लेखक ~अब्दुल्लाह मंसूर
महात्मा गांधी जयंती पर हर साल महात्मा गांधी को याद किया जाता है। उनकी तस्वीरें लगती हैं, उनके कथन दोहराए जाते हैं और उनके जीवन पर चर्चाएं होती हैं। लेकिन गांधी को याद करना और गांधी को समझना दो अलग बातें हैं। सवाल यह है कि आज, जब दुनिया तकनीक, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आर्थिक असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और हिंसक और अश्लिल भाषा जैसी नई चुनौतियों से गुजर रही है, गांधी हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं? क्या गांधी केवल स्वतंत्रता आंदोलन के नेता थे या उनके पास व्यक्ति, समाज, राजनीति और विकास को समझने का कोई व्यापक दर्शन भी था?
गांधी की प्रासंगिकता का उत्तर उनके जीवन और विचारों के संबंध में छिपा है। वे किसी एक बंद सिद्धांत के प्रवक्ता नहीं थे। वे अपने विचारों को जीवन की वास्तविक समस्याओं पर आजमाते थे और अनुभव के आधार पर उनमें सुधार करते थे। इसलिए गांधीवाद को उनके लिए कोई अलग “वाद” मानना भी पूरी तरह सही नहीं है। वे सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम, न्याय और मनुष्य की गरिमा जैसे मूल्यों को रोजमर्रा के जीवन और राजनीति में लागू करने का प्रयास करते थे।
सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह से राजनीति तक
महात्मा गांधी के दर्शन की शुरुआत सत्य से होती है। उनके लिए सत्य केवल झूठ न बोलने की आदत नहीं था, बल्कि जीवन की नैतिक दिशा था। सत्य के साथ अहिंसा जुड़ी थी। अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं था। घृणा, छल, अपमान, अन्याय और दूसरे मनुष्य को केवल शत्रु मान लेने की मानसिकता भी गांधी की व्यापक नैतिक दृष्टि में समस्या थी।
महात्मा गांधी मनुष्य को पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं मानते थे। उनके अनुसार मनुष्य में ऊंची और नीची दोनों प्रवृत्तियां मौजूद रहती हैं। इसलिए सामाजिक परिवर्तन केवल बाहरी व्यवस्था बदल देने से पूरा नहीं हो सकता। व्यक्ति के भीतर भी लालच, भय, घृणा और पूर्वाग्रह से संघर्ष जरूरी है। भगवद्गीता के कुरुक्षेत्र को उन्होंने केवल ऐतिहासिक युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले नैतिक संघर्ष के प्रतीक के रूप में भी देखा। इसी कारण गांधी के यहां राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आत्मशासन का विचार आता है।
यहीं से सत्याग्रह को समझना आसान होता है। सत्याग्रह का अर्थ निष्क्रिय होकर अन्याय सहना नहीं था। यह सत्य और अहिंसा के आधार पर अन्याय के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष था। असहयोग, बहिष्कार, सविनय अवज्ञा, धरना, उपवास और शांतिपूर्ण प्रतिरोध इसके साधन बने। 12 मार्च 1930 को शुरू हुआ दांडी मार्च और 6 अप्रैल को नमक कानून तोड़ना इसका ऐतिहासिक उदाहरण है। गांधी हेरिटेज पोर्टल में इन घटनाओं का विस्तृत दस्तावेजी विवरण उपलब्ध है।
सत्याग्रह की विशेषता यह थी कि उसका लक्ष्य विरोधी को नष्ट करना नहीं था। गांधी चाहते थे कि अन्याय का प्रतिरोध करते हुए विरोधी के विवेक को भी संबोधित किया जाए। इसके लिए सत्याग्रही को आत्मअनुशासन, त्याग और कष्ट सहने की तैयारी रखनी होती थी। इस अर्थ में अहिंसा कमजोरी नहीं, बल्कि साहस की मांग करने वाली शक्ति थी।
महात्मा गांधी के राजनीतिक दर्शन को समझने के लिए दूसरा केंद्रीय विचार है-साधन और साध्य। उनका मानना था कि अच्छे उद्देश्य तक पहुंचने के लिए गलत साधनों को उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने साधन को बीज और साध्य को पेड़ की तरह समझाया था। जैसा बीज होगा, वैसा ही पेड़ विकसित होगा।
आज लोकतंत्र में इस विचार की प्रासंगिकता बहुत स्पष्ट है। सरकार की नीतियों, कानूनों या प्रशासनिक फैसलों से असहमति होना लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है। नागरिक सवाल उठा सकते हैं, विरोध कर सकते हैं और शांतिपूर्ण तथा लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रख सकते हैं। लेकिन असहमति का अर्थ हिंसा, अफवाह, नफरत, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या किसी समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाना नहीं हो सकता। गांधी की कसौटी पर केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि हम किस उद्देश्य के लिए संघर्ष कर रहे हैं; यह भी देखना होगा कि उस संघर्ष के दौरान हमारे साधन हमें किस तरह का समाज बनाने की ओर ले जा रहे हैं।
यही बात आज सोशल मीडिया पर भी लागू होती है। कोई खबर या वीडियो तेजी से फैल रहा हो, तो उसका वायरल होना उसे सत्य नहीं बना देता। पुराना वीडियो, काट-छांटकर पेश किया गया बयान या अधूरी जानकारी समाज में गलत धारणा पैदा कर सकती है। गांधी के सत्य के आग्रह को आज डिजिटल जिम्मेदारी के रूप में पढ़ा जा सकता है। साझा करने से पहले जांचना, असहमति में भी दूसरे का सम्मान बनाए रखना और अपनी बात मजबूत करने के लिए झूठ का सहारा न लेना।
स्वराज, सर्वोदय और न्यायपूर्ण समाज
महात्मा गांधी के लिए स्वराज का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं था। यदि विदेशी सत्ता चली जाए लेकिन व्यक्ति लालच, भय, सामाजिक पूर्वाग्रह और दूसरों पर निर्भर मानसिकता का गुलाम बना रहे, तो गांधी की दृष्टि में आजादी अधूरी रहेगी। इसलिए स्वराज का अर्थ आत्मशासन भी थी। व्यक्ति का अपने ऊपर नियंत्रण और समाज का अपने मामलों में सक्रिय भाग लेना।
इसी सोच से उनका विकेंद्रीकरण का विचार जुड़ता है। गांधी अत्यधिक केंद्रीकृत सत्ता को लेकर सावधान थे। वे चाहते थे कि शासन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़े और गांव केवल प्रशासन की इकाई न होकर सामाजिक और आर्थिक जीवन के सक्रिय केंद्र बनें। इसका अर्थ आधुनिक राज्य को पूरी तरह समाप्त करना नहीं था, बल्कि सत्ता को नीचे तक पहुंचाना और नागरिकों को शासन में भागीदार बनाना था।
महात्मा गांधी की राज्य संबंधी सोच में भी यही सावधानी दिखाई देती है। वे राज्य की संगठित शक्ति और केंद्रीकरण से चिंतित थे, क्योंकि सत्ता का अत्यधिक संकेंद्रण व्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ अराजकता या बिना शासन के समाज की वकालत करना नहीं था। वे ऐसे लोकतांत्रिक समाज की कल्पना करते थे जिसमें नागरिक जिम्मेदार हों, सत्ता पर नियंत्रण हो और स्थानीय स्तर पर भागीदारी मजबूत हो।
सर्वोदय इसी राजनीतिक सोच का सामाजिक विस्तार था-सबका उदय। गांधी के लिए स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तब पूरा होगा जब समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को भी सम्मान, अवसर और सुरक्षा मिले। अस्पृश्यता, गरीबी, शोषण, बेरोजगारी और सामाजिक भेदभाव के रहते केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं हो सकती। जाति और अस्पृश्यता के प्रश्न पर गांधी के विचारों की अपनी सीमाएं थीं और डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ उनके महत्वपूर्ण मतभेद भी रहे। इसलिए गांधी को समझने का अर्थ उनकी आलोचनाओं को छिपाना नहीं, बल्कि उनके योगदान और सीमाओं दोनों को ऐतिहासिक संदर्भ में देखना है।
आर्थिक जीवन में गांधी का सवाल आज भी असुविधाजनक है, मनुष्य की जरूरत कहां समाप्त होती है और लालच कहां शुरू होता है? उनका ट्रस्टीशिप का विचार संपत्ति को केवल निजी अधिकार न मानकर सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास था। वे अत्यधिक संपत्ति-संचय और आर्थिक असमानता की समस्या को हिंसक वर्ग संघर्ष के बजाय जिम्मेदारी, संयम और सामाजिक सहयोग के रास्ते से संबोधित करना चाहते थे। उनके आर्थिक विचारों से पूरी तरह सहमत होना जरूरी नहीं, लेकिन आज बढ़ती असमानता के बीच उनका यह सवाल महत्वपूर्ण है कि विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है।
शिक्षा के बारे में भी गांधी की दृष्टि व्यापक थी। शिक्षा केवल पढ़ना-लिखना सीख लेना नहीं, बल्कि व्यक्ति में समझ, चरित्र, आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी पैदा करना है। आज सूचना की कमी नहीं है; समस्या यह है कि सही और गलत सूचना में फर्क कैसे किया जाए। इस संदर्भ में शिक्षा का उद्देश्य और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
मशीन, AI और बदलती दुनिया में गांधी
महात्मा गांधी को अक्सर मशीनों के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह उनकी स्थिति का बहुत सरल रूप है। उनकी चिंता हर मशीन से नहीं, बल्कि ऐसी मशीन-केंद्रित औद्योगिक व्यवस्था से थी जिसमें उत्पादन और मुनाफे की दौड़ में मनुष्य, श्रम और रोजगार पीछे छूट जाएं। उनका सवाल था कि तकनीक मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने के लिए है या मनुष्य को तकनीक और उत्पादन की जरूरतों के अनुसार ढालने के लिए।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI के दौर में यही सवाल नए रूप में सामने है। AI शिक्षा, चिकित्सा, शोध, प्रशासन और रोजमर्रा के कामों को अधिक सुविधाजनक बना सकती है। लेकिन रोजगार, निजता, निगरानी, गलत सूचना, पक्षपात और मानवीय रचनात्मकता से जुड़े प्रश्न भी सामने हैं। गांधी आज की किसी तकनीक को स्वीकार या अस्वीकार करने का तैयार उत्तर शायद नहीं देते, लेकिन उनका मनुष्य-केंद्रित दृष्टिकोण हमें यह पूछने के लिए प्रेरित करता है कि तकनीक का अंतिम लाभ किसे मिल रहा है और क्या वह मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा और अवसर बढ़ा रही है।
गांधी की सोच केवल भारत तक सीमित नहीं थी। वे ऐसी विश्व-व्यवस्था की कल्पना करते थे जिसमें राष्ट्र केवल शक्ति और प्रतिस्पर्धा के आधार पर एक-दूसरे को न देखें, बल्कि सहयोग और पारस्परिक निर्भरता को भी स्वीकार करें। दो विश्व युद्धों के बाद भी विश्व शांति का प्रश्न समाप्त नहीं हुआ है। आज युद्ध, हथियारों की दौड़ और अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच गांधी की अहिंसा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि स्थायी शांति केवल शक्ति के संतुलन से आएगी या संवाद और सहयोग की भी जरूरत होगी।
इसलिए गांधी की प्रासंगिकता उनकी तस्वीर, चश्मे, चरखे या कुछ प्रसिद्ध कथनों में नहीं है। उनकी असली प्रासंगिकता उन सवालों में है जो वे हमारे सामने छोड़ गए हैं, क्या हमारा उद्देश्य सही है? क्या उसे पाने का रास्ता भी सही है? क्या हम असहमति के बीच दूसरे मनुष्य का सम्मान बचा सकते हैं? क्या विकास में सबसे कमजोर व्यक्ति दिखाई देता है? क्या शिक्षा हमें केवल सूचना दे रही है या विवेक भी दे रही है? और क्या तकनीक मनुष्य की सेवा कर रही है?
महात्मा गांधी हर आधुनिक समस्या का तैयार समाधान नहीं देते। उनके कई विचारों पर आज भी बहस और आलोचना जरूरी है। लेकिन शायद यही उनकी स्थायी प्रासंगिकता है। वे हमें किसी एक उत्तर को अंतिम मान लेने के बजाय अपने उद्देश्य, साधन और व्यवहार की नैतिक जांच करने के लिए मजबूर करते हैं। गांधी जयंती पर उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका शायद यही है कि गांधी को केवल अतीत के महात्मा के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान के कठिन सवालों के सामने खड़े एक नैतिक प्रश्न के रूप में पढ़ा जाए।