अब्दुल्लाह मंसूर
उर्दू भाषा को लंबे समय से मुस्लिम समुदाय की पहचान के रूप में देखा गया है, जिसका प्रभाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और विभाजन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. यह धारणा विशेष रूप से भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन के दौर में उभरी, जब उर्दू भाषा को धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना गया. हालांकि, यह विचारधारा भाषा की वास्तविक बहुलवादी और समावेशी प्रकृति को नकारती है, जो विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों से प्रेरित रही है.
इस लेख में हम उर्दू के इस सांप्रदायिक पहचान के निर्माण की पृष्ठभूमि, इसके परिणामस्वरूप हुए विभाजन और इसके खिलाफ उभरते सामाजिक न्याय के आंदोलनों की समीक्षा करेंगे. विशेष रूप से पसमांदा आंदोलन का विश्लेषण करते हुए, यह लेख उन प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करेगा, जो उर्दू को केवल एक धार्मिक भाषा के रूप में देखने के बजाय इसे एक बहुभाषी और सामाजिक न्याय के उपकरण के रूप में पुनःस्थापित कर रहे हैं.
अंततः यह लेख उर्दू भाषा के भविष्य और भारत में इसके सकारात्मक विकास की संभावनाओं को लेकर एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगा.
हिंदी-उर्दू विवाद: औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम
हिंदी-उर्दू विवाद का गहरा संबंध भारत के औपनिवेशिक इतिहास और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति से रहा है. यह विवाद मात्र भाषाई नहीं , बल्कि हिंदू और मुस्लिम पहचान के बीच विभाजन की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा था.
ब्रिटिश शासन ने भाषाई पहचान को धार्मिक पहचान के साथ जोड़ने का काम किया. जनगणना के दौरान अंग्रेजों ने हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाओं के रूप में दर्ज करना शुरू किया, जिससे दोनों समुदायों के बीच अलगाव की भावना और गहरी हो गई.
पाकिस्तानी प्रोफेसर इश्तियाक अहमद लिखते हैं कि यूपी के लिए सरकारी जबान के तौर पर हिंदी की मांग ने हिंदू पढ़े-लिखे लोगों के बीच काफी हमायत हासिल की, क्योंकि यूपी ज्यादातर हिंदू-अक्सरियत वाला सूबा था. मुसलमान सिर्फ 13-15 फीसदी आबादी थे.
इससे पहले, बिहार में, उर्दू की जगह हिंदी ले ली गई थी. अब मुसलमान अशराफ के गढ़, शुमाली हिंदुस्तान के यूनाइटेड प्रोविंसेज को भी ऐसा ही होने का खौफ था.एक मुसलमान तहरीक उभरी जिसमें सर सैयद और दूसरों की जोरदार मुखालफत शामिल थी.
सर सैयद की 1898 में वफात हो गई. 1900 में, यूपी हुकूमत ने मुसलमानों की मुखालफत को मानते हुए एक हुक्म जारी किया जिसमें हिंदी और उर्दू दोनों को बराबर का दर्जा दिया गया. यूपी की आबादी का सिर्फ 15 फीसदी होने के बावजूद, 1857 में मुसलमानों के पास 64 फीसदी नौकरियां थीं.
हिंदी की शुरुआत के बाद मुसलमानों की तादाद कम हो गई, लेकिन 1913 में भी मुसलमानों के पास अभी भी 35 फीसदी नौकरियां थीं, जो उनकी आबादी की ताकत से दोगुना से ज्यादा था.जनवरी 1881 में, सरकार ने उर्दू को हटाकर हिंदी को अदालती भाषा के रूप में प्रस्तुत किया था.
यह बिहार के मुसलमानों और कायस्थों के शिक्षित वर्ग के लिए एक गंभीर खतरा था. दोनों ने इसका विरोध किया. इससे दोनों समुदायों के बीच कुछ तनाव भी देखने को मिला. लेकिन, चूंकि मुसलमान और कायस्थ दोनों ने नागरी के उपयोग का विरोध किया, इसलिए विवाद तीखे सांप्रदायिक विभाजन में नहीं बदल सका. जबकि, उसी अवधि में, उसी मुद्दे पर, हम यूपी के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक बड़ी दरार देखते हैं.
सर सैयद अहमद खान ने उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित किया. इसे मुस्लिम पहचान से जोड़ा.उर्दू को सरकारी नौकरियों और अदालतों में बनाए रखने के लिए अभियान चलाया. हिंदी के बजाय उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रोत्साहित किया.इसलिए हिंदी की मांग नाजायज नहीं थी. लेकिन उर्दू का बचाव, सर सैयद के शागिर्दों के लिए, एक वजूदी खतरे का मसला बन गया.
19वीं सदी के अंत में, हिंदी और उर्दू के समर्थकों ने अपनी-अपनी भाषा को सरकारी कामकाज में स्थान दिलाने के लिए आंदोलन किए. इन आंदोलनों ने हिंदू और मुस्लिम पहचान को और मजबूत किया. दोनों भाषाओं के बीच की खाई चौड़ी होती चली गई. हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाया गया, जबकि उर्दू में फारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग बढ़ता गया. इससे दोनों भाषाओं का सांस्कृतिक और राजनीतिक विभाजन और भी स्पष्ट हो गया.
उर्दू: धार्मिक पहचान या सांस्कृतिक धरोहर?
उर्दू की पहचान को लेकर भारत और पाकिस्तान में जो राजनीति हुई, उसने दोनों देशों के सांस्कृतिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को गहरा किया. भारत में, उर्दू को मुस्लिम भाषा के रूप में देखा जाने लगा, जबकि पाकिस्तान में इसे राष्ट्रीय और इस्लामी पहचान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया. इस विभाजन ने न केवल भाषाई, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाला.
ब्रिटिश शासनकाल में, उर्दू का सांप्रदायिकरण हुआ. इसे मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान के साथ जोड़ा गया. यह प्रक्रिया मुख्यतः 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में हुई, जब उर्दू और हिंदी के बीच विवाद ने उर्दू को मुस्लिम समुदाय के साथ और हिंदी को हिंदू समुदाय के साथ जोड़कर देखा.
इस प्रक्रिया में, उर्दू को फारसी और अरबी शब्दावली के साथ और अधिक जोड़ा गया, जिससे यह मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गई.जब उर्दू को मुस्लिम पहचान से जोड़ा जाने लगा, तब पसमांदा मुसलमानों की आवाज़ इस विमर्श में दब गई.
उर्दू को उच्च वर्ग और शिक्षित मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि पसमांदा समुदायों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को नज़रअंदाज कर दिया गया. पसमांदा समाज ने हमेशा भाषा को वर्ग और जाति के नजरिए से देखा.
उनका मानना रहा है कि उर्दू या कोई भी भाषा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं हो सकती. पसमांदा समाज भारत की बहुसंख्यक हिंदू समाज के साथ रहता है. वह वही भाषा बोलता है जो बहुसंख्यक समाज बोलता है पर सांप्रदायिकता की आंधी में आंध्र प्रदेश में बैठे हुए एक मुसलमान को अपनी भाषा तेलगु की जगह उर्दू बताने में गर्व का अनुभव होता है.
जनगणना और उर्दू का धार्मिककरण
हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषाओं के रूप में अंग्रेजों के शासन के दौरान अलग किया गया. इस दौरान दक्षिण एशिया में राष्ट्र का विचार उभरा.अंग्रेजों ने लोगों को सख्ती से बंद समुदायों और जातियों के रूप में वर्गीकृत किया, जिससे इन नए बने समुदायों में एक नई “आत्म-धारणा” पैदा हुई. जनगणना ने हिंदू और मुस्लिम पहचान पहली बार एक-दूसरे से अलग बनाई जा सकी.
हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी के जनगणना वर्गीकरण में समय के साथ कई बदलाव आए. 1871-72 की जनगणना में सिर्फ हिंदुस्तानी का उल्लेख था, लेकिन 1881-82 की जनगणना में हिंदी और हिंदुस्तानी दोनों का उल्लेख किया गया, जबकि उर्दू को हिंदुस्तानी के अंतर्गत शामिल किया गया था. धीरे-धीरे, उर्दू को इस्लाम से जोड़ा गया. इसे पश्चिमी हिंदी की एक बोली के रूप में मान्यता दी गई. इस प्रकार उर्दू, मुस्लिम पहचान के साथ गहराई से जुड़ती गई.
19 वीं सदी के अंत तक, मुसलमानों ने उर्दू को इस्लामी तहजीब का प्रतीक मानना शुरू किया. उर्दू में फारसी-अरबी शब्दों का उपयोग बढ़ गया. वहीं, हिंदू नेताओं ने हिंदी को संस्कृत के साथ जोड़कर उसे हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बना दिया.
इस प्रक्रिया में, उर्दू और हिंदी, जो पहले एक ही भाषा के दो रूप थे, सांस्कृतिक और धार्मिक विभाजन के प्रतीक बन गए. अंग्रेजों की नीतियों ने इस विभाजन को और गहरा किया. दोनों समुदायों के बीच भाषा के चुनाव में धार्मिक पहचान महत्वपूर्ण हो गई.
अंग्रेजों की नीतियों का प्रभाव
मुगल हुकूमत के दौरान, फारसी सरकारी जबान थी. 1837 में, अंग्रेजों ने यूनाइटेड प्रोविंसेज के निचले दर्जों में फारसी की जगह उर्दू को सरकारी जबान बना दिया. इस तबदीली से ऊंचे तबके के मुसलमानों को फायदा हुआ जो फारसी और उर्दू दोनों जानते थे.
हिंदुओं में, कश्मीरी पंडित और कायस्थ (मुंशियों की एक जात) जो फारसी और उर्दू में माहिर थे, इस तबदीली से फायदा उठाया.लेकिन 1880 के दशक में एक बड़ा हिंदू-अगुवाई वाला हिंदी-जबान का जोश सामने आया जिसने फारसी रस्म-उल-खत में लिखी उर्दू की जगह देवनागरी रस्म-उल-खत में लिखी हिंदी की मांग की.
हिंदी और उर्दू दोनों संस्कृत से निकली थीं, जो पुरानी क्लासिकी जबान थी, जो लैटिन की तरह, अब बोली नहीं जाती थी. मगर ज्यादातर हिंदुओं द्वारा मजहबी मकसदों के लिए इस्तेमाल की जाती थी.ब्रिटिश प्रशासन ने हिंदी और उर्दू के बीच विभाजन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
अंग्रेजों ने उर्दू को फारसी लिपि में लिखा और इसे मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखा गया. इसे हिंदुओं की भाषा के रूप में देखा गया. जनगणना में भी अंग्रेजों ने हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी को अलग-अलग श्रेणियों में रखा, जिससे लोगों के मन में यह बात बैठ गई कि ये अलग-अलग भाषाएं हैं.
नेहरू रिपोर्ट ने यह रुख अपनाया कि हिंदुस्तानी भारत की राष्ट्रीय भाषा होगी. इसे दो आधिकारिक लिपियों में लिखा जाएगा: देवनागरी और फारसी-उर्दू. हिंदुस्तानी भारत की संपर्क भाषा बन गई थी और दक्षिण के गहरे हिस्सों को छोड़कर अधिकांश भारत में बोली और समझी जाती थी पर कालांतर में ऐसा हुआ नहीं.
शिक्षा और प्रिंट मीडिया ने भी हिंदी और उर्दू की अलग पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 19वीं सदी के मध्य से अखबार और पत्रिकाएँ हिंदी और उर्दू में अलग-अलग छपने लगीं. हिंदी अखबारों ने देवनागरी लिपि और संस्कृत शब्दों का उपयोग किया, जबकि उर्दू अखबारों ने फारसी लिपि और अरबी-फारसी शब्दों का. इससे दोनों भाषाओं की अलग पहचान और स्पष्ट हो गई.
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि उर्दू और हिंदी के बीच का विभाजन केवल भाषाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक था. उर्दू को मुस्लिम राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाने में मुस्लिम लीग और जिन्ना की भूमिका महत्वपूर्ण रही. मोहम्मद अली जिन्ना उर्दू को मुस्लिम राष्ट्रवाद का प्रतीक बनाया.
पाकिस्तान की मांग के साथ उर्दू को जोड़ा और इसे पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बनाने का वादा किया. जिन्ना के लिए, जो खुद केवल अंग्रेजी धाराप्रवाह बोलते थे, उर्दू केवल मुसलमानों की भाषा थी. इसलिए उसे पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा होना था,
हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित किया. उर्दू के लिए अलग प्रांत की मांग की. यह भी दिलचस्प है कि पाकिस्तान में आज भी 7 से 8% लोग ही उर्दू बोल पाते और पाकिस्तान से बांग्लादेश का विभाजन में एक महत्वपूर्ण कारण यही उर्दू- बंगला विवाद भी रहा.
संस्कृतनिष्ठ हिंदी और भाषाई विभाजन
1893 में बनारस में उत्तर-पश्चिमी प्रांतों और अवध की पहली बड़ी हिंदी संस्था, नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई. हिंदी और नागरी लिपि के इन समर्थकों के जो भी आर्थिक मकसद रहे हों, वे अक्सर सांस्कृतिक और धार्मिक शब्दों में अपनी बात कहते थे. जैसे मुस्लिम उर्दू का प्रयोग इस्लाम फैलाने में कर रहे थे.
संस्कृतनिष्ठ हिंदी के निर्माण ने हिंदी-उर्दू विवाद को और बढ़ावा दिया. इसने हिंदू और मुस्लिम पहचान के बीच की खाई को और गहरा किया. संस्कृत से समृद्ध यह हिंदी, आम लोगों की बोलचाल की भाषा से दूर हो गई. कठिन शब्दावली के कारण, यह भाषा आम जनता के लिए समझ से परे हो गई, जिससे हिंदी और उर्दू के बीच का विभाजन और स्पष्ट हो गया.

हिंदी को हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ने की प्रवृत्ति भी उतनी ही मजबूत थी. इससे भाषाई विवाद गहरा हुआ और दोनों समुदायों के बीच संवाद की संभावना कम हो गई.हिंदू राष्ट्रवादी सोच स्वदेशी आंदोलन के रूप में शुरू हुई, जो स्पष्ट रूप से ब्रिटिश शासन का विरोध करती थी. अप्रत्यक्ष रूप से पिछले मुस्लिम शासन से लड़ती थी.
हिंदू राष्ट्रवादियों ने इस नई हिंदी को अपनी पहचान का प्रतीक बना लिया, जबकि मुसलमानों ने उर्दू को अपनी भाषा के रूप में स्वीकार किया. इस तरह भाषा, धार्मिक पहचान से जुड़ गई. यह विभाजन समय के साथ और गहरा होता चला गया. सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में इस नई हिंदी को बढ़ावा दिया गया, जिससे उर्दू पीछे छूटती गई और इसे एक अल्पसंख्यक भाषा के रूप में देखा जाने लगा.
उर्दू बचाव का नारा और पसमांदा
ब्रिटिश राज में ही ये तय हो गया था कि अंग्रेज़ी वो जबान है जिसके दम पर आप ऊंचे ओहदे को हासिल कर सकते हो. इसलिए सर सैयद अहमद खान ने जहाँ एक ओर अशराफ तबके के लिए अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई पर जोर डाला, वहीं दूसरी और पसमांदा समाज में आधुनिक शिक्षा की खिलाफत करते रहे.
यह भी दिलचस्प है कि अंग्रेज़ी पढे लिखा यह वर्ग उर्दू बचाव के नाम पर भारत विभाजन का भी पक्षधर बन गया. पसमांदा मुसलमानों को यह समझाने लगा कि भारत का विभाजन नहीं हुआ तो उर्दू नहीं बचेगी. मौजूदा दौर में उर्दू और मुस्लिम संस्कृति एक दूसरे के पर्याय की तरह देखे जाते हैं.
नतीजतन, पसमांदा मुसलमानों पर उर्दू बचाने का दबाव है. पर अशराफ के लड़के तो अंग्रेज़ी पढ़ रहे हैं तो ऐसे में उर्दू बचाने की जिम्मेदारी पसमांदा के कंधों पर आ गई, लेकिन उर्दू पढ़े-लिखे पसमांदा लिए नौकरी का कोई ठिकाना नहीं है.
जरा यह आंकड़े देखें जिसे प्रोफेसर मसऊद आलम फलाही ने अपनी किताब ‘हिंदुस्तान में ज़ात-पात और मुसलमान'(Al-Qazi Publication, New Delhi, 2020) में दिया है- इंजीनियर शमी खान खटाना और आयशा समन साहिबा ने भारत की 21 यूनिवर्सिटी में मुसलमानों से संबंधित विभागों जैसे उर्दू ,अरबी, पारसी, फारसी, इस्लामिक स्टडी इत्यादि में शिक्षकों (असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर) की सामाजिक स्थिति पर जानकारी एकत्र की जिसके अनुसार – कुल 296 शिक्षकों में कथित अशराफ वर्ग के शिक्षक 272 हैं, अनुसूचित जाति के 3 शिक्षक, अनुसूचित जनजाति के 3 शिक्षक, अन्य पिछड़ा वर्ग के 18 शिक्षक हैं.
मतलब करीब 92% अशराफ शिक्षक हैं. ये साफ है कि शिक्षा से जुड़े हर संसाधन पर इन्ही की नुमाइंदगी चलती होगी. इस तरह हम देखते हैं कि उर्दू बचाने की ज़िम्मेदारी पसमांदा की है. उर्दू से कमाने की और अपना सत्ता वर्चस्व बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अशराफों की है.
उर्दू का पुनर्जागरण: एक सकारात्मक दृष्टिकोण
हालांकि उर्दू को लेकर सांप्रदायिक राजनीति आज भी चलती है, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि उर्दू का भविष्य भारत में उज्जवल है. यह भाषा न केवल साहित्यिक समृद्धि का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन रही है. उर्दू अदब, शायरी और नाटकों के माध्यम से यह भाषा अपने अस्तित्व को बनाए हुए है.
पसमांदा समाज भी उर्दू के इस पुनर्जागरण में अपनी भूमिका निभा रहा है. उनके लिए उर्दू केवल मुस्लिम पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि यह भाषा उनके सांस्कृतिक और सामाजिक अधिकारों की लड़ाई का हिस्सा है. पसमांदा आंदोलन ने उर्दू को एक सामाजिक न्याय की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया है, जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है.
भारत में उर्दू का भविष्य न केवल इसकी साहित्यिक धरोहर से जुड़ा है, बल्कि इसके समृद्ध सांस्कृतिक योगदान से भी. उर्दू आज भी करोड़ों भारतीयों की रोज़मर्रा की भाषा है . यह भाषा अपनी साझी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर आगे बढ़ रही है.
आजादी की लड़ाई के दौरान, हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग समुदायों के रूप में बनाने के लिए उनके बीच की दूरी बढ़ाई गई और समुदायों के भीतर की दूरी कम की गई. हिंदी और उर्दू को भारत और पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में बनाना इसी सांप्रदायिक गोलबन्दी का नतीजा है.
उर्दू की वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यद्यपि इसके सामने कई चुनौतियाँ हैं, फिर भी यह भाषा न केवल जीवित है, बल्कि इसकी लोकप्रियता में भी वृद्धि हो रही है. 1971 में, उर्दू बोलने वालों की संख्या 3.19% थी, जो 2001 तक बढ़कर 5.01% हो गई.
इससे यह स्पष्ट होता है कि आजाद भारत में उर्दू एक अल्पसंख्यक भाषा के रूप में अपनी जगह बनाए हुए है. इसे बोलने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है.आज, उर्दू का विकास न केवल साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप से हो रहा है,
इसका उपयोग फिल्मों, गानों, और आधुनिक नाटकों में भी हो रहा है. भारत में उर्दू की स्थिति को केवल अल्पसंख्यक भाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक साझी सांस्कृतिक धरोहर और समाज में समानता और सामाजिक न्याय की भाषा के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए.
एक बात समझ लें, पसमांदा समाज ही उर्दू को समावेशी और सामाजिक न्याय की भाषा बना सकता है. इसकी सांप्रदायिकता से लड़ सकता है. पसमांदा आंदोलन का मानना ही है कि आज उर्दू की सबसे ज्यादा सेवा पसमांदा समाज कर रहा है. पसमांदा समाज ही उर्दू में हाशिये पर है. उर्दू से प्राप्त नौकरियों में सबसे कम लाभांवित है. ऐसे में हमें इस भाषा को त्यागने की नहीं इस पर कब्जा करने की जरूरत है.
( अब्दुल्लाह मंसूर स्वतंत्र लेखक और शिक्षक हैं। वे सामाजिक मुद्दों और पसमांदा विमर्श पर लगातार लिखते रहे हैं।)