से अशराफों के सामंती और जातिवादी नजरिए में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया; जब मूल अशराफ शेख इनसे पूछते हैं कि कौन से शेख हो, तब इन्हें मजबूरन ‘शेख इदरिसी’ या ‘शेख हलालखोर’ कहना पड़ता है, और अशरफ तुरंत समझ जाते हैं कि ये निचले दर्जे के लोग हैं और इनसे खानदानी व वैवाहिक रिश्ता नहीं बनाया जा सकता।
इसी अशराफ़ी आधिपत्य ने ‘अरबीकरण’ और विदेशी नस्ली श्रेष्ठता की एक अत्यंत शातिर राजनीति चलाई, जिसके तहत मध्य-पूर्व, अफगान, फारस और तुर्क नस्ल की संस्कृति, पोशाक, भाषा और रहन-सहन को ही ‘असली, पवित्र और प्रामाणिक इस्लाम’ के रूप में स्थापित किया गया, जबकि भारत की स्थानीय मिट्टी से उपजी दस्तकार, श्रमजीवी और कलात्मक संस्कृति को ‘हीन’, ‘कमतर’ और ‘गैर-इस्लामी’ घोषित कर दिया गया।
ऐतिहासिक रूप से इस यथार्थ को नकारा नहीं जा सकता कि इन शासकों और उनके विदेशी अमीरों की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संप्रभुता हमेशा भारत से बाहर रही; अरब, तुर्क, खिलजी और लोधी शासनकाल के दौरान भी मुस्लिम पहचान कभी एक जैसी नहीं रही, बल्कि इन सम्राटों की विदेशी नस्ली पहचान हमेशा प्रमुख बनी रही।शासक वर्ग अपनी दरबारी भाषाओं के ज़रिए स्थानीय संस्कृति से घृणा करता था और अपने शजरे (वंशावली) तथा नामों के साथ अपने मूल विदेशी शहरों को जोड़कर नसबी श्रेष्ठता का ढोल पीटता था। हिंदी सिनेमा और उर्दू साहित्य ने भी इस अशराफ़ संस्कृति को ही वास्तविक ‘मुस्लिम संस्कृति’ के रूप में स्थापित करने का काम किया। विदेशी संस्कृति को थोपे जाने की इस अंधी प्रक्रिया में पसमांदा मुसलमान अपनी समृद्ध स्थानीय जड़ों और मूल संस्कृति से विमुख होते चले गए, जबकि अशराफ़ों ने उन्हें कभी अपना हिस्सा नहीं माना और न ही उनके साथ कोई सामाजिक मेलजोल रखा। यह टकराव वस्तुतः अशराफों की ‘नसबी श्रेष्ठता’ और पसमांदा समाज की ‘श्रम की गरिमा’ के बीच का ऐतिहासिक व वैचारिक द्वंद्व है, जहां अशराफों की परजीवी, गैर-उत्पादक और सामंती सोच ने पसमांदा समाज की सृजनात्मक, उत्पादक और आत्मनिर्भर क्षमता को लगातार हाशिए पर धकेला है।
डॉ. अयुब राईन द्वारा पुस्तक में प्रस्तुत इस जमीनी यथार्थ को यदि हम आधुनिक समाजशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के आईने में परखें, तो पसमांदा और दलित मुसलमानों के साथ हुए इस संस्थागत और ऐतिहासिक षड्यंत्र का ताना-बाना पूरी तरह उजागर हो जाता है। पियरे बोर्दिओ (Pierre Bourdieu) के ‘सांस्कृतिक एवं प्रतीक पूंजी’ के सिद्धांत के अनुसार, अशराफी तबके ने ऐतिहासिक रूप से देश भर के वक्फ बोर्डों की हजारों एकड़ बेशकीमती जमीनों, धार्मिक मदरसों, और भाषा व साहित्य (उर्दू विमर्श) पर अपना एकाधिकार जमाकर उसे अपनी ‘सांस्कृतिक और प्रतीक पूंजी’ में तब्दील कर लिया। आज भी हिंदी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) या जामिया मिलिया इस्लामिया जैसे धर्म और अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर चलने वाले शीर्ष संस्थानों के नीति-निर्धारण और उच्च पदों पर आज भी केवल अशराफ़ी नेतृत्व का कब्जा है, जबकि पसमांदा और अरजाल जातियों के बच्चों के लिए वहां के दरवाजे लगभग बंद हैं। अशरफ़ों ने पसमांदा जातियों की स्थानीय कला, ज्ञान और उत्पादन-श्रम को कभी सांस्कृतिक पूंजी स्वीकार ही नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप ये श्रमजीवी जातियां संस्थागत संसाधनों और राज्य के लाभों से पूरी तरह बेदखल कर दी गईं।
एंटोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) के ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (Cultural Hegemony) के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि कैसे अशराफ़ी नेतृत्व ने पसमांदा समाज के मानस पर ‘अल्पसंख्यक खतरे’ का भ्रम और बाबरी मस्जिद, उर्दू, एएमयू या पर्सनल लॉ जैसे जज़्बाती मुद्दों का जाल बिछाकर उनकी चेतना को बंधक बनाया। इन जज़्बाती नारों से अशराफ़ अपने राजनीतिक हित साधते हैं और ‘अशरफ़ीकृत’ पसमांदा चेतना को आगे करके समाज के आंतरिक जातिगत विरोधाभासों को दबाते हैं, जिससे विडंबनापूर्ण रूप से हिंदुत्ववादी राजनीति की रोज़ी-रोटी भी चलती है। मुख्यधारा की मुस्लिम संस्कृति में कव्वाली, ग़ज़ल और सर सैयद, जिन्ना या इक़बाल जैसे अशराफ़ चेहरों का गुणगान तो हुआ, लेकिन बक्खो के लोकगीत, जुलाहों के करघे और अब्दुल कैयूम अंसारी, वीर अब्दुल हमीद या आसिम बिहारी जैसे वास्तविक पसमांदा नायकों के लिए कोई जगह नहीं रखी गई। अतः यह स्पष्ट है कि जिस तरह ‘हिंदू’ राजनीति से दलित-बहुजन का कोई भला नहीं होता, उसी तरह ‘मुस्लिम एकता’ का छद्म नारा भी पसमांदा समाज के लिए सरासर घाटे का सौदा है; इसलिए आज ‘मुस्लिम’ और ‘हिंदू’ की भ्रामक पहचानों व मजहबी पागलपन से अलग हटकर सभी धर्मों की शोषित जातियों (पसमांदा-बहुजन) की साझा एकजुटता ही वास्तविक मुक्ति का एकमात्र क्रांतिकारी रास्ता है।
डॉ. मो. अयुब राईन की यह कालजयी पुस्तक ‘भारत के दलित मुसलमान’ केवल अतीत के पन्नों का कोई बेजान दस्तावेज़ या बंद कमरों में लिखा गया अकादमिक शोध ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह पसमांदा, दलित और शोषित मुस्लिम चेतना को गढ़ने और उसे धार देने का एक जलता हुआ वैचारिक व राजनीतिक औजार है। यह पुस्तक खोखले मजहबी समतावाद के नारों को खारिज करते हुए पसमांदा समाज को अपनी मूल भारतीय श्रमजीवी पहचान, माटी और हुनर पर गर्व करने की अटूट प्रेरणा देती है। अब समय आ गया है कि पसमांदा समाज अशराफ़ी आधिपत्य की इस वैचारिक और मानसिक गुलामी से स्वयं को पूरी तरह आजाद करे। अल्पसंख्यक संस्थानों में अपनी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी मांगने और 1950 के अनुच्छेद 341 के धार्मिक प्रतिबंध की दीवार को ढहाने के लिए पसमांदा समाज को “दलित दलित एक समान हिंदू हो या मुसलमान” के इंकलाबी नारे को अपना मूलमंत्र बनाना होगा। पसमांदा और दलित मुसलमानों के वास्तविक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक सशक्तिकरण का रास्ता किसी अशराफी रहम-ओ-करम या मजहबी हमदर्दी से नहीं, बल्कि वृहद बहुजन-पसमांदा (SC/ST/OBC) की ऐतिहासिक साझा एकजुटता, सांस्कृतिक चेतना और सड़क से संसद तक के संघर्ष से होकर ही गुजरता है; और यह पुस्तक इसी इंकलाबी रास्ते का एक बेहद सशक्त और अनिवार्य मशाल-नामा है।
अब्दुल्लाह मंसूर शिक्षक, लेखक और बुद्धिजीवी हैं। वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों और मुस्लिम समाज में जाति व सामाजिक न्याय से जुड़े पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।